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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

ॐ
अथ बिरहुली ।
आदि अंत नहिं होत बिरहुली ।
नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली ॥ १ ॥
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली । कथि गये योग अपार बिरहुली ३
मास असाढ़हि शीत बिरहुली । बोइन सातौ बीज बिरहुली ४
नित गोड़ै नित सिंचै बिरहुली । नित नव पल्लव पेड़ बिरहुली ५
छिछिल बिरहुली छिछिल बिरहुली। छिछिल रही तिहुँलोक बिरहुली
फूल एक भल फुलल बिरहुली । फूलि रहल संसार बिरहुली ७
ते फुल बंदै भक्त बिरहुली । वांधि कै राउर जाहि बिरहुली ॥ ८ ॥
ते फुल लेहीं संत बिरहुली । डसिगो वेतल सांप बिरहुली ॥ ९ ॥
विषहर मंत्र न मान बिरहुली । गाडुरि बोले आर बिरहुली १०
विष की क्यारी बोयो बिरहुली। लोरत का पछिताय बिरहुली ११
जन्म जन्म अवतरे बिरहुली। फल यक कनयल डार बिरहुली १२
कह कबीर सचु पाय बिरहुली। जो फल चाखहु मोर बिरहुली १३
आदि अंत नहिं होत बिरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली १
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली। कथि गये योग अपार बिरहुली ३

( ५१८ ) बीजक कबीरदास ।
बी कहैं दुइ विद्या अविद्या रूपको, रहुली कहै रहनवाली जो माया ताको ।
सो कबीरजी कहै हैं कि, विद्या अविद्या दुहुनको न आदि है न अंत है अर्थात्
विचार कीन्हे भ्रममात्रै है जीव छूटि मात्र जाइ है । सो बिरहुली जो माया
ताके न जड़ है न पेड़ है न पल्लव है अर्थात् विचार कीन्हे मिथ्या है ॥ १ ॥
जब निशिवासर नहीं होत है तबहूं बिरहुली माया रही है जब पानी पवन
नहीं रह्यो तबहूं बिरहुली माया रही है औ ब्रह्मा सनकादिककी आदि बिरहुली
है औ जोन योग अपार कथि गये हैं सोऊ बिरहुली है ॥ २ ॥ ३ ॥
मासअसाढ़हिशीतविरहुली।बोइनसातौबीजविर हुली ॥४॥
नितगोड़ैनितसिंचैविरहुली।नितनवपल्लवपेड़बिरहुली॥५॥
जब प्रथम उत्पत्ति भई है सोई आषाढमास है काहेते चौमास को आदि
आषाढ है । तैसे युगनको आदि सतयुग है सो कैसा है शीतकहे शुद्ध सतोगुण
है तौनेमें जीव को जो सातौ सुरति तेई हैं बीज तेके बोवत भये ते सब बिरहुलिन
आइ सो मंगलमें लिखि आये हैं कि ॥ “ सात सुरति सब मूल हैं । मलयडु
इनहीं माँह ” ॥ सो जीव नितगोड़ै है गुरुवनते वोई कर्म्म पूछै है खोदि
खोदि नित सींचै है कहे वोई कर्म्म करै है जाते बिरहुली कहे माया बढ़तै
जाइ है ॥४॥ ५ ॥
छिछिलबिरहुलीछिछिलबिरहुली।छिछिलरहलतिहुँलोकबिरहुली ६
फूलएकभलफूललविरहुली।फूलिरहलसंसारविरहुली॥७॥
कहूं विद्यारूपते छिछिली है बिरहुली माया; कहूं अविद्या रूपते छिछिली
है बिरहुली माया । यही रीतिते तीनों लोकमें बिरहुली छिछिलरही है । सो
यही माया बिरहुली में कहूं कर्म्मत्यागरूप एक फूल धोखा ब्रह्म फूलि रह्यो है
ताही में सब संसार लगिकै फूलि रहे कहे आनन्द मानि लिये हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥
तेफुलबन्दैभक्तिबिरहुली । वांधिकैराउरजायविरहुली ॥८॥
तेफुललेहींसंतविरहुली । डसिगोबेतलसांपबिरहुली ॥९॥

बिरहुली । ( ५१९ )
ते फूल कहे तौन जो धोखा ब्रह्म सो भक्तनको बन्दै है अर्थात् खुलो नहीं
है वै धोखा में नहीं परै है काहेते वाको बांधिकै कहे खण्डन करिकै राउर जो
साहबको महल है तहांको जाहि हैं औ जे सन्त धोखा ब्रह्म रूप फूल लेहि हैं
अर्थात् ब्रह्म विचारमें जे शांत भे साहबको भूलिगे ते बेतल कहे बेताल भुतहा
सांप ऐसो जो धोखा ब्रह्म तौनेते डसिगे । धुनि या है जाको सांप डसै है ताको
स्वरूप भूलि जाइ है सांपै बोलै है ऐसे जे धोखा ब्रह्मवारे हैं तिनहूं आप-
नोस्वरूप भूलिगये कहै हैं हमहीं ब्रह्म हैं ॥ ८ । ९ ॥
बिषहरमंत्रनमानबिरहुली।गाडुरिबोलैआरबिरहुली॥१०॥
विषकीक्यारीबोयोबिरहुली।अवलोरतपछितायबिरहुली॥११
जाको ब्रह्मरूप सर्प डस्यो सो ब्रह्मरूप सर्पको विषहरनवारो जो रामनाम
ताको नहीं मानै है । गाडुरि जे हैं ते आर बोलै हैं झारै हैं । इहां सतगुरु जेहैं तें
रामनाम उपदेश करै हैं परंतु नहीं मानै हैं सो बिषयकी कियारी जो या संसार
तामें आत्मज्ञानरूप बीज बोयो सो वा बिरहुली कहे मायैआय सो अवलोरत कहे
काटतमें का पछिताय है । अबका विषम छांड़ै है ! नहीं छांड़ै है । कहूं ब्रह्मानं-
दकी कहूं विषयानन्दकी चाह । विद्यामें ब्रह्मानन्दकी चाह अविद्यामें विषयानन्दकी
चाह तोको नहीं छांडै है ॥ १० ॥ ११ ॥
जन्मजन्मअवतरेउबिरहुली।फलयक्कनयलडारबिरहुली १२
कहकबीरसचुपायबिरहुली।जोफलचाखहुमोरबिरहुली १३
सो हे जीव बिरहुली जो माया ताहीमें तुम जन्मजन्म अवतरचो । जौनै
बिरहुलीको फल धोखाब्रह्म । औ वह कर्मफल कैसो है कि, कनयल कैसो फल
है अर्थात् निरसहै रस नहीं है औबिषधरहै सो कौनीतरहते सचुपावोगे । सो
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, तब सचुको पावै जब फल मोर चाखै कहे जौने राम-
नाममें मैं जप्यो हौं ताही फलको चाखै तो सुचित्तई पावै या कनयल का फल
न चाखै ॥ १२ ॥ १३ ॥
इति बिरहुली समाप्त ।

