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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ४६६ ) बीजक कबीरदास ।
औ ठांवहिं ठांव बझाऊ कहे मोहरूप शिकारी सो नाना बिषय की कथा
औ नाना भूत यक्षादिक सेवनते सिद्धिकी प्राप्त तिनकी कथा औ नाना ता
मसमत तिनकी कथा सो शब्दरूप बागुरि ठामहि ठांव लगाय राख्यो है
तामें श्रवणरूप कहार अरुझिकै डोला डारि देइहें फिरि संसार मग कैसो
है ज्यों ज्यों संसार पथमें चलियतहै त्यों त्यों दूरि रामपुर परतो जायहै
भैया रामपुरकी गैल नहीं है और राहहै फिरि कैसो ह यामें वास नहीं
है अर्थात् कल नहीं रहै है कर्म करतई जाइहै शांत हैकै कोई नहीं टिक्यो ॥
“मारग अगम संग नहिं संबल नाम ग्रामकर भूलारे । तुलसिदास भव त्रास हरहु
अब होहु राम अनुकूलारे ॥” सो या प्रकार यह मार्ग है संसार सोई पृथ्वी है
तामें विषयके हेतु नाना यतन करिबो अरु राजस तामस शास्त्रमार्ग तदनुसार
कर्म करिबो सोई चलिबो है ताको गोसांईजी कहै हैं किं अगमहै कहे चलिबे
मुआफ़िक नहीं है औ नाम मार्गमें संतनको संगहै ते रामपुरको बिघ्न नाशिकै
पहुंचाइ देइहैं यहां कैसो है संगनहिं संबल कहे सम्यक् है बल जेहिके ऐसे
संत सङ्गमें नहीं है अथवा नानामार्ग में तो सात्विक श्रद्धा कलेवा मिलै है या
मार्गमें श्रद्धारूप कलेवा नहीं मिलैहै सो गोसांईजी अपनी रामायण में लिख्यो
है जे श्रद्धा संबल रहित इत्यादिक औ जा गाउंको तुमको जानोहै ताको नामही
भूलि गयो है भुला जो कह्यो सो गर्भमें सुधि होइ है फिरि भूलि जायहै याते
भूला कह्यो है अथवा जीव नाम ग्राम कर भूलाहै नाना देवतन को नाम लेइहै
औ तिनहीं के धाम जाइबेकी इच्छा करै है सो तेरो ते नामनते भव बन्धना छूटै
है न ते धामनमें गये तेरो जनन मरण त्रास छूटैगो सो अब गोसांईजी कहैंहैं कि
हे भैया ! अब अपने अपने जीवन पै दाया करि संसारकी त्रास हरो अब काहेते
कह्यो कि अनेक जन्म भटकि के अनेक शरीर पाइकै मनुष्यको शरीर पायो है
सो अबहूं नाम मार्ग चलौ याते अब कह्यो है औ होहु राम अनुकुला जो कह्यो
सो उपक्रममें नाम मार्ग बतायो ताको चलिकै उपसंहार में होहु राम अनुकूला
कह्यो सो एक उपलक्षण है छः प्रकारकी शरणागती को सूचन कियो है उपक्रम
में नाम मार्ग बतायो उपसंहारमें शरणागती बतायी सोई श्री गोसांई जी कहैहैं

कहरा । ( ४६७ )
कि हे भैया ! रघुनाथजी को नाम जपौ औ शरण जाउ याहीमें उबरहै औरमें
नहीं है षट् बिधि शरणागत को लक्षण ॥ “ अनुकूलस्य सङ्कल्पः प्रतिकूलस्य
वर्जनम् ॥ रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्ववरणं तथा ॥ आत्मनिक्षेपकार्पण्यं
षड्विधा शरणागतिः ” ॥ ४ ॥
