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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 551

चाचर । (५०७)
बिना नेइ को देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहगिलकै ईंट समझ मन बौराहो॥ ३ ॥
हे मन करिकै बौरा जीव ! जौनेमें शोक संताप अनेक पावै है तें सब ऐसो
जगतको नेहरा समझिकै जारिदे ॥ १ ॥ औ या जगतकालबूत जो धोखा
ताकी हस्तिनी है अर्थात झूठो है जौनरूपते देखै जगदीश जो साहब ताको
रचो यह चित्रहै सो बिचारिकै छांड़ो । औ या देह कैसीहै जैसे बिना नेइको
देवाला औ धन कैसो है जैसे बिना गिलावाकी ईंट अर्थात् देवालकी नाईं
या तन गिरिही जायगो ईंट की नाईं जैसेईंट खरकिजाइहै तैसेतन खरकिही
जायगो २ । ३ ॥
तन धन सों क्या गर्ब समझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समझ मन बौराहो ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊंच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समझ मन बौराहो॥ ६ ॥
सों ऐसे नाशवान् तनधनको क्या गर्बकरै है भस्म औ कीराकी साजु है ।
सोतें जैसे कामते आंधर ह्वैकै हाथी हथिनी वास्ते बँधिकै अंकुश शीशमें सहै हैं
ऐसे तैं बिषयको बश परिकै नाना प्रकारके दुःखसहै है ऊंचनीच न पहिंचानै
द्वार द्वार बागत फिरै है ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग समझ मन बौराहो ॥ ८ ॥
जैसे मर्कट स्वादके लिये भुजा पसारि चना लेइहै मूठी नहीं छांड़ै है ऐसे तैं
मुक्तिकें लिये नानामतनमें परिकै दृढ़कैलियो है साहब को नहीं जानै है सो तोंको