कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५३३ )
शब्द विना श्रुति आंधरी, कहौ कहांको जाय ॥
द्वार न पावै शब्दको, फिरि फिरि भटका खाय ॥ ४ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, श्रुति जो है सो शब्द जो है रामनाम ताके बिना
आंधरी है । काहेते कि, रकार मकार श्रुति की आंखी हैं ताके बिना कहांको
जाय । सो शब्द जो रामनाम है तौनेको द्वार नहीं पावै अर्थात् अर्थ नहीं
जानै । रामनाम तो साहबमुख अर्थमें मन बचनके परे पदार्थ बतावै है और या
श्रुति नेति नेति कहि बतावै है । याते रामनामको साहब मुख अर्थ नहीं कहि
सकैहै । याते यामें परिकै जीव फिरि २ भटका खायहै । ज्ञान, भक्ति, बिज्ञान,
योग; बतावै है फिर फिरि नेति नेति कहि कहि देइहै, याते जीव भटकाखा-
इहै । उहां बस्तु कुछ नहीं पावै है जो रामनामको साहब मुख अर्थ जीव जानि-
कै लगावै तौ सब श्रुति लागि जायँ । औ सबके परे पदार्थ सो जानि जाहिं ।
काहेते बिना आंखी कोई नहीं देखै । जौनी तरहते राम नामते सब श्रुति
लागिजायहैं औ अनिर्वचनीय पदार्थ मालूम होयहै सो पीछे लिखि आये हैं ॥ ४ ॥
शब्द शब्द बहु अंतर हीमें, सार शब्द मथि लीजै ॥
कह कबीर जेहि सार शब्द नहिं, धिग जीवन तेहि दीजै ५
जहां जहां अन्तर तहां तहां बहुत शब्द देखे हैं। औ तुम रामनामको अनि-
र्वचनीय है श्रुति की आँखी हैं या कहौ हौ सो कैसे होइगो ? एकशब्द - वोहू
होइगो? सो या ऐसो नहींहै सार शब्दहै जब सब शब्दनको मथै तब वा जानि
परै । सो श्री कबीरजी कहै हैं कि, जेहि को सार जो रामनाम सो नहीं मथि-
लियोहै, ताको जीवन संसार में धिगहै । “सारशब्द मतलींजै” जो यह पाठ
होइ तौ सारशब्द रामनाम ताको मतिलेइ । और जे मतिहैं ते कुमतिहैं तेहिको
छोड़िदे । रामनाम वर्णन सब श्रुति की आंखी हैं तामें प्रमाण ॥ “आखर मधुर
मनोहर दोऊ । वरण बिलोचन जन जिय जोउ”॥ १ ॥ “मुक्तिस्त्रीकर्णपूरे-
र्मुनिहृदयवयःपक्षीतीरभूमिः संसारापारसिंधोः कलिकलुषतमस्तोमसोमार्कबिम्बे।
उन्मीलत्पुण्यपुंजद्रुमललितदलेलोचनेचश्रुतीनां कामंरामेतिवर्णौशमिहकलयतां
'ततंसज्जनानाम् ॥ ५ ॥