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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 590

( ५४८ ) बीजक कबीरदास ।
चलत चलत थकि गयो वह नगर नव कोश रह्यो । सो नवकोशमें एकौ
कोश न चलि सक्यो, तौ दशौ कोश जहां साहबको मुकाम है तहां कैसे जाय-
सकै । दशौ कोश दशौ मुकाम रेखतामें लिखियाये हैं । सो बीचै में याको
डेरा पर्यो बीचही में रहिगयो ताते जन्म मरण होन लग्यो, तो कौन को
दोषहै । साहबके पास भर तो पहुँचिबोई न कियो । औ मुसलमाननके मतमें
बहत्तर हजार परदाके ऊपर जब गयो तब नव परदा बाकी रहिजाय हैं तौनै
कोश है दशयें में साहबहै ॥ ४९ ॥
झालि परे दिन आँथये, अन्तर परिगै साँझ ॥
बहुत रसिकके लागते, बेश्या रहिगै बाँझ ॥ ५० ॥
यहि साखी में अर्थ कोऊ यह कहै हैं कि, प्रपंच करतेकरते औ विषय
रस लेते लेते बुढ़ाई आई। औ वेद शास्त्र पुराण नानाबाणी पढ़तेपढ़ते औ कर्म्म
उपासना तपस्या योग बैराग्य करते करते थके । आखिर गुरुपद पारिखकी
प्राप्ति नहीं भई यकदिन मौत आइ पहुँची तब आँखिन पर झालिपरी कहैं
अँधियारीपरी । औ दिनकहिये ज्ञान सो गाफिली में डूबि गया । औ हमारो
अर्थ यहहै ॥
झालि पर कहे जब दिन अथवा कहे आयुर्दाय घटी तब गिरिपरे कहैं तब
बीमारहुये इन्द्रिय शिथिलभई तब अन्तःकरणमें अँधियार ह्वैगयो कहे कुछ न
सूझि परन लग्यो तब जैसे बहुत रसिकके संग ते बेश्या बांझ रहि जाइ है तैसें
गुरुवा लोगनकी नाना प्रकारकी बाणी को उपदेश सुनि सुनिकै शून्य ह्वैगये ।
न ज्ञान भक्ति उत्पत्ति भई औ साहब न प्राप्त भये ॥ ५० ॥
मन तो कहै कब जाइये, चित्त कहै कब जाउँ ॥
छा मासेके हीठते, आध कोश पर गाउँ ॥ ५१ ॥
मन संकल्प बिकल्प करिकै आत्मा को स्वरूप खोजै है कि आत्मा कैसों
है ? औ चित्त स्मरण करै है कि आत्माको स्वरूप कैसो है ? सो छा मास
जो हैं छहू शास्त्र तौनेमें हीठत कहे स्वरूपको खोजतई गये, पै वह गाउँ आ-
त्माको स्वरूप मकार आध कोश में कहे अर्धनाम रकार ताके निकटही रह्यो
पै खोजे न पायो ॥ ५१ ॥