अथ हिंडोला ।
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खंभ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गह्यो दूनौ पानि ॥२॥
झूले सो गण गंधर्व मुनि नर झूले सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झुलत व्यास फणिन्द्र ॥३॥
झूलत विरंचिं महेश मुनि हो झुलत सूरज इन्दु ।
औ आप निरगुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविन्दु ॥ ४ ॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौ खानि वानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥५॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं ।
कालहु अकालहु प्रलय नहिं तहँ संत विरले जाहिं ६॥
खण्डहु ब्रह्मण्डहु खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यह साधु संग विचारि देखौ जीउ निसतरि जाहिं॥७॥
तहँके बिछुरि बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अब साधु संगति शोचि देखौ बहुरि उलटि समाय८॥

हिंडोला । ( ५२१ )
तेहि झूलेबेकी भय नहिं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन९॥
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गहे दूनौ पानि ॥ २ ॥
परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के बिनाजाने भरमको हिंडोला सब संसार
झूलैहै कैसोहै हिंडोला; जहां पाप पुण्य रूप दोऊ खंभहैं, माया जोहै सो मेरु-
कहै गोलाहै, जौनेमें कर्मरूपी पटुली है, ताहीमें बैठिकै को नहीं झूल्यो अर्थात्
सब झूल्यो है ॥ १॥ लोभ जो है सोई मरुवा लगो है, विषय जो है सोई भ्रमरा
है, काम जो है सोई कीला है, औ शुभ औ अशुभ जे उपासनाहैं तेई डांडी हैं
ताको पाणिते गहिकै सब झूलैहैं ? को को झूलै हैं ताका आगे कहै हैं ॥ २ ॥
झूलै सो गण गन्धर्व मुनि नर झूलै सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झूलत ब्यास फणिन्द्र ॥ ३ ॥
झूलत विरंचि महेश मुनि हो झूलत सूरज इंदु ।
औ आपु निर्गुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविंदु ॥ ४ ॥
गन्धर्व मुनि नर सुरगण इंद्र नारद शारदा व्यास फणीन्द्र जे हैं शेष महेश
जेहैं विरञ्चि सूर्य्य चंद्रमा ये सब झूलैहैं और कहां तक कहैं सगुण निर्गुण
रूपते अर्थात् चित्तअचित् के अंतर्यामी ह्वैकै गोबिंद जेहैं तेऊ झूलै हैं ॥३॥४॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौखानि बानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥
छः जे शास्त्रहैं, चारि जे वेदहैं चौदह जे विद्याहैं, सात जे द्वीप हैं, औ
इक्कीसौ जेहैं सात शून्य सात सुरति सात कलम, यतनेमें परे जे तीनिउ लोककी

रचना भई सों इनमें चारिउ खानिके परे जे जीव तिनकी हम चारिउ बानीतें
वेदशास्त्रादिकनते बिचारि खोजि देख्यो कोई थिर नहीं रहे हैं सबै झूलैहैं ।
सो तैं यहां को नहीं है तैं तो बाहर को है जहां यहां की साजु उहां एकौ
नहीं है ॥ ५ ॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं।
कालौ अकालो प्रलयनाहिं तहँ सन्तबिरले जाहिं ॥६॥
खण्डौ ब्रह्माण्डौ खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यहसाधुसंग बिचारि देखौ जीव निस्तारि जाहिं ॥७॥
न उहां सूर्य है, न चन्द्र है, न दिनहै, न राति है, न संध्याहै न पांचौ
तत्वहैं, न कालहै, न अकालहै, न उहां प्रलयहै, ऐसी जगहमें कोई विरले संत
जाइहैं ॥ ६ ॥ पुनि कैसो है जाको खण्ड जो शरीर ब्रह्माण्ड जो जगत् तामें
वाको छहउ दर्शन वारे खोजि खोजिहारे परन्तु पाये नहीं न संसारते छूटे ।
सो ऐसे लोकको साधुजे हैं तिनको सङ्गरिकै विचारिकै देखै जाते जीव यहीं
संसारते निस्तारि जाइ ॥ ७ ॥
तहँ कोबिछुर बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अवसाधु संगति शोचिदेखौ बहुरि उलटि समाय॥८॥
तेहि झूलवे की भय नहीं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन॥६॥
सो ऐसे लोकते बिछुरे तोको केतन्यों कल्प व्यतीत भये तैं संसारमें भुला
यकै परे आय सो तैं अब साधु सङ्गतिकरि बिचारि कै रामनामको जानै जाते
बहुरिकै तहँ समाय अर्थात् जहांतें आये है तहँ जाय । या संसार हिंडोला छांडु
जो कोई साहबके जाननवारे सुजान साधुहैं तिनको या हिंडोलामें झूलबे की
भयनहीं है। तिनसों श्री कबीरजी कहै हैं कि, जो याको सतसुकृतराम नाम मिलै
तो फिर आनि बार न झूलै। रामनाम को जपिबो जो है सोई सत्य सुकृतहै वही
बाङ् मनो गोचरातीत जे श्रीरामचन्द्र हैं । तिनके और जे सुकृतहैं ते क्षयमा-
नहीं औ रामनाम पास पहुँचावे है जहांतें नहीं लौटे है तामें प्रमाण ॥ "सप्तको-

