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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 580

( ५३६ ) बीजक कबीरदास ।
सब अपनी २ वाणी और कल्पना में मस्त हैं । जो तृषित होइँगे अर्थात् मुक्तिको
चाहैंगे तो तुम्हार उपदेश रूपपानी झख मारिके कहे लाचार ह्वै कै आपै पियेंगे ।
समुद्रका खाराजल त्यागि देंगे ॥ १२ ॥
हंसा मोती बिकानिया, कंचन थार भराय ।
जो जस मर्म न जानिया, सो तस काह कराय॥१३॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, हे विवेकी जीवौ ! हे हंसो ! कंचन थार रूप जो
तुम्हारे अन्त करणः तामें मोती रूप साहब को ज्ञान मोते भराओ अर्थात् मैं तौ
तुमको उपदेश देऊँहौं तुम कहा बिकत फिरौ हौ । जौन जस पदार्थ होइ है तौने
को तस न जानत है तौ वाको लै कै का करै ।
अथवा-कबीरजी कहैं हैं हे हंसो ! हे जीवो ! मोती जो निर्मल शुद्धरूप
आपना स्वरूप तौनैंको कंचन थार जो माया तौने में भरिके विकनिडारे अर्थात्
कनक कामिनीमें लगाई कै मायाके हाथ बेचिडारे । सो जो जौने तराते
आपने स्वरूपको न जानि सक्यो सो जाहिमें जैसौ लग्यो ताहिमें तैसो ह्वै अज्ञान
भयो । अब कहा करै मायामें फंसिकै मरिगै ॥ १३ ॥
हंसा तुम सुवरण वर्ण, का वरणौं मैं तोहि ।
तरवर पाय पहेलि हो, तबै सराहौं छोहि ॥ १४ ॥
हे हंसा जीव ! तुम सुवरण जे मकार ताके बर्णहौ, मैं तोंही का वरणौं
अर्थात् तुमहूं मन बचनके परे हौ सो तरिवर जो या संसार ताको जब
पाइके पहेलिहो कहे ठेलि जैहो अर्थात् संसार को दूरि करि दैहो तबही मैं तो-
को छोह करिके सराहौं गौ कि बड़े बन्धनमें बंधिके छूट्यो ॥ १४ ॥
हंसा तू तो सबल था, हलकी अपनी चार ।
रंग कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १५ ॥
हे हंसा जीवो ! तुमतो सबल कहे सम्यक् प्रकार बलवाले थे ( तेहोरो
साहबौ सबलहै ) परंतु अपनी चार कहे अपनी चालते हलुक कहे निबल ह्वै
गयो काहेते कि रंग कुरंग जो या संसार है तौनेमें रंगिगै कहै राग करि लियो।