कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर राग करिकै और लगवार कहे नाना मतनमें जाइके नाना मालिक बना-
वतभै । धुनि यहहै कि, अपने स्वरूपको देखु ॥ १५ ॥
हंसा सरवर तजिचले, देही परिगै सुन्नि ॥
कहै कबीर पुकारिकै, तेई दर तेइ थुन्नि ॥ १६ ॥
हे हंसाजीव! विना साहबके जाने या सरवररूपी शरीर तजिकै जाउगे तब
या देही सुन्नि परिजायगो अर्थात् मरिजयगी। सो श्री कबीरजी कहै हैं कि,
हम पुकारिकै कहै हैं बिना साहबके जाने तेई दर तेई थूनी बने हैं अर्थात्
नये तलायेमें लाठि गाड़ि जाइहै सो जहँ जायगो तहँ देहरूपी सरवरमें बासन ।
रूपी दरमें कर्मरूपी थून्हि गाड़ि लेउगे। पुनि पैदा होइगो जनन मरण न
छूटैगो ॥ १६ ॥
हंसा बक यक रंग लखिये, चरैं एकही ताल ॥
क्षीर नीर ते जानिये, बक उघरै तेहि काल ॥ १७ ॥
बकुला और हंस एकही रंग होइहैं और एकही ताल में चरै हैं,परन्तु जब
नीरक्षीर एक करिकै धारिदियो वे दूध पीलिये पानी रहिगयो तब जानिपरे
हंसहै । औ नीर क्षीर जुदो कीन न भयो तब जान्यो कि बगुला है । ऐसे
टीका कंठी माला टोपी सब बराबरै होइ हैं जब बिचार करनलग्यो मन माया
ब्रह्म जीव इनते साहबको अलग मान्यो तौ जान्यो कि ये हंस हैं जो मनमाया
ब्रह्म जीव ते अलग न कियो साहब को तौ जान्यो कि ये बगुलाहैं ॥ १० ॥
काहे हरिणी दूबरी, चरै हरियरे ताल ॥
लक्ष अहेरी एक मृगा, केतिक टोरो भाल ॥ १८ ॥
जीव कहै है कि हे हरिणी! बुद्धि तैं काहे दूबरी ह्वै रही है । संसार रूपी
हरियरे तालमें चरिकैं यह संसारतालमें लक्ष तौ अहेरी कहे मारनवारोहै सो
तैं केतिक भार टारोगे मरिही जाइगो । सो हरियर है जौने तालमें तौनैमें काहे