कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 595, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५५५ )
यहब्रह्म ईश्वर माया आदिदै कै जो संसारसागरहै तामें बुन्द जो जीवहै सो
पर्यो या सबै जानैहैं कि जीव संसारी ह्वैगयो है वेदशास्त्रमें सर्वत्र लिखैहै अरु
यह सिगरो संसारसमुद्र बुन्दरूप जीवमें समायजाय है अर्थात् ईश्वर मायाब्रह्ममय
जो संसार ताको जीवही अनुभव करि लियोहै सो जबजीव याभांतिते अनुभवत्यागै
कि बिषय इंद्रीमें इंद्रीमनमें मन चित्तमें चित्त प्राणमें प्राण जीवात्मामें लीनकैकै
दैदे तब संसारसागर बुन्दरूप जीवमें समायजायहै अर्थात् संसार मिटिजायहै
जीव साहबको जानि जाय है ॥ ६८ ॥
जहर जिमी दै रोपिया, अमि सींचै सौ बार ॥
कविरा खलकै ना तजै, जामें जौन विचार ॥ ६९ ॥
जिमीमें जहर को थलहादै कै जो बीज बोवै है सो वामें जो सैकड़ों बार
अमृतौ सींचै तो वहि बीजा में जहरको असर आयबोई करैगो तैसे यह खलक
कहै संसारमें मायाकी जिमी है विषय को थलहा है ताते केतिकौ कोई उपदेश
करै परन्तु मायाको असर कबिरा जे जीव हैं तिनके आयही जाय है जोई
बिचारआवै है सोई करै हैं सो संसार नहीं छोड़ैं ॥ ६९ ॥
दौकी दाही लाकरी, ऊभी करै पुकार ॥
अबजो जाउँ लोहार घर, दाहै दूजी बार ॥ ७० ॥
दावानलकी दाही कहे जरी जो लकरी है सोई लाई भई वहै पुकारिकै
कहै है कि अब जो लोहारके घरजाउं तो दूजी बार लोहार मोको दाहै कहै
जारै । सो दावाग्नि जोहैं ब्रह्माग्नि तौनेते जो सम्पूर्ण कर्म जरिहुगे तौ कोयला
रहिजायहै कहे वहै कैवल्य शरीर रहिजायहै । सो कहै हैं कि, जो अब लोहार
जे सतगुरु हैं तिनके इहां जाउं तौ कैवल्यौ शरीर छूटै मुक्त ह्वै जाउँ अर्थात्
जो साहब को न जान्यो औ कर्म सब जरिगये तो कैवल्य शरीर रहिगयो
अर्थात् सब संसारहीमें आवैहैं। जो कैवल्य शरीर छूटै तो हंस शरीते मुक्त
ह्वै जाय काहेते कर्मनके जरे कैवल्यशरीर नहींछूटैहै ॥ ७० ॥
विरहकि ओदी लाकरी, सपचै औ गुंगुआय ॥
दुखते तबही बाचिहौ, जब सगरो जरिजाय ॥ ७१॥