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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 549

चाचर । ( ५०५ )
औ चाचारिमें दुइ पारा होयहैं एकओर स्त्री एकओर पुरुष होइहैं ऐसें सुर
नर मुनि सब एक ओर माया अकेली आप है दृष्टिपरे काहूको नहीं छोड़ैहै ॥ ११ ॥
वैसे स्त्री जे हैं ते आपने घूंघुट में सबको मन समाय लेइहैं सबके काजर
लगाइदेइ हैं अदगकोई नहीं जायहै वैसे माया जो है सोऊ अपनेमें सबको
समाय लियो है सबकें एकदाग लगाइ दियो है अदग कोई नहीं बच्यो ॥ १२ ॥
चाचरि में स्त्रिनके द्वारे इन्द्र कृष्ण सबखड़े रहै हैं लोचन देखिबेको ललचायहैं
ऐसे माया जोहै ताहूके द्वारमें इन्द्रकृष्णजे हैं उपेन्द्र ते खड़ेहैं मायाके देखिबे
को लोचन ललचाय हैं सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि तेई पुरुष उबरे हैं जे मोहमें
नहीं समाने हैं ॥ १३ ॥
इति पहिली चाचर समाप्त ।
अथ दूसरी चाचर ।
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समुझ मन बौराहो ॥ १ ॥
काल बूतको हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रच्यौ जगदीश समुझ मन बौराहो ॥ २ ॥
बिना नेइको देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहागिलकै ईंट समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥
तन धन सो क्या गर्व समुझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समुझ मन बौराहौ ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समुझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊँच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समुझ मन बौराहो ॥ ६ ॥