कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिंडोला । ( ५२१ )
तेहि झूलेबेकी भय नहिं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन९॥
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गहे दूनौ पानि ॥ २ ॥
परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के बिनाजाने भरमको हिंडोला सब संसार
झूलैहै कैसोहै हिंडोला; जहां पाप पुण्य रूप दोऊ खंभहैं, माया जोहै सो मेरु-
कहै गोलाहै, जौनेमें कर्मरूपी पटुली है, ताहीमें बैठिकै को नहीं झूल्यो अर्थात्
सब झूल्यो है ॥ १॥ लोभ जो है सोई मरुवा लगो है, विषय जो है सोई भ्रमरा
है, काम जो है सोई कीला है, औ शुभ औ अशुभ जे उपासनाहैं तेई डांडी हैं
ताको पाणिते गहिकै सब झूलैहैं ? को को झूलै हैं ताका आगे कहै हैं ॥ २ ॥
झूलै सो गण गन्धर्व मुनि नर झूलै सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झूलत ब्यास फणिन्द्र ॥ ३ ॥
झूलत विरंचि महेश मुनि हो झूलत सूरज इंदु ।
औ आपु निर्गुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविंदु ॥ ४ ॥
गन्धर्व मुनि नर सुरगण इंद्र नारद शारदा व्यास फणीन्द्र जे हैं शेष महेश
जेहैं विरञ्चि सूर्य्य चंद्रमा ये सब झूलैहैं और कहां तक कहैं सगुण निर्गुण
रूपते अर्थात् चित्तअचित् के अंतर्यामी ह्वैकै गोबिंद जेहैं तेऊ झूलै हैं ॥३॥४॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौखानि बानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥
छः जे शास्त्रहैं, चारि जे वेदहैं चौदह जे विद्याहैं, सात जे द्वीप हैं, औ
इक्कीसौ जेहैं सात शून्य सात सुरति सात कलम, यतनेमें परे जे तीनिउ लोककी