इति पांचवां कहरा समाप्त ।
अथ छठवां कहरा ॥ ६ ॥
राम नाम बिनु राम नाम बिनु मिथ्या जन्म गँवाईहो॥१॥
सेमर सेइ सुवा जो जहड़े ऊनपरे पछिताई हो ।
जैसे मदिप गांठि अर्थै दै घरहुकी अकिल गँवाई हो ॥२॥
स्वादे उदर भरत धौं कैसे ओसे प्यास न जाई हो ।
द्रव्यक हीन कौन पुरुषारथ मनहीं माहँ तवाईहो ॥ ३ ॥
गांठी रतन मर्म नहिं जानेहु पारख लीन्ही छोरी हो ।
कह कबीर यह अवसर बीते रतनन मिलै बहोरी हो ॥४॥
राम नाम बिनु राम नाम बिनु मिथ्या जन्म गँवाई हो ॥१॥
उपासक जे हैं ते पंचांगोपासना करिकै औ कापालिकादिक मतवारे देवत-
नके उपासना करिके नास्तिक मरबई मोक्ष मानिकै व्याकरणी शब्द ज्ञान
करिकै ज्योतिषी कालज्ञान करिकै सांख्यवाले प्रकृतिपुरुषज्ञान करिकै पूर्व
मीमांसावारे कर्मही करिकै नैयायिक दुःखध्वंसही करिकै औ कणाद वाले नौगु-
णध्वंसही करिकै औ शंकरवेदांतवाले ब्रह्मज्ञानही करिकै इत्यादिक मुक्त होब
मानै हैं परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र तिनहीं बिना औ तिनके रामनाम बिना मिथ्य
जन्म गँवाइ दियो ॥ १ ॥
सेमर सेइ सुवा जो जहड़े ऊनपरे पछिताई हो ।
जैसे मदिप गांठि अर्थैदै घरहुकी अकिल गँवाई हो ॥ २ ॥

( ४६८ ) बीजक कबीरदास ।
जैसे सेमरके फलको सुवासेयों चोंच चलायो जब वामें धुवानिकस्यो तब
भोजनते ऊन कहे खाली परचो भोजन न पायो तब पछितायकै कहे जहड़ि कै
भोजन दहकायकै चल्यो । ऐसे जीव नाना मतन में परिकै मुक्ति चाह्यो जब मुक्ति
न पायो तब मुक्ति दहकाइकै संसारमें परचो औ जैसे मदिप कहे मतवार गांठी
को द्रव्य दैकै मद पियो घरौकी अकिल गँवायदियो तैसे गुरुवा लोगनको गांठी
की द्रव्य दैकै मन्त्र लैकै और और मतनमें लगिगये घरोंकी अकिल गँवाइ
दियो कहे साहबको सदा को दास है जीव सो आपने स्वरूपको भूलि गयो ॥२॥
स्वादे उदर भरत धौं कैसे ओसै प्यास न जाईहो ।
द्रव्यक हीन कौन पुरषारथ मनहीं माहँ तवाईहो ॥ ३ ॥
जौने मतमें स्वादपायो सो तौनेही मतमें लग्यो सो ओसते कहूं पियास बुझाईहै
ओसपरो सो ओसको जलको स्वाद मुखमें आयो सो कहा स्वादते पेट भरे है नहीं
भरै है तैसे जीव नाना मतमें लग्यो नाना साधन करन लग्यो औ वे देवतन-
के लोक न गयो अथवा ब्रह्मज्ञान सिद्ध भयो अथवा आत्मज्ञान सिद्धभयो
इत्यादिक सब सिद्धि भयो किंचित् सुख पायो तेतो ओसको चाटिबो है कहा
मुक्तिहोइ है नहीं होय है औ द्रव्य का हीन जो पुरुषारथ है सो कौन पुरुषार
थहै मनमें बहुत बिचार करै है कि वाको दशहजारदेउं वाको पांच हजार देउं
जब द्रव्य की सुधि आई सो द्रव्य तो हैई नहीं है तब मनै में तवाई होयहै कि
हाय का करौं ऐसे नाना मतनमें लगे पाछे पछिताउ होयहै अन्तकाल में मैं