हिंडोला । ( ५२३ )
टिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः ॥ एक एव परो मंत्रो रामइत्यक्षरद्वयम्” ॥
इतिसारस्वततंत्रे ॥ दूसराप्रमाण ॥ “इममेवपरंमन्त्रं ब्रह्मरुद्रादिदेवताः॥ऋषयश्च
महात्मानो मुक्ता जप्त्वाभवाम्बुधेः” ॥ इति पुलहसंहितास्मृतिः ॥ ८ ॥ ९ ॥
इति प्रथम हिंडोला समाप्त ।
अथ दूसरा हिंडोला ।
बहुविधिके चित्र बनाइकै हरि रच्यो क्रीडा रास ।
ज्यहि नाहिं इच्छा झूलबे अस बुद्धि केहिके पास॥१॥
झूलत झूलत बहु कल्प बीते मन न छोड़ै आस ।
यह रच्यो रहस हिंडोलना निशि चारि युगचौमास॥२॥
कवहूंक ऊँच नीचे कवहूं स्वर्ग भूलौं जाय ।
अति भ्रमत भ्रर्माहिं हिंडोलना सो नेकु नहिं ठहराय॥३॥
डरपत रहौ यहि झूलिवेको राख यादवराय ।
कह कबीर सुनु गोपाल विनती शरण हौं तुवपाय ॥४॥
बहुतबिधि चित्र बनाइकै या जगत् हरि जे हैं गोलोकबासी कृष्णचन्द्र
आपनी क्रीडा बनाइ राख्यो है अर्थात् अन्तर्यामी रूपते आपही बिहार करें हैं ।
सो या जगतरूप हिंडोला में झूलिबेकी बुद्धि केहिके नहीं आई अर्थात् सबैकै है
न झूलिबेकी बुद्धि कोई विरले सन्तन के है । सो ऐसो हिंडौलाना चारि युग
जे हैं चौमास तामें रच्यो है जीवनके झूलत झूलत कोटिन कल्प व्यतीत भये
तऊ झूलिबेकी आशा मन नहीं छोड़ै है । हिंडोलाके चढ़ैया कहूं नीचे आवै है
कहूं ऊंचे जायहैं ऐसे अति भ्रमत जो जगत रूप हिंडोला तामें परे जे जीव त
कहूं नरकको जायँ हैं, कहुं स्वर्गको जाय है । सो हे जीवौ! या जगतरूप हिंडोला
झूलिबेको डरत रहो राख यादवराय या कहौ कि हे यादवराय कृष्णचंद्र हमको
बचायो। सो हे कायाके वीरौ जीवौ ! यह कहौ कि,हे गोपाल ! गो जे हैं इन्द्रिय
तिनके रक्षा करनवारे हमारी बिनती सुनो हम तुम्हार चरण शरण हैं ॥ —४॥

( ५२४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तीसराहिंडोला ॥ ३ ॥
जहँ लोभ मोहके खम्भ दोऊ मनँ रच्योहौ हिंडोर ।
तहँ झूलहिं जीव जहान जहँ लगि कतहूँ नहिं थिति ठोर ॥ १॥
चतुरा झूलैं चतुराइया औ झूलैं राजा सेव ।
अरु चन्द्र सूरज दोऊ झूलहिं नाहिं पायो भेव ॥ २ ॥
चौरासि लक्षहु जीव झूलैं धरहिं रविसुत धाय ।
कोटिन कलप युग बीतिया मानै न अजहूं हाय ॥ ३ ॥
धरणी आकाशहु दोऊ झूलैं झुलैं पवनहुँ नीर ।
धरि देह हरि आपहू झूलहिं लखहिं हंस कबीर ॥ ४ ॥
जौन जगतमें लोभ मोहके खम्भ बनाइकै मनको रच्यो जो हिंडोल ताहीमें
सब जहानके जीव झूलै हैं थिर नहीं कौनौ ठौर में रहैं हैं । चतुर चतुराईते झूलै
हैं,राजा झूलै हैं, सेवक झूलै हैं, चंद्र, सूर्य तेऊ झूलै हैं । हिंडोलाको भेद नहीं
पावैंहैं । चौरासी लक्ष योनिके जीव झूलैहैं तिनको सबको रवि सुत जे यमराज ते
धरैं हैं । सो कोटिन कल्प बीतिगये जीवनको झूलत परन्तु अजहूं नहीं मानै है
औ धरणी आकाश पवन पानी ये सब वही हिंडोलामें झूलै हैं औ देहधरिकै कहे
अवतारलैकै जौनी रीति सब झूलै हैं तौनी रीति हरि आपहू झूलै हैं । जीवनकों
यह दिखाइबे को कि, जैसे तुमहूं झूलौहौ तैसे हमहूं झूलै हैं सो देहधरेको फल
यह है इन को हेतु कोई जानि नहीं सकै है कि, जीवनपर दयाकरिकै उद्धार
करिबे को हेतु दिखावै हैं कि, देहको फल यह संसारई है ताते देहको अभिमान
छोड़ि हमारे अवतारके नाम लीलादिकनमें लागि, मनको त्याग करिकै चारों
शरीरनको त्याग करिदेउ । जब तुम अपने स्वरूप में स्थित रहौगे तब हंस
स्वरूप दै आपने धामको लै आवौंगो । यह बात कोई नहीं लखै है कहे जानै
है । जे हंसस्वरूप पाये कायाके बीर जीवहैं तेई जानै हैं याते साहबकी दया-
लुता व्यंजितभई ॥ १-४ ॥
इति तीसरा हिंडोला ।
हिंडोला समाप्त ।

