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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 562

( ५१८ ) बीजक कबीरदास ।
बी कहैं दुइ विद्या अविद्या रूपको, रहुली कहै रहनवाली जो माया ताको ।
सो कबीरजी कहै हैं कि, विद्या अविद्या दुहुनको न आदि है न अंत है अर्थात्
विचार कीन्हे भ्रममात्रै है जीव छूटि मात्र जाइ है । सो बिरहुली जो माया
ताके न जड़ है न पेड़ है न पल्लव है अर्थात् विचार कीन्हे मिथ्या है ॥ १ ॥
जब निशिवासर नहीं होत है तबहूं बिरहुली माया रही है जब पानी पवन
नहीं रह्यो तबहूं बिरहुली माया रही है औ ब्रह्मा सनकादिककी आदि बिरहुली
है औ जोन योग अपार कथि गये हैं सोऊ बिरहुली है ॥ २ ॥ ३ ॥
मासअसाढ़हिशीतविरहुली।बोइनसातौबीजविर हुली ॥४॥
नितगोड़ैनितसिंचैविरहुली।नितनवपल्लवपेड़बिरहुली॥५॥
जब प्रथम उत्पत्ति भई है सोई आषाढमास है काहेते चौमास को आदि
आषाढ है । तैसे युगनको आदि सतयुग है सो कैसा है शीतकहे शुद्ध सतोगुण
है तौनेमें जीव को जो सातौ सुरति तेई हैं बीज तेके बोवत भये ते सब बिरहुलिन
आइ सो मंगलमें लिखि आये हैं कि ॥ “ सात सुरति सब मूल हैं । मलयडु
इनहीं माँह ” ॥ सो जीव नितगोड़ै है गुरुवनते वोई कर्म्म पूछै है खोदि
खोदि नित सींचै है कहे वोई कर्म्म करै है जाते बिरहुली कहे माया बढ़तै
जाइ है ॥४॥ ५ ॥
छिछिलबिरहुलीछिछिलबिरहुली।छिछिलरहलतिहुँलोकबिरहुली ६
फूलएकभलफूललविरहुली।फूलिरहलसंसारविरहुली॥७॥
कहूं विद्यारूपते छिछिली है बिरहुली माया; कहूं अविद्या रूपते छिछिली
है बिरहुली माया । यही रीतिते तीनों लोकमें बिरहुली छिछिलरही है । सो
यही माया बिरहुली में कहूं कर्म्मत्यागरूप एक फूल धोखा ब्रह्म फूलि रह्यो है
ताही में सब संसार लगिकै फूलि रहे कहे आनन्द मानि लिये हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥
तेफुलबन्दैभक्तिबिरहुली । वांधिकैराउरजायविरहुली ॥८॥
तेफुललेहींसंतविरहुली । डसिगोबेतलसांपबिरहुली ॥९॥