कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०८ ) बीजक कबीरदास ।
संसारतें छूटिबेकी संशय आइपरी है यमके घर लाठी खायहै पै मतनहीं छांड़ै
है सो हे बौरा जीव ! मन करिकै समुझुतौ ॥ ७ ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिगी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा भर्म बिचारि समुझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समुझ मन बौराहो ॥ १० ॥
जैसे नलिनीको सुवा भ्रमतै गहै है कोऊ धरै नहीं है ऐसे तुहूं आपने भ्रमतै
बँधो है सो साहबको जानै विचार करै तौ छूटिही जायहै । जो सुवा पढ़े गुने
बहुत भयो तौ का भयो बिलैया तो अंतमें खाय है सो ऐसेंतें बहुत पढ़ि गुनि
नाना मत कीन्हें परन्तु जौने में मीचते बचै सोतौ करबही न कियो॥९।१०॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाइ समुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हानेका तीरथ घना मन बौराहो ।
पूजैको बहु देव समुझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिन पानी नर बूडिया मन बौराहो ।
टेकहु राम जहाज समुझ मन बौरहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
छोड़े हरिको सेव समुझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
सो तैं शून्य धोखा ब्रह्ममें लगिकै सूना घरको पाहुना भयो जैसे आयो
तैसे चल्यो मुक्ति न भई । सो जो मुक्ति न भई तौ का बहुत तीर्थ नहाये
भयो का बहुत देव पूजे भयो तैंतो बिना पानी को जो संसार समुद्र तौनैन में
बूड़िगयो । सो तैं श्रीरामनामरूपी जहाज समुझिकै धरु । श्रीकबीरजी कहै हैं
कि, हे मन करिकै बौराजीव! जगत्में भर्मिया कहे भ्रमत फिरै है हरि जे साह-
बहैं तिनकी सेवाछोड़िकै सो हे मन बौरा अबहूं समुझ ॥११।१२।१३।१४॥
इति चाचरि समाप्त ।