अथ साखी ।
जाहिया जन्म मुक्ता हता, तहिया हता न कोइ ॥
छठी तिहारी हो जगा तू कहँ चला विगोइ ॥ १ ॥
गुरुमुख ॥ जीवसों साहब कहै हैं जहिया कहे प्रथम जब तुम जन्मते
मुक्त रह्यौहै कहे जन्ममरणते छूटे रह्यौहै तहिया कहे तब हता न कोय कहै ये मना-
दिक नहीं रहे । जो जहिया जन मुक्ता हता या पाठहोय तो साहब कहै हैं
कि हे जन हमारे दास जब तुम मुक्त रह्यो है तब ये मनादिक कोई नहीं रहे ।
अरु बिज्वर गुणातीत चिन्मात्र मेरो अंश सनातनको या स्वरूपते रह्यो है ।
छठई देइ हमारे पास है तू कहां विगरो जाइ है मनादिकनमें लगिकै तैं कैवल्य
शरीरमें टिकिकै हमारे प्रकाशमें स्थित रहे हमको नहीं जाने याहीते माया

( ५२६ ) बीजक कबीरदास ।

तोको धरिकै संसारमें डारिदियो । सो तुम कैवल्य तननें महाकारणमें, महा-
कारणते कारणमें, कारणते सूक्ष्ममें, सूक्ष्मते स्थूल शरीर में गयो । सो जों
अजहूं मनादिकनको त्यागिकै मोको जानै तौ मैं तोको हंसशरीरदेउँ, तामें
टिकि मेरे पास आवै । प्रथम साहब बरज्यो है ताको प्रमाण आगे बेलिमें
लिखियाये हैं । जो कोई कहै हैं कि, "हंसस्वरूपइते माया तोधरिलेआई है
औ भूलि भई है सो बिना बिचारेकहै है । पारिखकारिकैदेखो तो जो हंस स्वरू-
पईते माया धरि लेआवति; तौ पुनि जब हंसस्वरूप पावैगो तबहूं न माया
धरि लेआवैगी ? काहेते कि एक बार तो धरिही लेआई । ताते हंस शरीरते
माया नहीं धरियावैहै । जीव कैवल्य शरीरमें सदा स्थित रहै है तहां मनकी
उत्पत्ति होइहै । तब माया धरियावैहै । जीव संसारी ह्वैजाइहै । पुनि जब
महाप्रलय होइहै तब फेरि वही ब्रह्म प्रकाशमें जाइकै एकरूपते सब रहै है तामें-
प्रमाण ॥ "परेव्ययेसर्व एकीभवंति" ॥औसब वहै उत्पत्ति होइहै तामेंप्रमाण ॥
सदेवसौम्येदमग्रआसीत् एकमेवाद्वितीयम् । तदैक्षत एकोहं बहुस्याम्" इतिश्रुतेः॥
औ जब जीव संसारते मुक्त है जायहै तब साहब हंस स्वरूप देइहैं, तामें स्थित
ह्वैकै साहब के पास जाइहै ताकोप्रमाण आगे लिखियाये हैं, साहबके पास जाय
फेरि नहीं आवै ॥ तामें प्रमाण"नतद्भासयते सूर्योन शशांको न पावकः । यद्गत्वा-
न निवत्र्त्तन्ते तद्धाम परमं मम॥इतिगीतायाम् " ॥ औ जबजीव कैवल्य शरीरमें
रहै है सो सच्चिदानन्दरूप प्रकाशमें भरोरहै है, तहां जब मनको अंकुर वह चित्
होइ है तब तुरीय अवस्था को स्मरणहोइ है, सो याको महाकारणशरीर है ।
औ जब वह सुख के स्मरणते बासना उपजी तब सुषुप्ति अवस्था में मगनहोइहै
जागै है तब कहै है कि, आज खूब सोयो याको या कारण शरीर है । औ
जब वह बासना संकल्प बिकलपरूप भयो या याको सूक्ष्म शरीरहै स्वप्न अव-
स्थाको सुख भयो । औ जब संकल्प विकल्पते नाना कर्मनके फलते पृथिवी अपू
तेज वायु आकाशादिकते स्थूल शरीर पावै है तहां जागृत अवस्था सों सुख
होइहै तामें प्रमाण कबीर जी के ग्रन्थ पंचदेहकी निर्णयको ।

साखी। (५२७)
पंचदेहका निर्णय ॥
एकजीवको स्वतःपद, बुद्धिभ्राँति सोकाळ ।
कालहोइ यहकाल-रचि, तामें भये बिहाल ॥
बीहाले को मतो जो, देउ सकल बतलाय ।
जाते पारख प्रौढ़ लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥
करि अनुमान जो शून्यभो, सूझै कतहूं नाहिं ।
आपु आप बिसरो जबै तन बिज्ञान कहिताहि ॥
ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान ।
प्रतिबिंबित झाईं लखै, साक्षी रूप बखान ॥
साक्षी होय प्रकाश भो, महा कारण त्यहि नाम ।
मसुर प्रमाण सो बिम्बभो, नील बरण घन श्याम ॥
बढ़्यो बिम्ब अध पर्व भो, शून्याकार स्वरूप ।
ताको कारण कहतहैं, महँ अँधियारी कूप ॥
कारणसों आकार भो, श्वेत अँगुष्ठ प्रमान ।
वेद शास्त्र सब कहतहैं, सूक्ष्म रूप बखान ॥
सूक्ष्मरूपते कर्मभो, कर्महिंते यह अस्थूल ।
परा जीव या रहटमें, सहै घनेरी शूल ॥
संतौ षट प्रकारकी देही ।
स्थूल सूक्ष्म कारण महँकारण केवल हंस कि लेही ॥
साढ़े तीन हाथ परमाना देह स्थूल बखानी ।
राता बर्ण बैखरी बाचा जागृत अवस्था जानी॥
रजोगुणी ओंकार मातृका त्रिकुटी है अस्थाना ।
मुक्तिश्लोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना॥
पृथ्वी तत्त्व खेचरी मुद्रा मग पपील घट कासा ।
क्षए निर्णय बड़वाग्नि दशेंद्री देव चतुर्दश बासा ॥


