कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
चाचर । ( ५०५ )
औ चाचारिमें दुइ पारा होयहैं एकओर स्त्री एकओर पुरुष होइहैं ऐसें सुर
नर मुनि सब एक ओर माया अकेली आप है दृष्टिपरे काहूको नहीं छोड़ैहै ॥ ११ ॥
वैसे स्त्री जे हैं ते आपने घूंघुट में सबको मन समाय लेइहैं सबके काजर
लगाइदेइ हैं अदगकोई नहीं जायहै वैसे माया जो है सोऊ अपनेमें सबको
समाय लियो है सबकें एकदाग लगाइ दियो है अदग कोई नहीं बच्यो ॥ १२ ॥
चाचरि में स्त्रिनके द्वारे इन्द्र कृष्ण सबखड़े रहै हैं लोचन देखिबेको ललचायहैं
ऐसे माया जोहै ताहूके द्वारमें इन्द्रकृष्णजे हैं उपेन्द्र ते खड़ेहैं मायाके देखिबे
को लोचन ललचाय हैं सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि तेई पुरुष उबरे हैं जे मोहमें
नहीं समाने हैं ॥ १३ ॥
इति पहिली चाचर समाप्त ।
अथ दूसरी चाचर ।
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समुझ मन बौराहो ॥ १ ॥
काल बूतको हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रच्यौ जगदीश समुझ मन बौराहो ॥ २ ॥
बिना नेइको देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहागिलकै ईंट समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥
तन धन सो क्या गर्व समुझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समुझ मन बौराहौ ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समुझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊँच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समुझ मन बौराहो ॥ ६ ॥
( ५०६ ) बीजक कबीरदास ।
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग मन बौराहो ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिनी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा मर्म विचारि समझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समझ मन बौराहौ ॥ १० ॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाय ममुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हाने को तीरथघनी मन बौराहो ।
पूजैका बहुदेव समझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिनपानी नर बूड़िया मन बौराहो ।
तुम टेकहु राम जहाज समझ मन बौराहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
तुम छोड़े हरिका सेव समझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समझ मन बौराहो ॥ १ ॥
कालबूतकी हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रचो जगदीश समझ मन बौराहो ॥ २ ॥
साखी प्रकरण: सम्पूर्ण ३५३ साखियों की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या एवं उपसंहार
चाचर । (५०७)
बिना नेइ को देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहगिलकै ईंट समझ मन बौराहो॥ ३ ॥
हे मन करिकै बौरा जीव ! जौनेमें शोक संताप अनेक पावै है तें सब ऐसो
जगतको नेहरा समझिकै जारिदे ॥ १ ॥ औ या जगतकालबूत जो धोखा
ताकी हस्तिनी है अर्थात झूठो है जौनरूपते देखै जगदीश जो साहब ताको
रचो यह चित्रहै सो बिचारिकै छांड़ो । औ या देह कैसीहै जैसे बिना नेइको
देवाला औ धन कैसो है जैसे बिना गिलावाकी ईंट अर्थात् देवालकी नाईं
या तन गिरिही जायगो ईंट की नाईं जैसेईंट खरकिजाइहै तैसेतन खरकिही
जायगो २ । ३ ॥
तन धन सों क्या गर्ब समझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समझ मन बौराहो ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊंच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समझ मन बौराहो॥ ६ ॥
सों ऐसे नाशवान् तनधनको क्या गर्बकरै है भस्म औ कीराकी साजु है ।
सोतें जैसे कामते आंधर ह्वैकै हाथी हथिनी वास्ते बँधिकै अंकुश शीशमें सहै हैं
ऐसे तैं बिषयको बश परिकै नाना प्रकारके दुःखसहै है ऊंचनीच न पहिंचानै
द्वार द्वार बागत फिरै है ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग समझ मन बौराहो ॥ ८ ॥
जैसे मर्कट स्वादके लिये भुजा पसारि चना लेइहै मूठी नहीं छांड़ै है ऐसे तैं
मुक्तिकें लिये नानामतनमें परिकै दृढ़कैलियो है साहब को नहीं जानै है सो तोंको
( ५०८ ) बीजक कबीरदास ।
संसारतें छूटिबेकी संशय आइपरी है यमके घर लाठी खायहै पै मतनहीं छांड़ै
है सो हे बौरा जीव ! मन करिकै समुझुतौ ॥ ७ ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिगी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा भर्म बिचारि समुझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समुझ मन बौराहो ॥ १० ॥
