कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२६ ) बीजक कबीरदास ।
तोको धरिकै संसारमें डारिदियो । सो तुम कैवल्य तननें महाकारणमें, महा-
कारणते कारणमें, कारणते सूक्ष्ममें, सूक्ष्मते स्थूल शरीर में गयो । सो जों
अजहूं मनादिकनको त्यागिकै मोको जानै तौ मैं तोको हंसशरीरदेउँ, तामें
टिकि मेरे पास आवै । प्रथम साहब बरज्यो है ताको प्रमाण आगे बेलिमें
लिखियाये हैं । जो कोई कहै हैं कि, "हंसस्वरूपइते माया तोधरिलेआई है
औ भूलि भई है सो बिना बिचारेकहै है । पारिखकारिकैदेखो तो जो हंस स्वरू-
पईते माया धरि लेआवति; तौ पुनि जब हंसस्वरूप पावैगो तबहूं न माया
धरि लेआवैगी ? काहेते कि एक बार तो धरिही लेआई । ताते हंस शरीरते
माया नहीं धरियावैहै । जीव कैवल्य शरीरमें सदा स्थित रहै है तहां मनकी
उत्पत्ति होइहै । तब माया धरियावैहै । जीव संसारी ह्वैजाइहै । पुनि जब
महाप्रलय होइहै तब फेरि वही ब्रह्म प्रकाशमें जाइकै एकरूपते सब रहै है तामें-
प्रमाण ॥ "परेव्ययेसर्व एकीभवंति" ॥औसब वहै उत्पत्ति होइहै तामेंप्रमाण ॥
सदेवसौम्येदमग्रआसीत् एकमेवाद्वितीयम् । तदैक्षत एकोहं बहुस्याम्" इतिश्रुतेः॥
औ जब जीव संसारते मुक्त है जायहै तब साहब हंस स्वरूप देइहैं, तामें स्थित
ह्वैकै साहब के पास जाइहै ताकोप्रमाण आगे लिखियाये हैं, साहबके पास जाय
फेरि नहीं आवै ॥ तामें प्रमाण"नतद्भासयते सूर्योन शशांको न पावकः । यद्गत्वा-
न निवत्र्त्तन्ते तद्धाम परमं मम॥इतिगीतायाम् " ॥ औ जबजीव कैवल्य शरीरमें
रहै है सो सच्चिदानन्दरूप प्रकाशमें भरोरहै है, तहां जब मनको अंकुर वह चित्
होइ है तब तुरीय अवस्था को स्मरणहोइ है, सो याको महाकारणशरीर है ।
औ जब वह सुख के स्मरणते बासना उपजी तब सुषुप्ति अवस्था में मगनहोइहै
जागै है तब कहै है कि, आज खूब सोयो याको या कारण शरीर है । औ
जब वह बासना संकल्प बिकलपरूप भयो या याको सूक्ष्म शरीरहै स्वप्न अव-
स्थाको सुख भयो । औ जब संकल्प विकल्पते नाना कर्मनके फलते पृथिवी अपू
तेज वायु आकाशादिकते स्थूल शरीर पावै है तहां जागृत अवस्था सों सुख
होइहै तामें प्रमाण कबीर जी के ग्रन्थ पंचदेहकी निर्णयको ।