१ इस ग्रन्थमें षट्देह को बर्णन है पर याको नाम पंचदेहका निर्णयहै याका कारण
यहहै कि, हंसदेह को दूसरे देहन के साथन मिलाय अलग माने हैं ।

( ५२८ ) बीजक कबीरदास ।
और अहै ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुन्नि संचारा ।
सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥
आदि अंत औ मध्य शब्द या लखै कोइ बुधिचारा ।
कहै कबीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥
संतौ सुक्ष्म देह प्रमाना ।
सूक्ष्म देह अँगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥
श्वेत बर्ण उँकार मात्रुका सतोगुण विष्णू देवा ।
ऊर्ध्व सुत्र औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥
मुक्ति सामीप लोक बैकुण्ठ पालन किरिया राखी ।
मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥
आव तत्त्व को हुं हंकारा मंदाअग्नी कहिये ।
पंच प्राण द्वितीया पद गाइत्री मध्यम बाणी लहिये ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा ।
कहै कबीर सुनौ भाइ संतौ यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥
संतौ कारण देह सरेखा ।
आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा बर्ण परेखा ॥
मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना ।
महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥
उदरा अग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीय पद गाइत्री अहै प्राज्ञ अभिमानी ॥
सामवेद पश्यन्ती बाचा मुक्त स्वरूप बखानी ।
तेज तत्त्व अद्वैतानन्द अहंकार निरबानी ॥
अहैं विशुद्ध महातम जामें तामें कछु न समाई ।
कारण देह इती सम्पूरण कहै कबीर बुझाई ॥ ३ ॥
सन्तौ महकारण तन जाना ।
नील बरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥
नाभि स्थान बिकार मात्रुका चिदाकाश परवानी ।

साखी। (५२९)
मारग मीन अगोचर मुद्रा वेद अर्थर्बन जानी ॥
ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदिशक्ति ततु बाऊ ।
आश्रय लोक बिदेहानंद मुक्ति साजोनि बताऊ ॥
नृणै प्रकाशिक तुरी अवस्था मत्यज्ञात्मतु अभिमानी ।
शीवं अहंकार महाकारण तन इहो कबीरबखानी ॥ ४ ॥
संतौ केवल देह बखाना ।
केवल सकल देहका साक्षी भमर गुफा अस्थाना ॥
निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा ।
सूक्ष्म वेद है उनमुन मुद्रा उनमुन वाणी लेखा ॥
ब्रह्मानंद कही हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना ।
पूरण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥
पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी ।
परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥
सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा ।
कालेतीत कला सम्पूरण केवल कहै कबीरा ॥ ५ ॥
संतौ सुनौ हंस तन ब्याना ।
अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥
नहिं उपजै नहिं बिनशैं कबहूं नहिं आवै नहिं जाहीं ।
इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥
मैं तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना ।
नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥
मन बुधि गुन इंद्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना ।
अकल अनीह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥
तत्त्व रहित रबि चंद्र न तारा नहिं देबी नहिं देवा ।
स्वयं सिद्धि परकाशक सोई : नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥
हंस देह विज्ञान भाव यह सकल बासना त्यागे ।
नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥
३४

( ५३० ) बीजक कबीरदास ।
निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि भये बिज्ञानी ।
उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच यह ठानी ॥
खोये आपु अपन पौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने ।
फिरि केवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महा कारण केवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौं नहीं कल्याना ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो खोज करो गुरु ऐसा ।
ज्यहिते आप अपन पौ जानो मेटो खटका रैसा ॥ ६ ॥
इति पंच देह निर्णय ।
औ जब पांचौशरीर ते भिन्न अपने को मान्यो अरु अपनेकों ब्रह्मरूप न
मान्यो यह मान्यो कि, मैं साहबको अंशहौ यह जान्यो तब साहब याको हंस-
शरीर देइहै । सो जैसे साहब अनिर्वचनीय रस रूप है ऐसे जीवो है रकार
रूप साहब है मकाररूप जीव है न्यूनता येती है साहब स्वामी है, जीव सेवक
है, साहब स्वतन्त्र है यह परतन्त्रहै साहब की मरजी ते सब काम करै है।
जैसे गुण साहबके हैं तैसे याहूके हैं, जैसे साहब नहीं आवै जायहै ऐसे यहो
नहीं आवै जायहै साहबके पासते । जैसे साहबकी सर्वत्र गति है ऐसे याहू की
सर्वत्र गति है साहब के बराबरयाको भोगहै तामें प्रमाणव्याससूत्रम्॥ “भोग-
मात्रसाम्यलिंगात् ” तामें प्रमाण षट्दोहावलीको शब्दभी कबीरजीका ॥ “तत्त्व
भिन्न निस्तत्त्व निरक्षर मनो पवनते न्यारा । नाद बिंदु अनहद अगोचर
सत्य शब्द निरधारा ॥” औ स्थूल शरीर पच्चीस तत्त्वको है पृथिवी अप तेज
वायु आकाश दश इन्द्री पञ्च प्राण मन बुद्धि चित्त अहंकार जीव । सो जाग्रत
अवस्था में अनुभव होइहै औ ऋग्वेदहै प्रथमपद गायत्री । औ सूक्ष्मशरीर
सत्रह तत्त्वकोहै पञ्चप्राण, दशइन्द्री मन, बुद्धि, सो स्वप्न अवस्थामें अनुभव
होइहै औ यजुर्वेदहै द्वितीयपदगायत्री । औ कारण शरीर तीनितत्त्वको है चित्त
अहंकार जीवात्मा सो सुषुप्ति अवस्था में अनुभवहोइहै सामवेद है तृतीयपद
गायत्री । और महाकारण शरीर दुइ तत्त्व कोहै अहंकार जीवात्मा सो तुरीया-
वस्था में अनुभव होइहै अथर्वणवेद है चतुर्थपदगायत्री है । जीव सूक्ष्मवेद