जैसे नलिनीको सुवा भ्रमतै गहै है कोऊ धरै नहीं है ऐसे तुहूं आपने भ्रमतै
बँधो है सो साहबको जानै विचार करै तौ छूटिही जायहै । जो सुवा पढ़े गुने
बहुत भयो तौ का भयो बिलैया तो अंतमें खाय है सो ऐसेंतें बहुत पढ़ि गुनि
नाना मत कीन्हें परन्तु जौने में मीचते बचै सोतौ करबही न कियो॥९।१०॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाइ समुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हानेका तीरथ घना मन बौराहो ।
पूजैको बहु देव समुझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिन पानी नर बूडिया मन बौराहो ।
टेकहु राम जहाज समुझ मन बौरहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
छोड़े हरिको सेव समुझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
सो तैं शून्य धोखा ब्रह्ममें लगिकै सूना घरको पाहुना भयो जैसे आयो
तैसे चल्यो मुक्ति न भई । सो जो मुक्ति न भई तौ का बहुत तीर्थ नहाये
भयो का बहुत देव पूजे भयो तैंतो बिना पानी को जो संसार समुद्र तौनैन में
बूड़िगयो । सो तैं श्रीरामनामरूपी जहाज समुझिकै धरु । श्रीकबीरजी कहै हैं
कि, हे मन करिकै बौराजीव! जगत्में भर्मिया कहे भ्रमत फिरै है हरि जे साह-
बहैं तिनकी सेवाछोड़िकै सो हे मन बौरा अबहूं समुझ ॥११।१२।१३।१४॥
इति चाचरि समाप्त ।
ॐ
अथ बेलि प्रारम्भ ।
हंसा सरवर सरिरहो रमैया राम ।
जगत चोर घर मूसल हो रमैया राम ॥ १ ॥
जो जागल सो भागल हो रमैया राम ।
सोवत गैल बिगोय हो रमैया राम ॥ २ ॥
आज बसेरा नियरे हो रमैया राम ।
कालिह बसेरा दूरि हो रमैया राम ॥ ३ ॥
परेहु बिराने देश हो रमैया राम ।
नैन मरेंगे ढूँढ़ि हो रमैया राम ॥ ४ ॥
त्रास मथन दधि मथन कियो हो रमैया राम ।
भवन मथ्यो भरि पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥
हंसा पाहन भयल हो रमैया राम ।
बेधि न पद निरवान हो रमैया राम ॥ ६ ॥
तुम हंसा मन मानिक हो रमैया राम ।
हटल न मानल मोर हो रमैया राम ॥ ७ ॥
जस रे कियो तस पायो हो रमैया राम ।
हमर दोष जनि देहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥
अगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम ।
सहज कियो बैपार हो रमैया राम ॥ ९ ॥
( ५१० ) बीजक कबीरदास ।
राम नाम धन बनिजहु हो रमैया राम ।
लादेहु वस्तु अमोल हो रमैया राम ॥ १० ॥
नौ बहिया दश गौन हो रमैया राम ।
पांच लदनवा लादे साथ हो रमैया राम ॥ ११ ॥
पांच लदनवा परे हो रमैया राम ।
खाखरि डारिनि खोरि हो रमैया राम ॥ १२ ॥
शिर धुनि हंसा चले हो रमैया राम ।
सरवर मीत जोहार हो रमैया राम ॥ १३ ॥
आगी सरवर लागि हो रमैया राम ।
सरवर भो जरिक्षार हो रमैया राम ॥ १४ ॥
कहै कबीर सुनो सन्तो हो रमैया राम ।
परखिलेहु खर खोट हो रमैया राम ॥ १५ ॥
हंसासरवरसरिरहोरमैयाराम।जागतचोरघरमूसलहोरमैयाराम १
जोजागलसोभागलहोरमैयाराम । सोवतगैलबियोगहोरमैयाराम २
सो हे राम नामकेँ रमनवारे हंसा ! या शरीर रूप सरवरमें तेरो ज्ञान जाग-
तमें चोरमूसि लियो ॥ १ ॥ जो जागतहै मोहनिशाते सो भागै है संसारते सो
हे राममें रमनवारे मोहनिशामें सोवत सब बिगोय गये हैं कहे नानायोनिमें
संसारस्वप्रमें भटकत फिरै हैं ॥ २ ॥
आजबसेरानियरेहो रमैयाराम।कालिहबसेरा दूरि होरमैयाराम३
परेहु बिराने देश हो रमैयाराम।नैन मेरेंगे ढूंढ़िहो रमैयाराम४
सो हे राममें रमनवारे! आजु बसेरा नेरे है कहे मानुष शरीरई में ज्ञान होइ
है सो पायेहै काल्हि कहे जब या शरीर छूटि जायगो तब बसेरा दूरि ह्वैजायगों
बेलि । ( ५११ )
अर्थात् अनेक योनिनमें भटकत फिरौगे तब मेरो ज्ञान होयगों ? तैं जागतै में
लूटिगयो है तैं का जागत रहे है नहीं जागत रहे ॥ ३ ॥ हे राममें रमनवारे !
आपनो देश साकेत ताको छोड़िकै विराने कहैं मनकेदेशमें परचोहै तैसो
अनेक योनिनमें तेरी आंखी आंशू ढारिढारि फूटिजायँगी ॥ ४ ॥
त्रास मथन दधि मथन हो रमैया राम ।
भवन मथ्यो भरि पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥
हंसा पाहन भयल हो रमैयाराम ।
बेधि न पद निर्वाण हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
तुम हंसा मन मानिक हो रमैयाराम ।
हटल न मानेहु मोर हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
त्रास मथन जो है रामनाम तौनै है दधिमथन कहै मथानी तौनेते हे राम-
नामके रमनवारें ! भव समुद्र जो तेरे हृदयमें भरपूरि है ताको काहे नहीं मथ्यो ?
