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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 584

( ५४२ ) बीजक कबीरदास ।
घर कबीरका शिखर पर, जहां सिलि हिली गैल ॥
पांय न टिकैं पिपीलिका, खलक न लादे बैल॥ ३३ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे गुरुवालोगौ ! हमारा घर शिखर जो रामनामहै
तामें है । तहां गैल चिकनीहै चींटी जो बुद्धिहै ताहीके पांय नहीं टिकैहैं अर्थात्
वा मन बचनकेपरेहैं रामनाम औरस्वरूपहै तहां तुम पहुंचि न सकौ हौ ताते
बिछुल गैल हौ उहां नाना मत शास्त्र रूप लाद लादे बैल जे हैं गुरुवा ते नहीं
जाइ सकैहैं । अर्थात् सूक्ष्म बुद्धिहू नहीं जाइसकै हैं तौ तुम जे नाना मतनको
लाद लादेहौ सो कैसे जाइ सकौहौ जहां मैं टिकौहौं तहांभारि तुमहूं पहुंचि
सकतै नहींहौ कहां कलेवा देउगे कहां बाहन देउगे ॥ ३३ ॥
बिन देखे वहि देशकी, बातैं कहै सो कूर ॥
आपै खारी खात हौ, बेचत फिरत कपूर ॥ ३४ ॥
श्रीकबीरजीकहैहैं कि, जौने शिखरमें हम चढ़े हैं तौने देशको बिन! सतगुरु
द्वारा देखे जे बात वहांकी कहैहैं ते कूरहैं । अर्थात् तुम हमको उतरन शिख-
रते बिना जाने कहौहौ सो तुमहीं कूरहौ । कैसे हौ आपतोखारी जे नाना मत
तिनको ग्रहण कीन्हेहौ स्वच्छ उज्ज्वल कपूर जो है ज्ञान ताको बेंचत फिरौहौ।
अर्थात् द्रव्य लै कै चेला बनावत फिरौहौ । भाव यहहै कि, नामको भेद नहीं
जानौ हमारे इहां कैसे पहुंचौगे ॥ ३४ ॥
शब्द शब्द सबको कहैं, वातो शब्द विदेह ॥
जिह्वा पर आवै नहीं, निरखि परखि कर लेह ॥ ३५ ॥
शब्द शब्द सबकोई कहैहैं परन्तु वा शब्द जो रामनामहै सो विदेहहै बिना
शरीरका है जिह्वा में नहीं आवै है मन बचन के परे है ताको ज्ञानदृष्टिते निर-
खिकै पारिख करिलेहु ॥ ३५ ॥
परवत ऊपर हर बसै, घोड़ा चढ़ि वस गाउँ ॥
बिन फुल भौंरा रस चखै, कहु विरवाको नाउँ ॥ ३६ ॥