कहा कियो साहबमें न लाग्यो जाते मुक्तिहोती ॥ ३ ॥
गांठी रतन मर्म नहिं जानेहु पारख लीन्ही छोरीहो ।
कह कबीर यह अवसर बीते रतन नमिलै बहोरी हो॥४॥
या जीव सदाको साहबको अंशहै सो या रतन तुम्हारे गांठी में है ताको
यह राम नामते पारिख करिकै छोरि लेउ साहबके गुण जीवों में हैं वे बृहत्
चैतन्यहैं यह अणुचैतन्यहैं वे घन रस रूपहैं या लघु रसरूप हैं ऐसो जो शुद्ध आपनो
रूप जानै तौ रतन तेरे गांठीमें है ताको मर्म तुम रामनाम बिना नहीं जान्योकि
वा साहब कोहै मन माया ब्रह्मको नहीं है काहेते कि गुरुवालोग तिहारी पारख

कहरा । ( ४६९ )
छोरि लियो और और तिहारो साहब बनाइ दियो सो कबीरजी कहै हैं कि जों
ऐसो मनुष्य शरीरमें साहबको ज्ञान न भयो किमैं साहबको हौं तो या अवसर
बीति गये कहे या शरीर छूटिगये फेरि रतन जोहै आपने स्वरूपको ज्ञान कि
मैं साहब को अंशहौं सो पुनि न मिलैगो औ साहबको ज्ञानकै देनवारो राम
नाम न मिलैगो औ आगे जे कहि आये पंचांगोपासनवारे कापालिकादिक मतवारें
व्याकरणी सांख्य मीमांसावारे नैयायिक कणादवारे शंकरवेदांती नास्ति-
क मतवारे जो या कहै हैं कि हमारे मतमें काहे मुक्ति नहीं होय है सो कहै
हैं पंचांगोपासना तौ सगुणहै सो सत रज तम ये गुण माया के हैं सो मायाते
माया नहीं छूटै है या असंभवहै औ कापालिकादिक व्याकरणादि भैरवको मानै
हैं सो वेद विरुद्धहै ई मुक्तिदाता कोई नहीं हैं तामें प्रमाण॥ “मुक्तिदाता च सर्वे-
षborderं राम एव न संशयः ॥” औ वैयाकरण शब्दब्रह्मते मुक्ति मानै हैं सो केवल
शब्दब्रह्मके जाने मुक्ति नहीं होयहै जब शब्दब्रह्मकों जानिकै परब्रह्मको जानै
तब मुक्ति होइहै तामें प्रमाण॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि ।
श्रमस्तस्य श्रमफलोह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ ” औ ज्योतिषी कालज्ञानते मुक्ति मानै
हैं सो कालहूके कालजे श्री रामचन्द्रहैं तिनके बिना जाने मुक्ति नहीं होयहै
तामें प्रमाण ॥ “ यः कालकालो गुणी सर्ववेत्ता ” ॥ औ सांख्यवारे प्रकृति
पुरुषते मुक्ति मानै हैं सो पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रहैं तिनके विनाजाने मुक्ति नहीं
होयहै तामें प्रमाण ॥ “ वन्दे महापुरुष ते चरणारविंदम् ॥” औ पूर्वमीमां-
सावारे कर्म ते मुक्ति मानै हैं सो कर्म ते मुक्ति नहीं होय है कर्म त्यागेते मुक्ति
होयहै तामें प्रमाण ॥ “न कर्मणा न प्रजयाधनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ”
इति श्रुतेः ॥ औ नैयायिक ईश्वर श्री रामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण॥ “ तमीश्व-
राणां परमं महेश्वरं”॥औ कणादवारे नौगुणध्वंस मुक्ति मानै हैं सो नौ गुणध्वंसही
