कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तीसराहिंडोला ॥ ३ ॥
जहँ लोभ मोहके खम्भ दोऊ मनँ रच्योहौ हिंडोर ।
तहँ झूलहिं जीव जहान जहँ लगि कतहूँ नहिं थिति ठोर ॥ १॥
चतुरा झूलैं चतुराइया औ झूलैं राजा सेव ।
अरु चन्द्र सूरज दोऊ झूलहिं नाहिं पायो भेव ॥ २ ॥
चौरासि लक्षहु जीव झूलैं धरहिं रविसुत धाय ।
कोटिन कलप युग बीतिया मानै न अजहूं हाय ॥ ३ ॥
धरणी आकाशहु दोऊ झूलैं झुलैं पवनहुँ नीर ।
धरि देह हरि आपहू झूलहिं लखहिं हंस कबीर ॥ ४ ॥
जौन जगतमें लोभ मोहके खम्भ बनाइकै मनको रच्यो जो हिंडोल ताहीमें
सब जहानके जीव झूलै हैं थिर नहीं कौनौ ठौर में रहैं हैं । चतुर चतुराईते झूलै
हैं,राजा झूलै हैं, सेवक झूलै हैं, चंद्र, सूर्य तेऊ झूलै हैं । हिंडोलाको भेद नहीं
पावैंहैं । चौरासी लक्ष योनिके जीव झूलैहैं तिनको सबको रवि सुत जे यमराज ते
धरैं हैं । सो कोटिन कल्प बीतिगये जीवनको झूलत परन्तु अजहूं नहीं मानै है
औ धरणी आकाश पवन पानी ये सब वही हिंडोलामें झूलै हैं औ देहधरिकै कहे
अवतारलैकै जौनी रीति सब झूलै हैं तौनी रीति हरि आपहू झूलै हैं । जीवनकों
यह दिखाइबे को कि, जैसे तुमहूं झूलौहौ तैसे हमहूं झूलै हैं सो देहधरेको फल
यह है इन को हेतु कोई जानि नहीं सकै है कि, जीवनपर दयाकरिकै उद्धार
करिबे को हेतु दिखावै हैं कि, देहको फल यह संसारई है ताते देहको अभिमान
छोड़ि हमारे अवतारके नाम लीलादिकनमें लागि, मनको त्याग करिकै चारों
शरीरनको त्याग करिदेउ । जब तुम अपने स्वरूप में स्थित रहौगे तब हंस
स्वरूप दै आपने धामको लै आवौंगो । यह बात कोई नहीं लखै है कहे जानै
है । जे हंसस्वरूप पाये कायाके बीर जीवहैं तेई जानै हैं याते साहबकी दया-
लुता व्यंजितभई ॥ १-४ ॥
इति तीसरा हिंडोला ।
हिंडोला समाप्त ।