॥ ५ ॥ हेरामनामके रमनवारे ! तैंतो चैतन्य है मँनके साथ तुहूं जड़ह्वैगये है
काहेते कि निर्वाणपदको न बेधि कै तैं जड़ ह्वैगये है जो निर्वाणपद को बेधते
तो मेरे साकेत को जाते ॥ ६ ॥ हे हंसा तुम्हीं मन में मानिकै कहो तो जब
तुम राम नामको जगतमुख अर्थ करन लग्यो है तब मैं हटक्यों है सो तुम
नहीं मान्यो है सो तुमतो रामनाम के रमैयाहो परंतु राम नाम जो मोको वर्ण-
नकरै ताको अर्थ नहीं जान्यो संसारमें परचो है ॥ ७ ॥
जसरे कियो तस पायो हो रमैयाराम ।
हमर दोष जनि देहु हो रमैयाराम ॥ ८ ॥
अगम काटि गम कीन्हों हो रमैयाराम ।
सहज कियो वैपार हो रमैयाराम ॥ ९ ॥
राम नाम धन बनिजहु हो रमैयाराम ।
लादेहु वस्तु अमोल हो रमैयाराम ॥ १० ॥
( ५१२) बीजक कबीरदास ।
हे रामनामके रमनवारे हंसा ! जस कियों तस पायो हमारो दोष
जनि देहु ॥ ८ ॥ अगम जो राम नाम ताको काटि गम कीन्हों अर्थात् साहब
मुख अर्थ छांड़ि जगत् मुख अर्थ कियो फिरि वही रामनाम को ब्रह्ममुख अर्थ-
करि सहज व्यापार कहे सहज समाधि लगावनलगे कि, हमहीं ब्रह्म हैं ॥ ६ ॥
हे रामनाम के रमनवारे ! रामनाम धनको बनिज करिकै रामनाम अमोल बस्तु
लादेहु परंतु अर्थ न जान्यो । जो " बनिजहु लादहु " पाठहोइ तौं
यहअर्थ है अगम जो है रामनाम ताको काटिकै कहे बीजक में बनाइकै तुमकों
गमकै दियो कहे सुगम कैदियो समुझनलगे रामनाम को व्यापार तुम कों
सहज कै दियो अर्थात् रामनाम की सहज समाधि तुमकों कोंउ बतायदियो सों
रामनाम अमोल है ताको बनिज करो औ वही धनकों लादो यह सांच है
और सब झूठहै ॥ १० ॥
पांच लदनवा लादे हो रमैयाराम ।
नौ वहिया दश गोन हो रमैयाराम ॥ ११ ॥
पांच लदनवा आगे हो रमैयाराम ।
खाखरि डारिनि खोरि हो रमैयाराम ॥ १२ ॥
शिर धुनि हंसा उड़ि चले हो रमैयाराम ।
सरवर मीत जोहार हो रमैयाराम ॥ १३ ॥
ताही ते पांच लदनवा लादें अर्थात् पांचभौतिक शरीर धारण कीन्हे ते जौने-
में दशौ गोन दश इंद्रिय हैं तांमें मन बुद्धि चित्त अहंकार पांचौ प्राण ते बहि-
या हैं अर्थात् बहनवारे हैं चलावन वारे हैं ॥ ११ ॥ खाखरि जो शरीर तौन
जब खोरिमें डारेनि अर्थात् नाश भयो तब पांच लदनवा कहे वही पांचभौतिक शरीर
आगे मिलैहै। "पांच लदनवा गिरि परे" पाठ होइ तो यह अर्थ है कि जब इंद्रिय
न रहिगई तब शरीरौ छूटिजाइ है ॥ १२ ॥ सो हंसा जो जीव है सो शिर-
धुनिकै सरवर जो शरीर मीत तौने को जोहारिकै उड़ि चलै है ॥ १३ ॥
आगि लगी सरवरमें हो रमैयाराम ।
सरवर जरिभो क्षार हो रमैयाराम ॥ १४ ॥
कहै कबीर सुनो संत हो रमैयाराम ।
पंरख लेहु खर खोट हो रमैयाराम ॥ १५ ॥
जब हंसा उड़ि चलैहै तब सरवर जो शरीर तामें आगि लगै है सरवर
जरिकै क्षारहै जाइ है सो हे रामनाम के रमनवारे तुम तो संसारमुख अर्थकैकै
संसारमें परचो सो तुम्हारी यहदशा होतभई ॥ १४ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं
कि, हे सन्तो! साहब जो कहै हैं ताको सुनते जाउ । तुमतो रामनाममें रमन-
वारेहो सो रामनामको जगतमुख अर्थ छांडिकै साहब मुख अर्थ करिकै साहब
में लागो साहब की बाणी गहो खरखोट परखिलेहु कौन खराहै कौन खोटाहै
साहबमुख अर्थ खराहै काहेते साहिबै अपने मुख कहै हैं जगतमुख अर्थ खोटाहै
सो खोट छांड़िकै साहबमें लागो ॥ १५ ॥
इति प्रथम बेलि समाप्त ।
अथ द्वितीयबेलि ।
भल सुस्मृति जहडायहु हो रमैयाराम ।
धोखा कियो बिश्वास हो रमैयाराम ॥ १ ॥
सोतो हैं बन सीकसि हो रमैयाराम ।
शिरकै लियो विश्वास हो रमैयाराम ॥ २ ॥
ईतौ हैं बिधि भाग हो रमैयाराम ।
गुरु दीन्हों मोहिं थापि हो रमैयाराम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैयाराम ।