मुक्ति नहीं होयहै नौगुणध्वंस भये उपरांत जब भक्ति होयहै तब मुक्ति होयहै तामें
प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा नशोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं
लभते परां”॥औ शङ्कर वेदांती ब्रह्म ज्ञान करिकै मुक्ति मानै हैं सो जीव ब्रह्म कभी
होतही नहीं है तामें प्रमाण ॥ “सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यंभिदःसत्यंभिदः ॥
औ नास्तिक चारि प्रकारके हैं-सौगत १ बिज्ञानबादी २ सौ-

( ४७० ) | बीजक कबीरदास ।

त्रांत्रिक ३ चार्वाक ४ सो सौगतनामके आत्मा क्षणिक नाशमानमानै हैं जैसे
घट, सो आस्तिक मतते विरुद्धहै काहेते कि आस्तिक आत्माको नित्य मानै है ॥ १॥
विज्ञानवादी पदार्थ मात्रका ज्ञान स्वरूप मानै है सो आस्तिक मतमें बाधक है
काहेते कि जो क्षणिक ज्ञानके बाहर दूसर पदार्थ नहीं मानै है तौ ज्ञानाश्रय
आत्मा केहितराते होइ ॥ २ ॥ औ सौत्रांत्रिक गुणरूप आत्मा मानै है कौन
गुण सुख बिशेषगुण सो आस्तिक मतते बिरुद्ध है काहेते आस्तिक सुखरूप
सुखाश्रय आत्माको मानै है ॥ ३ ॥ औ चार्वाक शरीरैको आत्मा मानै हैं
काहेते प्रत्यक्षहै सो आस्तिक मतते बिरुद्धहै काहेते शरीरते अभिन्न आत्माको
मानै है याही रीति उदयनाचार्य बौद्धाधिकार ग्रन्थमें बहुत नास्तिकनकॊ खंडन
कियो है ॥ ४ ॥ औ अछू हमहूं कहै हैं औ सौगत जो आत्माको क्षणिक
नाशवान् मानेंगे औ चार्वाक जो शरीरको आत्मा मानेंगे तो जो क्षणिक नाश
मान् आत्मा होत तौ भूत कैसे होत याते सौगत निराकरण भयो औ जो शरीरै
आत्मा होयगो तौ मुर्दा कैसे होइगो शरीर काटिहू डारे चैतन्य रहैगो औ
विज्ञानबादी जो आत्माको ज्ञानस्वरूप मानिगो तौ अज्ञान कैसे होयगो औ
सौत्रांत्रिक सुख गुणस्वरूप आत्मा मानै है तौ गुणतो बिना गुणी रहतई नहीं
है सो गुणी कोहै जो कहो अर्हन्‌को अथवा जिनको गुण मानै है जीवात्माको
तौ गुण गुणी को समवाय है गुण गुणी को छोड़िकै नहीं रहै है
सो जीव जो अज्ञानी भयो सो जाको गुणहै जीव सोऊ अज्ञान भयो जो
चार्वाक कालैकै प्रत्यक्ष मानैहै गुण गुणी को नहीं मानि है वेद शास्त्रको
कहो मिथ्या मानौहौ सो ग्रहण शास्त्रमें लिखै है सो परतही है सो वेदको कहो
कैसे मिथ्या मानै तुम्हारे शास्त्र में लिखै है कि पृथ्वि नीचेको चली जाइहै सो
जौ पृथ्वी चली जाती तौ पाथर फेंकेते फेरि कैसे पृथ्वीमें मिलतो काहेसे कि
पाथर हलुकहै बिलम्ब पूर्वक आवाचाही पृथ्वि गरूहै जल्दी जावा चाही ताते
तुम्हारे ग्रन्थ झूठे हैं वेद शास्त्र सांचे हैं सो श्री रामचन्द्र बिना तुम मिथ्या
जन्म गमाइ दिह्यो ॥ ४ ॥

इति छठवां कहरा समाप्त !

