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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

( ५३० ) बीजक कबीरदास ।
निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि भये बिज्ञानी ।
उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच यह ठानी ॥
खोये आपु अपन पौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने ।
फिरि केवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महा कारण केवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौं नहीं कल्याना ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो खोज करो गुरु ऐसा ।
ज्यहिते आप अपन पौ जानो मेटो खटका रैसा ॥ ६ ॥
इति पंच देह निर्णय ।
औ जब पांचौशरीर ते भिन्न अपने को मान्यो अरु अपनेकों ब्रह्मरूप न
मान्यो यह मान्यो कि, मैं साहबको अंशहौ यह जान्यो तब साहब याको हंस-
शरीर देइहै । सो जैसे साहब अनिर्वचनीय रस रूप है ऐसे जीवो है रकार
रूप साहब है मकाररूप जीव है न्यूनता येती है साहब स्वामी है, जीव सेवक
है, साहब स्वतन्त्र है यह परतन्त्रहै साहब की मरजी ते सब काम करै है।
जैसे गुण साहबके हैं तैसे याहूके हैं, जैसे साहब नहीं आवै जायहै ऐसे यहो
नहीं आवै जायहै साहबके पासते । जैसे साहबकी सर्वत्र गति है ऐसे याहू की
सर्वत्र गति है साहब के बराबरयाको भोगहै तामें प्रमाणव्याससूत्रम्॥ “भोग-
मात्रसाम्यलिंगात् ” तामें प्रमाण षट्दोहावलीको शब्दभी कबीरजीका ॥ “तत्त्व
भिन्न निस्तत्त्व निरक्षर मनो पवनते न्यारा । नाद बिंदु अनहद अगोचर
सत्य शब्द निरधारा ॥” औ स्थूल शरीर पच्चीस तत्त्वको है पृथिवी अप तेज
वायु आकाश दश इन्द्री पञ्च प्राण मन बुद्धि चित्त अहंकार जीव । सो जाग्रत
अवस्था में अनुभव होइहै औ ऋग्वेदहै प्रथमपद गायत्री । औ सूक्ष्मशरीर
सत्रह तत्त्वकोहै पञ्चप्राण, दशइन्द्री मन, बुद्धि, सो स्वप्न अवस्थामें अनुभव
होइहै औ यजुर्वेदहै द्वितीयपदगायत्री । औ कारण शरीर तीनितत्त्वको है चित्त
अहंकार जीवात्मा सो सुषुप्ति अवस्था में अनुभवहोइहै सामवेद है तृतीयपद
गायत्री । और महाकारण शरीर दुइ तत्त्व कोहै अहंकार जीवात्मा सो तुरीया-
वस्था में अनुभव होइहै अथर्वणवेद है चतुर्थपदगायत्री है । जीव सूक्ष्मवेद