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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 766 में से

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पृष्ठ 560

( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
तुमतों रामनाममें रमनवारे हौ ई तो सब तुमते पाछे हैं तिनकी ओर जनि
हेरौ । माया ब्रह्म कालके पराक्रम आय जो इनके ओर हेरोगे तौ ये कालकें
बूत आय कहै कालके पराक्रमहैं अर्थात् मायै ब्रह्म द्वारा काल नाश सबको कै
देइ है ॥ ७ ॥ सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि हेसंतौ ! साहब कहै हैं सो सुनते जाउ
तुम तो राम नाम में रमन वारेहौ दूरिदूरि कहां खोजौहौ, मतिको ढिगहीमें
फैलाव अर्थात् अपने स्वरूपको विचारु कि मैं कौन को हौं तौ या जानि लेइ
तैं कि मैं राममें रमनवारो हौं रामनाम स्मरण करौगे तबहीं मुक्ति होयगी
तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“असचिरित देखि मन भ्रमै मोर । ताते निशि दिन गुण रमा तोर ॥
यक पढ़हिं पाठ यक भ्रम उदास । यक नगन निरंतर रह निवास ॥
यक योग युक्ति तिन होहिं खीन । यक राम नाम सँग रहल लीन ॥
यक होहिं दीन यक देहिं दान । यक कलपि कलपि कै होयँ हरान ॥
यक तन्त्र मंत्र औषधीवान । यक सकल सिद्धि राखैं अपान ॥
यक तीरथ व्रत करि काय जीति । यक राम नामसों करत प्रीति ॥
यक धूम घोटि तन होहिं श्याम । तेरी मुक्ति नहीं बिन राम नाम ॥
सतगुरु शब्द तोहि कह पुकार । अब मूल गहो अनुभव बिचार ॥
मैं जरा मरणते भयउँ थीर । मैं राम कृपा यह कह कबीर ॥ ८ ॥
इति बेलि समाप्त ।

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