परिहरि जैहो खेत हो रमैयाराम ॥ ४ ॥
३३
( ५१४ ) बीजक कबीरदास ।
बुधि बल तहां न पहुंचै हो रमैयाराम ।
खोज कहांते होय हो रमैयाराम ॥ ५ ॥
सुनि मन धीरज भयल हो रमैयाराम ।
मन वढ़ि रहल लजाय हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
फिरि पाछे जनि हेरहु हो रमैयाराम ।
काल बूत सब आय हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
कह कवीर सुनौ संतो हो रमैयाराम ।
मति ढिगही फैलाव हो रमैयाराम ॥ ८ ॥
भल सुस्मृतिजहडायहु हो रमैयाराम ।
धोखा कियो विश्वास हो रमैयाराम ॥ १ ॥
साहब कहैं हैं हे रामनामके रमनवारे जीव तुम भली तरहते स्मृतिमें जह-
ड़ाय गयो । स्मृतिको तात्पर्यार्थ जो मैं ताको न जान्यो काहेतेकि धोखा
ब्रह्ममें विश्वास कीन्ह्यो ॥ १ ॥
सो तौ है बनसी कसि हो रमैयाराम ।
शिर कै लियो विश्वास हो रमैयाराम ॥ २ ॥
सोतौ है कहे सो धोखाब्रह्म बंशीकी नाईं है जो मछरीबंशीमें लागै है ताको
प्राण छूटिजाइहै, ऐसे तूहूं वामें लगैहै सो तेरो जीवत्व न रहैगो । अर्थात् तेरो
स्वरूप भूलि जाइगो मुरदाकी नाईंटँग्यो रहैगो। तौनेधोखा ब्रह्ममें शिरकै बिश्वास
कै लिये है । अथवा जे गुरुवालोग तोको धोखा ब्रह्ममें बिश्वास कराइ देइहैं
स्मृतिन का अर्थ फेरिकै ते बनके सीगट हैं । उहां हैं वा जो ब्रह्महै सो तैं आहे
यही कहै हैं अथवा हुआहै हुआ है या कहैं हैं कि तैं लगा सो ब्रह्महुआ जैसे
सीगटनकी बाणीमें अर्थ नहींहै ऐसे गुरुवा लोगनकी बाणी में अर्थनहीं है तैं
ब्रह्म कबहूं न होइगो तैं रामनाममें रमनवारो है सो ताहीमें रमै तबहीं
तेरोबनैगो ॥ २ ॥
बेलि । ( ५१५ )
ई तो है विधि भाग हो रमैयाराम ।
गुरु दीन्ह्यो मोहिं थापि हो रमैयाराम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैयाराम ।
परिहरि जैहो खेत हो रमैयाराम ॥ ४ ॥
साहब कहैं हैं कि रामनामके रमनवारे यहस्मृति विधि निषेधका भागकहावै
तौने भागबश मोको गुरुवा लोग बहँकाइ दियो मैं काकरों मेरोदोष कौन
है तौ हमारो महल छोड़ि तहीं गोबरको कोट उठायहुहै जो तैं गुरुवालोगनके
न जाते और उपासना न पूछते तौ वे काहेको बतौते सो मोको परिहरिकै
तैं संसाररूप खेत में जाय है जहां सब उत्पत्तिहोइहै ॥ ३ ॥ ४ ॥
बुधि बल तहां न पहुंचै हो रमैयाराम ।
खोज कहांते होय हो रमैयाराम ॥ ५ ॥
सुनि मन धीरज भयल हो रमैयाराम ।
मन बढ़िरहल लजाय हो रमैयाराम ॥ ६ ॥
सो धोखाब्रह्म में बुद्धि बल नहीं पहुँचे है शून्य है खोज कहां ते होई । जो
कहो कि आपै में तो बुद्धि बल नहीं पहुंचै है तौ जो कोई मेरे रामनाममें रमैहै
मोको जानै है ताकोमहीं बताइ देउँ हौं नयनइन्द्रिय देउँहौं ताहीमें मोहिंदेखै है
॥५॥ गुरुवनकी बाणी सुनिकै जो तेरे मनमें धैर्य भयो कि हम ब्रह्म है जाइँगे
सो हे राम में रमन वारे वा ब्रह्ममें मन बढ़िकै कहे बिचार करत करत लजाय
गयो ब्रह्म न भयो मन अपनी गति जब नहीं देखै है तब सकुचिकै वाही में
रहिजाइहै मनको नाश नहीं होयहै ॥ ६ ॥
फिरि पाछे जनि हेरौ हो रमैयाराम ।
काल बूत सब आय हो रमैयाराम ॥ ७ ॥
कह कबीर सुनौ संतौ हो रमैयाराम ।
मति ढिगही फैलाव हो रमैयाराम ॥ ८ ॥
( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
तुमतों रामनाममें रमनवारे हौ ई तो सब तुमते पाछे हैं तिनकी ओर जनि
हेरौ । माया ब्रह्म कालके पराक्रम आय जो इनके ओर हेरोगे तौ ये कालकें
बूत आय कहै कालके पराक्रमहैं अर्थात् मायै ब्रह्म द्वारा काल नाश सबको कै
