कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५४३ )
पर्वत आगे जीव ब्रह्मको कहिआये हैं सो पर्वत जो ब्रह्म ताके ऊपर हर जो
माया सो है अर्थात् सबलित द्वैकै संसारकी उत्पत्ति करै है । सो घोड़ा जो है
मन तौनैमें गाउँ जो संसार है सो बसे है अर्थात् मनैमें सब संसार है बिनफु
ल कहे या संसार तरु को फूल विषयहै सो मिथ्याहै कछु बस्तु नहीं है तौनेको
रसमौंरारूप जीव चाखैहै सो वा बिरवाको नाउँ तो कहु ? नाम संसार मिथ्याहै
जौन याको सांचनाम है ताको कहु। ताको तैं ध्वनी यहहै नहीं जाने है ॥ ३६॥
चन्दन वास निवारहू, तुझ कारण वन काटिया ॥
जिवत जीव जनि मारहू, मुयेते सबै निपातिया॥३७॥
हे चन्दन जीव ! अपनी बासना तू निवारणकरु । काहेते कि,मैं तेरे कारण
जौनै गुरुवनकी नाना बाणी नाना मतनमें तुम लाग्यो तिनकी बाणी रूप बन
काटि डारचो अर्थात् खण्डन करिदारचो जाते तुमको ज्ञानहोय । सो बासना
में परिकै जीवत जीव तुम अपनो न मारो । जो वामें लागि जाहुगे तौ तुम्हारो
जीवत्व जात रहै गो मरिजाहुगे । वाही धोखामें लगिकै आपको ब्रह्म मानन
लागोगे तब निपातिया कहे सब साहबके ज्ञानको निपात द्वैजाइगो ॥ ३७ ॥
चन्दन सर्प लपेटिया, चन्दन काह कराय ॥
रोम रोम बिष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ३८ ॥
चन्दन जो जीवहै सो कहाकरै है । सर्प जेगुरुवालोगहैं ते लपटिरहे हैं सो
उनकी बाणी को जो है बिष सो रोमरोम बिषे भेदि गयो है हमारो उपदेश
जो अमृत सो कहां समाय ॥ ३८ ॥
ज्यों मुदादि समसानासिल, सब यक रूप समाहिं ॥
कह कबीर साउज गतिहि, तबकी देखि भुकाहिं ॥३९॥
जैसे मुदादि समसानसिल होइहै सो जो कोई देखै है ताको मुरदैलैरूप देखि-
परै है । सो कबीरजी कहै हैं कि, गुरुवालोगनकी बाणीरूप सिलमें तबकी कहे
सृष्टिके आदिमें आपनीगतिदेखै हैं कि, तबहूँहम ब्रह्मरहेहैं या मानिके भोंकै हैं
कि, हमहीं ब्रह्महैं । अथवा ज्यों मुदादि कहे मुदको आदि ब्रह्म ज्योंकहे कैसे
जैसे मसानते सहित सिल पाथरकेभुतहा चौरा, जेइ वा चौरामैं बैठै हैं सोअभु-