कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३४ ) बीजक कबीरदास ।
शब्दै मारा गिरि गया, शब्दै छोड़ा राज ॥
जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनको सरिया काज ॥६॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि शब्दजो रामनामतौनैको जगत्मुख अर्थमें वेदशा-
स्त्र पुराण नानामतजे निकसे हैं तामें जो परचो सो गिरगया अर्थात् संसारमें
परचो औ जिन जिन शब्द विवेकिया कहै सब शब्दनते बिचारकरि सारशब्द-
जो रामनाम ताकोजानि लियो सोई संसाररूप राजको छोड़िदिये हैं औ तिनहीं
को काजसरियाकहै सिद्धभयो है ॥ ६ ॥
शब्द हमारा आदि का, पल पल करै जो यादि ॥
अंत फलैगी माहली, उपरकी सब वादि ॥ ७ ॥
गुरुमुख । साहबकहैंहैं हे जीवो ! हमारा शब्द जो रामनाम सोई आदिको है
अर्थात् याहीते प्रणव वेदशास्त्र बाणी सब निकसे हैं सो याको आदिकहे स्मरण
जो पल पल कहे निरन्तर करैगो तौ अन्तमें फलैगी साकेत जो हमारो महल-
ताको माहली होइगो बसैया होइमो अर्थात् तहांको जाइगो और ऊपरके जे सब
नाना मतहैं ते वादि कहे मिथ्या हैं अथवा और सब ऊपरके मत बाद विवादहैं ॥७
जिन जिन संबल ना किया, अस पुर पाटन पाय ॥
झाल परे दिन पाथये, संबल किया न जाय ॥ ८ ॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि, अस पुरपाटन जो या मानुष शरीर तौनै को पाय
कै, जिन जिन पुरुष संबल न किया कहै सम्यक् प्रकार बल न कियो अर्थात्
मनादिकनको न जीति लियो, साहब को न जान्यो । अथवा संबलकहे जमा,
सो परलोक की जमा रामनामको न जानि लियो । अथवा सन्बलकहे कलेवा
सो जो कलेवा साधन लै न लियो अर्थात् भजन न कै लियो सो दिन अथये कहैं
शरीर छूटे झालिपरे अर्थात् चौरासी लाख योनि में परचो अब सबल कियो
नहीं जायहै ॥ ८ ॥
इहई सम्बल करिले, आगै विषमी वाट ॥
सरग बिसाहन सब चले, जहँ बनियां नाहिं हाट ॥ ९ ॥