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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 567

हिंडोला । ( ५२३ )
टिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः ॥ एक एव परो मंत्रो रामइत्यक्षरद्वयम्” ॥
इतिसारस्वततंत्रे ॥ दूसराप्रमाण ॥ “इममेवपरंमन्त्रं ब्रह्मरुद्रादिदेवताः॥ऋषयश्च
महात्मानो मुक्ता जप्त्वाभवाम्बुधेः” ॥ इति पुलहसंहितास्मृतिः ॥ ८ ॥ ९ ॥
इति प्रथम हिंडोला समाप्त ।
अथ दूसरा हिंडोला ।
बहुविधिके चित्र बनाइकै हरि रच्यो क्रीडा रास ।
ज्यहि नाहिं इच्छा झूलबे अस बुद्धि केहिके पास॥१॥
झूलत झूलत बहु कल्प बीते मन न छोड़ै आस ।
यह रच्यो रहस हिंडोलना निशि चारि युगचौमास॥२॥
कवहूंक ऊँच नीचे कवहूं स्वर्ग भूलौं जाय ।
अति भ्रमत भ्रर्माहिं हिंडोलना सो नेकु नहिं ठहराय॥३॥
डरपत रहौ यहि झूलिवेको राख यादवराय ।
कह कबीर सुनु गोपाल विनती शरण हौं तुवपाय ॥४॥
बहुतबिधि चित्र बनाइकै या जगत् हरि जे हैं गोलोकबासी कृष्णचन्द्र
आपनी क्रीडा बनाइ राख्यो है अर्थात् अन्तर्यामी रूपते आपही बिहार करें हैं ।
सो या जगतरूप हिंडोला में झूलिबेकी बुद्धि केहिके नहीं आई अर्थात् सबैकै है
न झूलिबेकी बुद्धि कोई विरले सन्तन के है । सो ऐसो हिंडौलाना चारि युग
जे हैं चौमास तामें रच्यो है जीवनके झूलत झूलत कोटिन कल्प व्यतीत भये
तऊ झूलिबेकी आशा मन नहीं छोड़ै है । हिंडोलाके चढ़ैया कहूं नीचे आवै है
कहूं ऊंचे जायहैं ऐसे अति भ्रमत जो जगत रूप हिंडोला तामें परे जे जीव त
कहूं नरकको जायँ हैं, कहुं स्वर्गको जाय है । सो हे जीवौ! या जगतरूप हिंडोला
झूलिबेको डरत रहो राख यादवराय या कहौ कि हे यादवराय कृष्णचंद्र हमको
बचायो। सो हे कायाके वीरौ जीवौ ! यह कहौ कि,हे गोपाल ! गो जे हैं इन्द्रिय
तिनके रक्षा करनवारे हमारी बिनती सुनो हम तुम्हार चरण शरण हैं ॥ —४॥