कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४४ ) बीजक कबीरदास ।
आइहैं कहै हैं मैं फलानो भूतहों आपनो रूप भूलिजाइहैं ऐसे जेई गुरुवालोगन-
की बाणी उपदेश में परै हैं ताहीके एकरूप ब्रह्म समाइ है यही कहै हैं कि,
मैंहीं ब्रह्म हौं औ सब ब्रह्मही है एकरूप दूसरो पदार्थ नहीं है । सो श्रीकबीरजी
कहै हैं साउज जो जीवहै ताकी तबकी गति गुरुवालोग कहै हैं तब तुम ब्रह्मही
रहेहौ आपने अज्ञानते तुम जीवत्वको धारणकीन्हेहौ अबहूं जो ज्ञानकरो तों
ब्रह्मही है जाहु या मानिकै उपदेश जीव भोंकै है कि हमहीं ब्रह्महैं अर्थात् जैसे वा
पण्डा भूतन्हीं है जाइहै जीवहीरहै है ऐसे न ब्रह्म रहे हैं न ब्रह्म होइगो । भोंकै-
पदके शक्तिते दूसरो दृष्टांत ध्वनित होइहै जैसे कृकुर कांचके मन्दिरमें आपनो
प्रतिबिम्ब देखि भूंकै है ऐसे अपने भ्रमते गुरुवनकी वाणीरूप ऐनामें आपनो
रूप ब्रह्महीदेखै हैं भूंकै हैं, यह नहींजानै हैं कि हम साहबके हैं या गुरुवालो-
गनकी बाणी में ब्रह्मदेखोपारै है सो हमारे मनहींको अनुभवहै ॥ ३९ ॥
गही टेक छोडै नहीं, चोंच जीभ जरिजाय ॥
मीठो काह अँगारहै,ताहि चकोर चवाय :॥ ४० ॥
ब्रह्मवादिन की टेक कैसी है जैसे चकोर को ओठ जीभ जरै है परन्तु
अँगारै को चाबै है ॥ ४० ॥*
झिलमिल झगरा झूलते, बाकी छुटी न काहु ॥
गोरख अँटके कालपुर, कौन कहावै साहु ॥ ४१ ॥
झिलमिल झगरा कहे दशमुद्रा करिकै बंकनालते खिरकीकेराह लैजाइकै
वहज्योति जो झिलमिलाइहै तामें आत्माको मिलाइ देइहै पुनि षट्चक्रते झिलिकै
गैबगुफा में जो ब्रह्मज्योतिहै तामें मिलिकै औ झगराकरिकै कहे कामक्रोधादि-
कनको दूरिकरिकै पुनि संसारमें झूलिपरे है अर्थात् जबसमाधि उतरि आई तब-
फेरि वही झगरामें झूलिपरे सो कर्मकीबाकी काहूकी नहीं छूटै है सब कर्म भोग-
करै है । जो गोरखै कालपुरमें अँटके अर्थात् उनहींको जो काल खाइलिह्यो तों
और दूसरो कौन शाहु कहावै है कौनकालते बच्यो है । जो बहुत जियो योगी
- और २ प्रतियों में ४१ वी साखी यह है । चकोर भरोसे चन्दके, निगले तत्त
अँगार । कहै कबीर दाहै नहीं; ऐसीवस्तु लगार ॥ ४१ ॥