कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१२) बीजक कबीरदास ।
हे रामनामके रमनवारे हंसा ! जस कियों तस पायो हमारो दोष
जनि देहु ॥ ८ ॥ अगम जो राम नाम ताको काटि गम कीन्हों अर्थात् साहब
मुख अर्थ छांड़ि जगत् मुख अर्थ कियो फिरि वही रामनाम को ब्रह्ममुख अर्थ-
करि सहज व्यापार कहे सहज समाधि लगावनलगे कि, हमहीं ब्रह्म हैं ॥ ६ ॥
हे रामनाम के रमनवारे ! रामनाम धनको बनिज करिकै रामनाम अमोल बस्तु
लादेहु परंतु अर्थ न जान्यो । जो " बनिजहु लादहु " पाठहोइ तौं
यहअर्थ है अगम जो है रामनाम ताको काटिकै कहे बीजक में बनाइकै तुमकों
गमकै दियो कहे सुगम कैदियो समुझनलगे रामनाम को व्यापार तुम कों
सहज कै दियो अर्थात् रामनाम की सहज समाधि तुमकों कोंउ बतायदियो सों
रामनाम अमोल है ताको बनिज करो औ वही धनकों लादो यह सांच है
और सब झूठहै ॥ १० ॥
पांच लदनवा लादे हो रमैयाराम ।
नौ वहिया दश गोन हो रमैयाराम ॥ ११ ॥
पांच लदनवा आगे हो रमैयाराम ।
खाखरि डारिनि खोरि हो रमैयाराम ॥ १२ ॥
शिर धुनि हंसा उड़ि चले हो रमैयाराम ।
सरवर मीत जोहार हो रमैयाराम ॥ १३ ॥
ताही ते पांच लदनवा लादें अर्थात् पांचभौतिक शरीर धारण कीन्हे ते जौने-
में दशौ गोन दश इंद्रिय हैं तांमें मन बुद्धि चित्त अहंकार पांचौ प्राण ते बहि-
या हैं अर्थात् बहनवारे हैं चलावन वारे हैं ॥ ११ ॥ खाखरि जो शरीर तौन
जब खोरिमें डारेनि अर्थात् नाश भयो तब पांच लदनवा कहे वही पांचभौतिक शरीर
आगे मिलैहै। "पांच लदनवा गिरि परे" पाठ होइ तो यह अर्थ है कि जब इंद्रिय
न रहिगई तब शरीरौ छूटिजाइ है ॥ १२ ॥ सो हंसा जो जीव है सो शिर-
धुनिकै सरवर जो शरीर मीत तौने को जोहारिकै उड़ि चलै है ॥ १३ ॥