कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ हिंडोला ।
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खंभ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गह्यो दूनौ पानि ॥२॥
झूले सो गण गंधर्व मुनि नर झूले सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झुलत व्यास फणिन्द्र ॥३॥
झूलत विरंचिं महेश मुनि हो झुलत सूरज इन्दु ।
औ आप निरगुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविन्दु ॥ ४ ॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौ खानि वानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥५॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं ।
कालहु अकालहु प्रलय नहिं तहँ संत विरले जाहिं ६॥
खण्डहु ब्रह्मण्डहु खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यह साधु संग विचारि देखौ जीउ निसतरि जाहिं॥७॥
तहँके बिछुरि बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अब साधु संगति शोचि देखौ बहुरि उलटि समाय८॥