देइ है ॥ ७ ॥ सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि हेसंतौ ! साहब कहै हैं सो सुनते जाउ
तुम तो राम नाम में रमन वारेहौ दूरिदूरि कहां खोजौहौ, मतिको ढिगहीमें
फैलाव अर्थात् अपने स्वरूपको विचारु कि मैं कौन को हौं तौ या जानि लेइ
तैं कि मैं राममें रमनवारो हौं रामनाम स्मरण करौगे तबहीं मुक्ति होयगी
तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“असचिरित देखि मन भ्रमै मोर । ताते निशि दिन गुण रमा तोर ॥
यक पढ़हिं पाठ यक भ्रम उदास । यक नगन निरंतर रह निवास ॥
यक योग युक्ति तिन होहिं खीन । यक राम नाम सँग रहल लीन ॥
यक होहिं दीन यक देहिं दान । यक कलपि कलपि कै होयँ हरान ॥
यक तन्त्र मंत्र औषधीवान । यक सकल सिद्धि राखैं अपान ॥
यक तीरथ व्रत करि काय जीति । यक राम नामसों करत प्रीति ॥
यक धूम घोटि तन होहिं श्याम । तेरी मुक्ति नहीं बिन राम नाम ॥
सतगुरु शब्द तोहि कह पुकार । अब मूल गहो अनुभव बिचार ॥
मैं जरा मरणते भयउँ थीर । मैं राम कृपा यह कह कबीर ॥ ८ ॥
इति बेलि समाप्त ।
ॐ
अथ बिरहुली ।
आदि अंत नहिं होत बिरहुली ।
नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली ॥ १ ॥
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली । कथि गये योग अपार बिरहुली ३
मास असाढ़हि शीत बिरहुली । बोइन सातौ बीज बिरहुली ४
नित गोड़ै नित सिंचै बिरहुली । नित नव पल्लव पेड़ बिरहुली ५
छिछिल बिरहुली छिछिल बिरहुली। छिछिल रही तिहुँलोक बिरहुली
फूल एक भल फुलल बिरहुली । फूलि रहल संसार बिरहुली ७
ते फुल बंदै भक्त बिरहुली । वांधि कै राउर जाहि बिरहुली ॥ ८ ॥
ते फुल लेहीं संत बिरहुली । डसिगो वेतल सांप बिरहुली ॥ ९ ॥
विषहर मंत्र न मान बिरहुली । गाडुरि बोले आर बिरहुली १०
विष की क्यारी बोयो बिरहुली। लोरत का पछिताय बिरहुली ११
जन्म जन्म अवतरे बिरहुली। फल यक कनयल डार बिरहुली १२
कह कबीर सचु पाय बिरहुली। जो फल चाखहु मोर बिरहुली १३
आदि अंत नहिं होत बिरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ बिरहुली १
निशिवासर नहिं होत बिरहुली । पानी पवन न होत बिरहुली २
ब्रह्म आदि सनकादि बिरहुली। कथि गये योग अपार बिरहुली ३
( ५१८ ) बीजक कबीरदास ।
बी कहैं दुइ विद्या अविद्या रूपको, रहुली कहै रहनवाली जो माया ताको ।
सो कबीरजी कहै हैं कि, विद्या अविद्या दुहुनको न आदि है न अंत है अर्थात्
विचार कीन्हे भ्रममात्रै है जीव छूटि मात्र जाइ है । सो बिरहुली जो माया
ताके न जड़ है न पेड़ है न पल्लव है अर्थात् विचार कीन्हे मिथ्या है ॥ १ ॥
जब निशिवासर नहीं होत है तबहूं बिरहुली माया रही है जब पानी पवन
नहीं रह्यो तबहूं बिरहुली माया रही है औ ब्रह्मा सनकादिककी आदि बिरहुली
है औ जोन योग अपार कथि गये हैं सोऊ बिरहुली है ॥ २ ॥ ३ ॥
मासअसाढ़हिशीतविरहुली।बोइनसातौबीजविर हुली ॥४॥
नितगोड़ैनितसिंचैविरहुली।नितनवपल्लवपेड़बिरहुली॥५॥
जब प्रथम उत्पत्ति भई है सोई आषाढमास है काहेते चौमास को आदि
आषाढ है । तैसे युगनको आदि सतयुग है सो कैसा है शीतकहे शुद्ध सतोगुण
है तौनेमें जीव को जो सातौ सुरति तेई हैं बीज तेके बोवत भये ते सब बिरहुलिन
आइ सो मंगलमें लिखि आये हैं कि ॥ “ सात सुरति सब मूल हैं । मलयडु
इनहीं माँह ” ॥ सो जीव नितगोड़ै है गुरुवनते वोई कर्म्म पूछै है खोदि
खोदि नित सींचै है कहे वोई कर्म्म करै है जाते बिरहुली कहे माया बढ़तै
जाइ है ॥४॥ ५ ॥
छिछिलबिरहुलीछिछिलबिरहुली।छिछिलरहलतिहुँलोकबिरहुली ६
फूलएकभलफूललविरहुली।फूलिरहलसंसारविरहुली॥७॥
