कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५४९ )
गिरही तजिके भये उदासी, बन खँड तपको जाय ॥
चोली थाकी मारिया, बरइनि चुनि चुनि खाय॥ ५२ ॥
घर छोड़िकै जगतते उदास भये, वन पहारमें बैठे जाय । साहब को तो
न जान्यो । शरीर औटिकै तपस्या करन लगे । सो या मारतें कहे कन्दर्प
तें चोली थकिगई कहे वीर्यकी हानि ह्वै गई जब वृद्ध ह्वै गये तब जैसे चोली
बरइनि की थकिगई तब बरइनि सरे सरे पान निकारिडारै है नये नये पान
चुनिचुनिकै खायहै । तैसे माया जो है बरइनि कहे ज्ञानभक्ति को बरायदेनवारी
कहे दूरि करनवारी सो पुरान पुरान जे शरीर हैं तिनको निकारि डारयों
नये नये सुन्दर दै कै स्वर्गादिकनको सुख दियो । राजाबनायो, धनवान् बनायो
भोग कराइ कराइकै उनको माया मृत्युरूप खाय लियो । ज्ञानी भक्तियोगी
तपस्वी कोई नहीं बचै हैं जे साहब को जानैं हैं ते बचै हैं ॥ ५२ ॥