है नी ओंकार पञ्चमपद गांयत्री है बचनमें नहीं आवैहै ॥४॥ पंचम पद गांयत्री
नाम वेदहै तामें प्रमाण ॥ “निद्रादौ जागरस्यांते यो भाव उपपद्यते ॥ तम्भा-
वं भावयेन्नित्यमक्षयानंदमश्नुते”॥ औ कैवल्य शरीर एक तत्त्वको है चित्त मात्र
है औ जौन ब्रह्मको छठों शरीर मानि राख्यो सो निस्तत्त्व है सो वाको भ्रमहै,
कुछबस्तु नहीं है । सो जो कोई रामनामको स्मरण करत साहबको जान्यो
औ पांचो शरीरको त्यागकियो तब साहब हंसशरीर जीवको देइहै जो मनवचनमें
नहीं आवै है । सो हंसशरीर अनिर्वचनीयहै रसरूप है वह निस्तत्त्वहूसे परैहै
जब प्राकृत रसजोहै सोऊ व्यंजनावृत्ति करिकै जानोपरेहै तौ अमाकृत जो
मनवचनके परैहै वाको कोई कैसेजानै । सो तौने हंसशरीरमें प्राप्त ह्वै कै
साहबके पासजाइक फिरिनहीं आवैहै । उहां मायामनादिकनकी पहुंच-
नहीं है सो साहबकहैं कि हे जीव ! हंसस्वरूप जो छठौं शरीर तिहारो सो
हमारे पास है तू कहां मनादिकन में लगिकै बिगरे जाउहौ तुम हमारेपास
आवो । और अर्थ इनको स्पष्टै है अंतमें कछु अर्थ खोले देइ हैं । सो श्रीक-
बीरजी कहै हैं कि, षट जे हैं छयो शरीर तिनको रैसा कहे झगरा है सो
मेटो । जौने ब्रह्म प्रकाशमें तुम भरे रहेहौ सो वाको छठौ शरीर आपनो मानो
हौ सो तिहारो शरीर नहीं है, वामें परे तो पिशाचवत् उन्मत्तवत् है जाइ है
जाको भूत लगे है औ जो उन्मत्त होइ है ताको यथार्थ ज्ञान नहीं होइ
है । सो ऐसा गुरु करो जो साहबको बतावै तब आपनो छठा शरीर हंसस्व-
रूप पावोगे लोकमें जो साहब देइ है तौने इहां साहब कह्यो है कि, छठी
तिहारीही जगा कहे छठौं शरीर हंसस्वरूप हमारी जगह में कहे हमारे पास
है सो हमको जानोगे कि, वही ब्रह्म है तब हमारे दिये पावोगे जौन छठौं
शरीर तुम मानिराख्यो है औ खोजौहौ सो तिहारो नहीं है ताते तुम्हारो कार्य
न सरैगो ॥ १ ॥
शब्द हमारा तुम शब्दका, सुनि मति जाहु सरक्खि ।
जो चाहो निज तत्त्व को, तौ शब्दै लेहु परक्खि ॥२॥
साहब कहै हैं कि, शब्द जोहै हमारा रामनाम तौनेही शब्द के तुमहौ
सो रामनाम को सरैखिकै कहे बिचारिकै माया ब्रह्म में मतिजाहु । जो निज-

( ५३२ ) बीजक कबीरदास ।
तत्त्वको चाहो कि, मैं कौन तत्त्व यथार्थहौं तों शब्द जो रामनाम ताकों
परखि लेउ, अनादि शब्द यही है । मेरे धाममें यह नाम मेरो सदा बनो रहै
हैं जब आदि उत्पत्ति प्रकरण होइ है तब यही नाम लैकै यहीको अर्थ
वेदशास्त्र औ सब जगत् निकासिकै बाणी जगत् की उत्पत्ति करै है राम-
नाम को अर्थ मोमें रूढ़ है सो अर्थ बाणी गुप्तकै देइ है तौन अर्थ साधुजानै
हैं कि, रकारजे हैं साहब तिनको अकार जो है आचार्य्य सतगुरु सो मकार
जो है जीव ताको शरण करावै है सो तुम मकार तत्त्वहो ताको जानो चाहों
तो शब्द जो है मेरो रामनाम ताको परखो । जो ककारके समीप मकार होइ
तो वो मकार काम रूप संजै है औ जो दकारके समीप मकार होइ तो दाम
रूप संजैहैं इत्यादिक नाना शब्द संजै हैं तहां तौने रूप हैजाय है वतनी शुद्ध
ता नहीं रहि जाय है । जब वहै मकार रकार के समीप संजै है तबहीं शुद्ध
ता होइ है । ऐसे तुम मेरे समीप सजौहौ सो मेरे पास आवो मोको जानो तो
तुमहूं शुद्ध है जाउ । जैसे रकार के समीप मकार सदा रहै है तैसे तुमहूं
सदाके मेरे समीपी हो ताते मेरे समीप आवो औरेर में न लगो। रकार के शरण
मकार को अकार करावै तामें प्रमाण ॥ “रकारो रामरूपोयं मकारस्तस्यसे
वकः । अकारश्रीमकारस्य रकारे योजनीमता ॥” इति शम्भु संहितायाम् ॥२॥
शब्द हमारा आदिका, शब्दहि पैठा जीव ॥
फूल रहनकी टोकनी, घोरा खाया घीव ॥ ३ ॥
साहब कहै हैं कि हमारा शब्द जो रामनाम सो आदि को है आदिहीतें-
यहि शब्द में जीव पैठा है सो शब्द रामनाम जीवके रहिबेको पात्र है; जैसे
फूल के रहनकी टोकनी पात्र है । सो राम नामको लैकै निर्भय सुखपूर्वक
बिचरै, कछू भय न लगै । तौने रामनामको सार जो अर्थ है सोई घी है ताकों
घोरे जे पशु हैं गुरुवा लोग अज्ञानी ते खाइलियो । अथवा पूर्व में छांछकों
घोरा कहै हैं जामें सार नहीं है ऐसे जे हैं छांछ गुरुवा लोग ते साहब को
यथार्थ ज्ञान जो घी ताको खाइलियो कहे वाको और और अर्थ करिकै नाना
मतनमें लगाइ दियो । जो रामनाम मोको बतावै है सो अर्थ भुलायदियो गुरु
वा लोग बड़े घोर हैं येई संसारमें तोको डारि दियो है ॥ २ ॥