कहूं विद्यारूपते छिछिली है बिरहुली माया; कहूं अविद्या रूपते छिछिली
है बिरहुली माया । यही रीतिते तीनों लोकमें बिरहुली छिछिलरही है । सो
यही माया बिरहुली में कहूं कर्म्मत्यागरूप एक फूल धोखा ब्रह्म फूलि रह्यो है
ताही में सब संसार लगिकै फूलि रहे कहे आनन्द मानि लिये हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥
तेफुलबन्दैभक्तिबिरहुली । वांधिकैराउरजायविरहुली ॥८॥
तेफुललेहींसंतविरहुली । डसिगोबेतलसांपबिरहुली ॥९॥
बिरहुली । ( ५१९ )
ते फूल कहे तौन जो धोखा ब्रह्म सो भक्तनको बन्दै है अर्थात् खुलो नहीं
है वै धोखा में नहीं परै है काहेते वाको बांधिकै कहे खण्डन करिकै राउर जो
साहबको महल है तहांको जाहि हैं औ जे सन्त धोखा ब्रह्म रूप फूल लेहि हैं
अर्थात् ब्रह्म विचारमें जे शांत भे साहबको भूलिगे ते बेतल कहे बेताल भुतहा
सांप ऐसो जो धोखा ब्रह्म तौनेते डसिगे । धुनि या है जाको सांप डसै है ताको
स्वरूप भूलि जाइ है सांपै बोलै है ऐसे जे धोखा ब्रह्मवारे हैं तिनहूं आप-
नोस्वरूप भूलिगये कहै हैं हमहीं ब्रह्म हैं ॥ ८ । ९ ॥
बिषहरमंत्रनमानबिरहुली।गाडुरिबोलैआरबिरहुली॥१०॥
विषकीक्यारीबोयोबिरहुली।अवलोरतपछितायबिरहुली॥११
जाको ब्रह्मरूप सर्प डस्यो सो ब्रह्मरूप सर्पको विषहरनवारो जो रामनाम
ताको नहीं मानै है । गाडुरि जे हैं ते आर बोलै हैं झारै हैं । इहां सतगुरु जेहैं तें
रामनाम उपदेश करै हैं परंतु नहीं मानै हैं सो बिषयकी कियारी जो या संसार
तामें आत्मज्ञानरूप बीज बोयो सो वा बिरहुली कहे मायैआय सो अवलोरत कहे
काटतमें का पछिताय है । अबका विषम छांड़ै है ! नहीं छांड़ै है । कहूं ब्रह्मानं-
दकी कहूं विषयानन्दकी चाह । विद्यामें ब्रह्मानन्दकी चाह अविद्यामें विषयानन्दकी
चाह तोको नहीं छांडै है ॥ १० ॥ ११ ॥
जन्मजन्मअवतरेउबिरहुली।फलयक्कनयलडारबिरहुली १२
कहकबीरसचुपायबिरहुली।जोफलचाखहुमोरबिरहुली १३
सो हे जीव बिरहुली जो माया ताहीमें तुम जन्मजन्म अवतरचो । जौनै
बिरहुलीको फल धोखाब्रह्म । औ वह कर्मफल कैसो है कि, कनयल कैसो फल
है अर्थात् निरसहै रस नहीं है औबिषधरहै सो कौनीतरहते सचुपावोगे । सो
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, तब सचुको पावै जब फल मोर चाखै कहे जौने राम-
नाममें मैं जप्यो हौं ताही फलको चाखै तो सुचित्तई पावै या कनयल का फल
न चाखै ॥ १२ ॥ १३ ॥
इति बिरहुली समाप्त ।
अथ हिंडोला ।
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खंभ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गह्यो दूनौ पानि ॥२॥
झूले सो गण गंधर्व मुनि नर झूले सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झुलत व्यास फणिन्द्र ॥३॥
झूलत विरंचिं महेश मुनि हो झुलत सूरज इन्दु ।
औ आप निरगुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविन्दु ॥ ४ ॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौ खानि वानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥५॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं ।
कालहु अकालहु प्रलय नहिं तहँ संत विरले जाहिं ६॥
खण्डहु ब्रह्मण्डहु खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यह साधु संग विचारि देखौ जीउ निसतरि जाहिं॥७॥
तहँके बिछुरि बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अब साधु संगति शोचि देखौ बहुरि उलटि समाय८॥
हिंडोला । ( ५२१ )
तेहि झूलेबेकी भय नहिं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन९॥
