सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

रचना भई सों इनमें चारिउ खानिके परे जे जीव तिनकी हम चारिउ बानीतें
वेदशास्त्रादिकनते बिचारि खोजि देख्यो कोई थिर नहीं रहे हैं सबै झूलैहैं ।
सो तैं यहां को नहीं है तैं तो बाहर को है जहां यहां की साजु उहां एकौ
नहीं है ॥ ५ ॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं।
कालौ अकालो प्रलयनाहिं तहँ सन्तबिरले जाहिं ॥६॥
खण्डौ ब्रह्माण्डौ खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यहसाधुसंग बिचारि देखौ जीव निस्तारि जाहिं ॥७॥
न उहां सूर्य है, न चन्द्र है, न दिनहै, न राति है, न संध्याहै न पांचौ
तत्वहैं, न कालहै, न अकालहै, न उहां प्रलयहै, ऐसी जगहमें कोई विरले संत
जाइहैं ॥ ६ ॥ पुनि कैसो है जाको खण्ड जो शरीर ब्रह्माण्ड जो जगत् तामें
वाको छहउ दर्शन वारे खोजि खोजिहारे परन्तु पाये नहीं न संसारते छूटे ।
सो ऐसे लोकको साधुजे हैं तिनको सङ्गरिकै विचारिकै देखै जाते जीव यहीं
संसारते निस्तारि जाइ ॥ ७ ॥
तहँ कोबिछुर बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अवसाधु संगति शोचिदेखौ बहुरि उलटि समाय॥८॥
तेहि झूलवे की भय नहीं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन॥६॥
सो ऐसे लोकते बिछुरे तोको केतन्यों कल्प व्यतीत भये तैं संसारमें भुला
यकै परे आय सो तैं अब साधु सङ्गतिकरि बिचारि कै रामनामको जानै जाते
बहुरिकै तहँ समाय अर्थात् जहांतें आये है तहँ जाय । या संसार हिंडोला छांडु
जो कोई साहबके जाननवारे सुजान साधुहैं तिनको या हिंडोलामें झूलबे की
भयनहीं है। तिनसों श्री कबीरजी कहै हैं कि, जो याको सतसुकृतराम नाम मिलै
तो फिर आनि बार न झूलै। रामनाम को जपिबो जो है सोई सत्य सुकृतहै वही
बाङ् मनो गोचरातीत जे श्रीरामचन्द्र हैं । तिनके और जे सुकृतहैं ते क्षयमा-
नहीं औ रामनाम पास पहुँचावे है जहांतें नहीं लौटे है तामें प्रमाण ॥ "सप्तको-