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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 572

( ५२८ ) बीजक कबीरदास ।
और अहै ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुन्नि संचारा ।
सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥
आदि अंत औ मध्य शब्द या लखै कोइ बुधिचारा ।
कहै कबीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥
संतौ सुक्ष्म देह प्रमाना ।
सूक्ष्म देह अँगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥
श्वेत बर्ण उँकार मात्रुका सतोगुण विष्णू देवा ।
ऊर्ध्व सुत्र औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥
मुक्ति सामीप लोक बैकुण्ठ पालन किरिया राखी ।
मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥
आव तत्त्व को हुं हंकारा मंदाअग्नी कहिये ।
पंच प्राण द्वितीया पद गाइत्री मध्यम बाणी लहिये ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा ।
कहै कबीर सुनौ भाइ संतौ यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥
संतौ कारण देह सरेखा ।
आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा बर्ण परेखा ॥
मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना ।
महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥
उदरा अग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीय पद गाइत्री अहै प्राज्ञ अभिमानी ॥
सामवेद पश्यन्ती बाचा मुक्त स्वरूप बखानी ।
तेज तत्त्व अद्वैतानन्द अहंकार निरबानी ॥
अहैं विशुद्ध महातम जामें तामें कछु न समाई ।
कारण देह इती सम्पूरण कहै कबीर बुझाई ॥ ३ ॥
सन्तौ महकारण तन जाना ।
नील बरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥
नाभि स्थान बिकार मात्रुका चिदाकाश परवानी ।