भर्म हिंडोलना झूलै सब जग आय ॥
जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ मेरु माया नाय ।
तहँ कर्म पटुली बैठिकै को को न झूलै आय ॥ १ ॥
यह लोभ मरुवा विषय भ्रमरा काम कीला ठानि ।
दोउ शुभौ अशुभ बनाय डांडी गहे दूनौ पानि ॥ २ ॥
परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के बिनाजाने भरमको हिंडोला सब संसार
झूलैहै कैसोहै हिंडोला; जहां पाप पुण्य रूप दोऊ खंभहैं, माया जोहै सो मेरु-
कहै गोलाहै, जौनेमें कर्मरूपी पटुली है, ताहीमें बैठिकै को नहीं झूल्यो अर्थात्
सब झूल्यो है ॥ १॥ लोभ जो है सोई मरुवा लगो है, विषय जो है सोई भ्रमरा
है, काम जो है सोई कीला है, औ शुभ औ अशुभ जे उपासनाहैं तेई डांडी हैं
ताको पाणिते गहिकै सब झूलैहैं ? को को झूलै हैं ताका आगे कहै हैं ॥ २ ॥
झूलै सो गण गन्धर्व मुनि नर झूलै सुर गण इन्द्र ।
झूलत सु नारद शारदा हो झूलत ब्यास फणिन्द्र ॥ ३ ॥
झूलत विरंचि महेश मुनि हो झूलत सूरज इंदु ।
औ आपु निर्गुण सगुण ह्वैकै झूलिया गोविंदु ॥ ४ ॥
गन्धर्व मुनि नर सुरगण इंद्र नारद शारदा व्यास फणीन्द्र जे हैं शेष महेश
जेहैं विरञ्चि सूर्य्य चंद्रमा ये सब झूलैहैं और कहां तक कहैं सगुण निर्गुण
रूपते अर्थात् चित्तअचित् के अंतर्यामी ह्वैकै गोबिंद जेहैं तेऊ झूलै हैं ॥३॥४॥
छ चारि चौदह सात यकइस तीन लोक बनाय ।
चौखानि बानी खोजि देखौ थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥
छः जे शास्त्रहैं, चारि जे वेदहैं चौदह जे विद्याहैं, सात जे द्वीप हैं, औ
इक्कीसौ जेहैं सात शून्य सात सुरति सात कलम, यतनेमें परे जे तीनिउ लोककी
रचना भई सों इनमें चारिउ खानिके परे जे जीव तिनकी हम चारिउ बानीतें
वेदशास्त्रादिकनते बिचारि खोजि देख्यो कोई थिर नहीं रहे हैं सबै झूलैहैं ।
सो तैं यहां को नहीं है तैं तो बाहर को है जहां यहां की साजु उहां एकौ
नहीं है ॥ ५ ॥
शशि सूर निशि दिन संधि औ तहँ तत्त्व पांचों नाहिं।
कालौ अकालो प्रलयनाहिं तहँ सन्तबिरले जाहिं ॥६॥
खण्डौ ब्रह्माण्डौ खोजि षट दरशन ये छूटे नाहिं ।
यहसाधुसंग बिचारि देखौ जीव निस्तारि जाहिं ॥७॥
न उहां सूर्य है, न चन्द्र है, न दिनहै, न राति है, न संध्याहै न पांचौ
तत्वहैं, न कालहै, न अकालहै, न उहां प्रलयहै, ऐसी जगहमें कोई विरले संत
जाइहैं ॥ ६ ॥ पुनि कैसो है जाको खण्ड जो शरीर ब्रह्माण्ड जो जगत् तामें
वाको छहउ दर्शन वारे खोजि खोजिहारे परन्तु पाये नहीं न संसारते छूटे ।
सो ऐसे लोकको साधुजे हैं तिनको सङ्गरिकै विचारिकै देखै जाते जीव यहीं
संसारते निस्तारि जाइ ॥ ७ ॥
तहँ कोबिछुर बहु कल्प बीते परे भूमि भुलाय ।
अवसाधु संगति शोचिदेखौ बहुरि उलटि समाय॥८॥
तेहि झूलवे की भय नहीं जो संत होहिं सुजान ।
कह कबीर सत सुकृत मिलै तौ फिरि न झूलै आन॥६॥
सो ऐसे लोकते बिछुरे तोको केतन्यों कल्प व्यतीत भये तैं संसारमें भुला
यकै परे आय सो तैं अब साधु सङ्गतिकरि बिचारि कै रामनामको जानै जाते
बहुरिकै तहँ समाय अर्थात् जहांतें आये है तहँ जाय । या संसार हिंडोला छांडु
जो कोई साहबके जाननवारे सुजान साधुहैं तिनको या हिंडोलामें झूलबे की
भयनहीं है। तिनसों श्री कबीरजी कहै हैं कि, जो याको सतसुकृतराम नाम मिलै
तो फिर आनि बार न झूलै। रामनाम को जपिबो जो है सोई सत्य सुकृतहै वही
बाङ् मनो गोचरातीत जे श्रीरामचन्द्र हैं । तिनके और जे सुकृतहैं ते क्षयमा-
नहीं औ रामनाम पास पहुँचावे है जहांतें नहीं लौटे है तामें प्रमाण ॥ "सप्तको-
हिंडोला । ( ५२३ )
टिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः ॥ एक एव परो मंत्रो रामइत्यक्षरद्वयम्” ॥
इतिसारस्वततंत्रे ॥ दूसराप्रमाण ॥ “इममेवपरंमन्त्रं ब्रह्मरुद्रादिदेवताः॥ऋषयश्च
महात्मानो मुक्ता जप्त्वाभवाम्बुधेः” ॥ इति पुलहसंहितास्मृतिः ॥ ८ ॥ ९ ॥
इति प्रथम हिंडोला समाप्त ।
अथ दूसरा हिंडोला ।
बहुविधिके चित्र बनाइकै हरि रच्यो क्रीडा रास ।
ज्यहि नाहिं इच्छा झूलबे अस बुद्धि केहिके पास॥१॥
झूलत झूलत बहु कल्प बीते मन न छोड़ै आस ।
यह रच्यो रहस हिंडोलना निशि चारि युगचौमास॥२॥
कवहूंक ऊँच नीचे कवहूं स्वर्ग भूलौं जाय ।
अति भ्रमत भ्रर्माहिं हिंडोलना सो नेकु नहिं ठहराय॥३॥
डरपत रहौ यहि झूलिवेको राख यादवराय ।
कह कबीर सुनु गोपाल विनती शरण हौं तुवपाय ॥४॥
बहुतबिधि चित्र बनाइकै या जगत् हरि जे हैं गोलोकबासी कृष्णचन्द्र
आपनी क्रीडा बनाइ राख्यो है अर्थात् अन्तर्यामी रूपते आपही बिहार करें हैं ।
सो या जगतरूप हिंडोला में झूलिबेकी बुद्धि केहिके नहीं आई अर्थात् सबैकै है
न झूलिबेकी बुद्धि कोई विरले सन्तन के है । सो ऐसो हिंडौलाना चारि युग
जे हैं चौमास तामें रच्यो है जीवनके झूलत झूलत कोटिन कल्प व्यतीत भये
तऊ झूलिबेकी आशा मन नहीं छोड़ै है । हिंडोलाके चढ़ैया कहूं नीचे आवै है
कहूं ऊंचे जायहैं ऐसे अति भ्रमत जो जगत रूप हिंडोला तामें परे जे जीव त
कहूं नरकको जायँ हैं, कहुं स्वर्गको जाय है । सो हे जीवौ! या जगतरूप हिंडोला
झूलिबेको डरत रहो राख यादवराय या कहौ कि हे यादवराय कृष्णचंद्र हमको
बचायो। सो हे कायाके वीरौ जीवौ ! यह कहौ कि,हे गोपाल ! गो जे हैं इन्द्रिय
तिनके रक्षा करनवारे हमारी बिनती सुनो हम तुम्हार चरण शरण हैं ॥ —४॥
( ५२४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तीसराहिंडोला ॥ ३ ॥
जहँ लोभ मोहके खम्भ दोऊ मनँ रच्योहौ हिंडोर ।
तहँ झूलहिं जीव जहान जहँ लगि कतहूँ नहिं थिति ठोर ॥ १॥
चतुरा झूलैं चतुराइया औ झूलैं राजा सेव ।
अरु चन्द्र सूरज दोऊ झूलहिं नाहिं पायो भेव ॥ २ ॥
चौरासि लक्षहु जीव झूलैं धरहिं रविसुत धाय ।
कोटिन कलप युग बीतिया मानै न अजहूं हाय ॥ ३ ॥
धरणी आकाशहु दोऊ झूलैं झुलैं पवनहुँ नीर ।
धरि देह हरि आपहू झूलहिं लखहिं हंस कबीर ॥ ४ ॥
जौन जगतमें लोभ मोहके खम्भ बनाइकै मनको रच्यो जो हिंडोल ताहीमें
सब जहानके जीव झूलै हैं थिर नहीं कौनौ ठौर में रहैं हैं । चतुर चतुराईते झूलै
हैं,राजा झूलै हैं, सेवक झूलै हैं, चंद्र, सूर्य तेऊ झूलै हैं । हिंडोलाको भेद नहीं
पावैंहैं । चौरासी लक्ष योनिके जीव झूलैहैं तिनको सबको रवि सुत जे यमराज ते
धरैं हैं । सो कोटिन कल्प बीतिगये जीवनको झूलत परन्तु अजहूं नहीं मानै है
औ धरणी आकाश पवन पानी ये सब वही हिंडोलामें झूलै हैं औ देहधरिकै कहे
अवतारलैकै जौनी रीति सब झूलै हैं तौनी रीति हरि आपहू झूलै हैं । जीवनकों
यह दिखाइबे को कि, जैसे तुमहूं झूलौहौ तैसे हमहूं झूलै हैं सो देहधरेको फल
यह है इन को हेतु कोई जानि नहीं सकै है कि, जीवनपर दयाकरिकै उद्धार
करिबे को हेतु दिखावै हैं कि, देहको फल यह संसारई है ताते देहको अभिमान
छोड़ि हमारे अवतारके नाम लीलादिकनमें लागि, मनको त्याग करिकै चारों
शरीरनको त्याग करिदेउ । जब तुम अपने स्वरूप में स्थित रहौगे तब हंस
स्वरूप दै आपने धामको लै आवौंगो । यह बात कोई नहीं लखै है कहे जानै
है । जे हंसस्वरूप पाये कायाके बीर जीवहैं तेई जानै हैं याते साहबकी दया-
लुता व्यंजितभई ॥ १-४ ॥
इति तीसरा हिंडोला ।
हिंडोला समाप्त ।