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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

साखी। (५२९)
मारग मीन अगोचर मुद्रा वेद अर्थर्बन जानी ॥
ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदिशक्ति ततु बाऊ ।
आश्रय लोक बिदेहानंद मुक्ति साजोनि बताऊ ॥
नृणै प्रकाशिक तुरी अवस्था मत्यज्ञात्मतु अभिमानी ।
शीवं अहंकार महाकारण तन इहो कबीरबखानी ॥ ४ ॥
संतौ केवल देह बखाना ।
केवल सकल देहका साक्षी भमर गुफा अस्थाना ॥
निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा ।
सूक्ष्म वेद है उनमुन मुद्रा उनमुन वाणी लेखा ॥
ब्रह्मानंद कही हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना ।
पूरण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥
पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी ।
परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥
सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा ।
कालेतीत कला सम्पूरण केवल कहै कबीरा ॥ ५ ॥
संतौ सुनौ हंस तन ब्याना ।
अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥
नहिं उपजै नहिं बिनशैं कबहूं नहिं आवै नहिं जाहीं ।
इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥
मैं तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना ।
नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥
मन बुधि गुन इंद्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना ।
अकल अनीह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥
तत्त्व रहित रबि चंद्र न तारा नहिं देबी नहिं देवा ।
स्वयं सिद्धि परकाशक सोई : नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥
हंस देह विज्ञान भाव यह सकल बासना त्यागे ।
नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥
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