साखी। ( ५३३ )
शब्द विना श्रुति आंधरी, कहौ कहांको जाय ॥
द्वार न पावै शब्दको, फिरि फिरि भटका खाय ॥ ४ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, श्रुति जो है सो शब्द जो है रामनाम ताके बिना
आंधरी है । काहेते कि, रकार मकार श्रुति की आंखी हैं ताके बिना कहांको
जाय । सो शब्द जो रामनाम है तौनेको द्वार नहीं पावै अर्थात् अर्थ नहीं
जानै । रामनाम तो साहबमुख अर्थमें मन बचनके परे पदार्थ बतावै है और या
श्रुति नेति नेति कहि बतावै है । याते रामनामको साहब मुख अर्थ नहीं कहि
सकैहै । याते यामें परिकै जीव फिरि २ भटका खायहै । ज्ञान, भक्ति, बिज्ञान,
योग; बतावै है फिर फिरि नेति नेति कहि कहि देइहै, याते जीव भटकाखा-
इहै । उहां बस्तु कुछ नहीं पावै है जो रामनामको साहब मुख अर्थ जीव जानि-
कै लगावै तौ सब श्रुति लागि जायँ । औ सबके परे पदार्थ सो जानि जाहिं ।
काहेते बिना आंखी कोई नहीं देखै । जौनी तरहते राम नामते सब श्रुति
लागिजायहैं औ अनिर्वचनीय पदार्थ मालूम होयहै सो पीछे लिखि आये हैं ॥ ४ ॥
शब्द शब्द बहु अंतर हीमें, सार शब्द मथि लीजै ॥
कह कबीर जेहि सार शब्द नहिं, धिग जीवन तेहि दीजै ५
जहां जहां अन्तर तहां तहां बहुत शब्द देखे हैं। औ तुम रामनामको अनि-
र्वचनीय है श्रुति की आँखी हैं या कहौ हौ सो कैसे होइगो ? एकशब्द - वोहू
होइगो? सो या ऐसो नहींहै सार शब्दहै जब सब शब्दनको मथै तब वा जानि
परै । सो श्री कबीरजी कहै हैं कि, जेहि को सार जो रामनाम सो नहीं मथि-
लियोहै, ताको जीवन संसार में धिगहै । “सारशब्द मतलींजै” जो यह पाठ
होइ तौ सारशब्द रामनाम ताको मतिलेइ । और जे मतिहैं ते कुमतिहैं तेहिको
छोड़िदे । रामनाम वर्णन सब श्रुति की आंखी हैं तामें प्रमाण ॥ “आखर मधुर
मनोहर दोऊ । वरण बिलोचन जन जिय जोउ”॥ १ ॥ “मुक्तिस्त्रीकर्णपूरे-
र्मुनिहृदयवयःपक्षीतीरभूमिः संसारापारसिंधोः कलिकलुषतमस्तोमसोमार्कबिम्बे।
उन्मीलत्पुण्यपुंजद्रुमललितदलेलोचनेचश्रुतीनां कामंरामेतिवर्णौशमिहकलयतां
'ततंसज्जनानाम् ॥ ५ ॥

( ५३४ ) बीजक कबीरदास ।
शब्दै मारा गिरि गया, शब्दै छोड़ा राज ॥
जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनको सरिया काज ॥६॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि शब्दजो रामनामतौनैको जगत्मुख अर्थमें वेदशा-
स्त्र पुराण नानामतजे निकसे हैं तामें जो परचो सो गिरगया अर्थात् संसारमें
परचो औ जिन जिन शब्द विवेकिया कहै सब शब्दनते बिचारकरि सारशब्द-
जो रामनाम ताकोजानि लियो सोई संसाररूप राजको छोड़िदिये हैं औ तिनहीं
को काजसरियाकहै सिद्धभयो है ॥ ६ ॥
शब्द हमारा आदि का, पल पल करै जो यादि ॥
अंत फलैगी माहली, उपरकी सब वादि ॥ ७ ॥
गुरुमुख । साहबकहैंहैं हे जीवो ! हमारा शब्द जो रामनाम सोई आदिको है
अर्थात् याहीते प्रणव वेदशास्त्र बाणी सब निकसे हैं सो याको आदिकहे स्मरण
जो पल पल कहे निरन्तर करैगो तौ अन्तमें फलैगी साकेत जो हमारो महल-
ताको माहली होइगो बसैया होइमो अर्थात् तहांको जाइगो और ऊपरके जे सब
नाना मतहैं ते वादि कहे मिथ्या हैं अथवा और सब ऊपरके मत बाद विवादहैं ॥७
जिन जिन संबल ना किया, अस पुर पाटन पाय ॥
झाल परे दिन पाथये, संबल किया न जाय ॥ ८ ॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि, अस पुरपाटन जो या मानुष शरीर तौनै को पाय
कै, जिन जिन पुरुष संबल न किया कहै सम्यक् प्रकार बल न कियो अर्थात्
मनादिकनको न जीति लियो, साहब को न जान्यो । अथवा संबलकहे जमा,
सो परलोक की जमा रामनामको न जानि लियो । अथवा सन्बलकहे कलेवा
सो जो कलेवा साधन लै न लियो अर्थात् भजन न कै लियो सो दिन अथये कहैं
शरीर छूटे झालिपरे अर्थात् चौरासी लाख योनि में परचो अब सबल कियो
नहीं जायहै ॥ ८ ॥
इहई सम्बल करिले, आगै विषमी वाट ॥
सरग बिसाहन सब चले, जहँ बनियां नाहिं हाट ॥ ९ ॥

