कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३२ ) बीजक कबीरदास ।
तत्त्वको चाहो कि, मैं कौन तत्त्व यथार्थहौं तों शब्द जो रामनाम ताकों
परखि लेउ, अनादि शब्द यही है । मेरे धाममें यह नाम मेरो सदा बनो रहै
हैं जब आदि उत्पत्ति प्रकरण होइ है तब यही नाम लैकै यहीको अर्थ
वेदशास्त्र औ सब जगत् निकासिकै बाणी जगत् की उत्पत्ति करै है राम-
नाम को अर्थ मोमें रूढ़ है सो अर्थ बाणी गुप्तकै देइ है तौन अर्थ साधुजानै
हैं कि, रकारजे हैं साहब तिनको अकार जो है आचार्य्य सतगुरु सो मकार
जो है जीव ताको शरण करावै है सो तुम मकार तत्त्वहो ताको जानो चाहों
तो शब्द जो है मेरो रामनाम ताको परखो । जो ककारके समीप मकार होइ
तो वो मकार काम रूप संजै है औ जो दकारके समीप मकार होइ तो दाम
रूप संजैहैं इत्यादिक नाना शब्द संजै हैं तहां तौने रूप हैजाय है वतनी शुद्ध
ता नहीं रहि जाय है । जब वहै मकार रकार के समीप संजै है तबहीं शुद्ध
ता होइ है । ऐसे तुम मेरे समीप सजौहौ सो मेरे पास आवो मोको जानो तो
तुमहूं शुद्ध है जाउ । जैसे रकार के समीप मकार सदा रहै है तैसे तुमहूं
सदाके मेरे समीपी हो ताते मेरे समीप आवो औरेर में न लगो। रकार के शरण
मकार को अकार करावै तामें प्रमाण ॥ “रकारो रामरूपोयं मकारस्तस्यसे
वकः । अकारश्रीमकारस्य रकारे योजनीमता ॥” इति शम्भु संहितायाम् ॥२॥
शब्द हमारा आदिका, शब्दहि पैठा जीव ॥
फूल रहनकी टोकनी, घोरा खाया घीव ॥ ३ ॥
साहब कहै हैं कि हमारा शब्द जो रामनाम सो आदि को है आदिहीतें-
यहि शब्द में जीव पैठा है सो शब्द रामनाम जीवके रहिबेको पात्र है; जैसे
फूल के रहनकी टोकनी पात्र है । सो राम नामको लैकै निर्भय सुखपूर्वक
बिचरै, कछू भय न लगै । तौने रामनामको सार जो अर्थ है सोई घी है ताकों
घोरे जे पशु हैं गुरुवा लोग अज्ञानी ते खाइलियो । अथवा पूर्व में छांछकों
घोरा कहै हैं जामें सार नहीं है ऐसे जे हैं छांछ गुरुवा लोग ते साहब को
यथार्थ ज्ञान जो घी ताको खाइलियो कहे वाको और और अर्थ करिकै नाना
मतनमें लगाइ दियो । जो रामनाम मोको बतावै है सो अर्थ भुलायदियो गुरु
वा लोग बड़े घोर हैं येई संसारमें तोको डारि दियो है ॥ २ ॥