साखी । ( ५३५ )
इहई कहै यहीं संसारमें सम्बल कहे कलेवा सम्पन्न करिले आगें ।
विषमी बाट कहे कठिन दुखदाई बाटको, सो श्री कबीरजी कहै हैं कि,
आगे न जाने कौनी योनि में परैगो और वहाँ कछु किये होइगो कि नहीं ।
अथवा जो या कहो कि, स्वर्गमें विसाहन करि लेउँगे अर्थात् सौदा करि-
लेउँगे अर्थात् वहँ साहबको जानन वारो कर्म करिलेउँगे । तो वहां न बनियां
है न हाट है अर्थात् वह तो भोगभूमि है कर्म भूमि नहीं है स्वर्ग के शरीर
से केवल मृत्यु लोकमें किये कर्मनको भोग होइहै कर्म करिवे को स्थानतो या
मनुष्य शरीर औरे या मृत्यु लोकही है । ताते श्री कबीरजी कहै है हे जीवो !
यहांहीं सुकर्म करि लेउ ॥ ९ ॥
जो जानौ जिव आपना, तो करहु जीवको सार ।
जियरा ऐसा पाहुना, मिलै न दूजी वार ॥ १० ॥
हे जीवो! जो अपने स्वरूप को जानो तो जीव का सार जो सार शब्द
तामें रकारके समीप मकार अपने स्वरूपको करौ अर्थात् साहबको जानि साहबको
होउ । सो हे जीवो ! रा अर्थात् रामनाम ऐसो पाहुना दूजी बार ना मिलैगो । भाव
यह है कि, याही मनुष्य शरीर में मिलैगो और कहीं ना मिलैगो ॥ १० ॥
जो जानहु पिव आपना, तो जानौ सो जीव ।
पानिपचावहु आपना, पानी मांगि न पीव ॥ ११ ॥
जो आपनां पीव जे साहब हैं तिनको जानौ तो हम तुमको जानें कि, तुम
जीव हौ । पानिप जो शोभा सो जो अपनी शोभा ( प्रतिष्ठा ) चाहो तौ
पानी जे गुरुवा लोगोंकी नाना वाणी है तिनको मांगिके ना पिउ अर्थात् गुरुवन
ते अपने साहबको ज्ञान मत लेउ वे तो ठग हैं तुझे ठग लेउँगे ॥ ११ ॥
पानि पियावत क्या फिरो, घर घर सायर बारि ।
तृषावन्त जो होयगा, पीवेगा झख मारि ॥ १२ ॥
साहब कहैं हैं श्रीकबीरजीसे । हे कबीर ! मेरो उपदेश रूप पानी जीवन
को पियावत घर घर का ( क्या ) फिरो हौ । सबके समुद्र भरो है अर्थात्

( ५३६ ) बीजक कबीरदास ।
सब अपनी २ वाणी और कल्पना में मस्त हैं । जो तृषित होइँगे अर्थात् मुक्तिको
चाहैंगे तो तुम्हार उपदेश रूपपानी झख मारिके कहे लाचार ह्वै कै आपै पियेंगे ।
समुद्रका खाराजल त्यागि देंगे ॥ १२ ॥
हंसा मोती बिकानिया, कंचन थार भराय ।
जो जस मर्म न जानिया, सो तस काह कराय॥१३॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, हे विवेकी जीवौ ! हे हंसो ! कंचन थार रूप जो
तुम्हारे अन्त करणः तामें मोती रूप साहब को ज्ञान मोते भराओ अर्थात् मैं तौ
तुमको उपदेश देऊँहौं तुम कहा बिकत फिरौ हौ । जौन जस पदार्थ होइ है तौने
को तस न जानत है तौ वाको लै कै का करै ।
अथवा-कबीरजी कहैं हैं हे हंसो ! हे जीवो ! मोती जो निर्मल शुद्धरूप
आपना स्वरूप तौनैंको कंचन थार जो माया तौने में भरिके विकनिडारे अर्थात्
कनक कामिनीमें लगाई कै मायाके हाथ बेचिडारे । सो जो जौने तराते
आपने स्वरूपको न जानि सक्यो सो जाहिमें जैसौ लग्यो ताहिमें तैसो ह्वै अज्ञान
भयो । अब कहा करै मायामें फंसिकै मरिगै ॥ १३ ॥
हंसा तुम सुवरण वर्ण, का वरणौं मैं तोहि ।
तरवर पाय पहेलि हो, तबै सराहौं छोहि ॥ १४ ॥
हे हंसा जीव ! तुम सुवरण जे मकार ताके बर्णहौ, मैं तोंही का वरणौं
अर्थात् तुमहूं मन बचनके परे हौ सो तरिवर जो या संसार ताको जब
पाइके पहेलिहो कहे ठेलि जैहो अर्थात् संसार को दूरि करि दैहो तबही मैं तो-
को छोह करिके सराहौं गौ कि बड़े बन्धनमें बंधिके छूट्यो ॥ १४ ॥
हंसा तू तो सबल था, हलकी अपनी चार ।
रंग कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १५ ॥
हे हंसा जीवो ! तुमतो सबल कहे सम्यक् प्रकार बलवाले थे ( तेहोरो
साहबौ सबलहै ) परंतु अपनी चार कहे अपनी चालते हलुक कहे निबल ह्वै
गयो काहेते कि रंग कुरंग जो या संसार है तौनेमें रंगिगै कहै राग करि लियो।