कहरा । ( ४७१ )
अथ सातवां कहरा ॥ ७ ॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारेहो ॥ १ ॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसाहो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो॥२॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकाराहो ।
मोहिनि जहां तहां लै जैहै नहिं पति रहे तुम्हारा हो ॥ ३ ॥
मांझ मँझरिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरिया तँहवां सुख सोवै दास कबीरा हो॥४॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारे हो॥१॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसा हो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो२॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि पुकारे कहौ हौं कि श्री रामनाम को बिचारत हे
जीवौ! यह मनको सँभारे रहौ अनत न जान पावै मैं पुकारे कहौहौं अनत जायगो
तौ मारो जायगो ॥ १ ॥ ऊपरते मूड़ मुड़ायकै कानेमें मुद्रा पहिरिकै अंगमें
छार लपेटिकै मंजूसा कहे गुफामें बैठे औ प्राण चढ़ाइक मानन लगे कि हमहीं
ब्रह्म हैं सो ऊपरते तो बहुत रंग कियो पै भीतर भीतर उनको घर मूसि
गयो कहे साहबको भूलिगये ॥ २ ॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकारा हो ।
मोहिनि जहां तहां लैजैहै नहिं पति रहै तुम्हारा हो॥३॥
यह शरीररूपी जो गाउँ है तामें गर्वको जो भाराहै सो थिर भयो कहे यह
मान्यो कि यह शरीर मेरोहै तब माम जो है ममता औ कामादिक जे हैं अहं-
कार तेहिते भरि गयो सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि मोहनि जो है मोहि ले

( ४७२ ) बीजक कबीरदास ।
नवारी माया सो जहां रहै है तहँ तोको ये सब कामादिक लैजैहैं जो यह
मानि राख्योहै कि प्राण चढ़ाइकै ब्रह्मांडमें लैगये मायाते भिन्न द्वैगये सो या
पति तिहारी न रहेगी जब समाधिते जीव उतरैगो तब पुनि मायामें परि
जाउगे ॥ ३ ॥
मांझ मँझारिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरियातहँवां सुख सोवै दास कबीराहो४
सो मांझ जो है माया काहेते कि जीव साहब के बीचमें माया को आवरणहै
तौने के मँझरिया में जो जन बसै जानैहै कि मायाके बीचमें बसोहै औ माया
वाको ग्रहण नहीं करिसकै है जैसे जलमें कमल जल नहीं स्पर्श करि सकै हे
काहेते साहब को जानै है सहज समाधि लगाये है तेई जन थिर रहै हैं। अथवा
साहब औ जीव के मांझ कहे बिचबादक रामनाम तौने मँझरिया कहे जामिन
है साहबके पास पहुंचाइबे को तौने रामनाम में जो कोई बसै जानैहै कि मकार
रूप मैंहौं रकाररूप साहब है मैं सदाको दास हौं औ रामनाम सर्वत्र पूर्ण है
ऐसो जो कोई जानै सो थिर रहै है तामें प्रमाण गोसाईं की चौपाई ॥ "अगुण
सगुण बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी ॥ " फिरि प्रमाण
श्लोक ॥ "रकारश्शेषलोकश्च अकारोमर्त्यसंभवः । मकारश्शून्यलोकश्च त्रयो-
लोकानिराशयाः ॥" तामें प्रमाण कबीर जीका पद् ॥ "क्या नांगे क्या बांधे चाम
जो नहिं चीन्है आतम राम ॥ नांगे फिरै योग जो होई । बनको मृगा मुकु-
ति गो कोई ॥ मूड़ मुड़ाये जो सिधि होई । मूड़ी भेड़ि मुक्ति क्यों न होई ॥
बिंद राखेजो खेलहि भाई । खुसरै कौन परम गति पाई ॥ पढ़े गुने उपनै
हंकारा । अधघर बूड़े वार न पारा ॥ कहै कबीर सुनौरे भाई । राम नाम
बिन किन सिधि पाई ॥ " औ थिर ह्वैकै गुरु कहे सबते श्रेष्ठ श्री रामचं-
न्द्रके नगर कहे साकेतमें कबीर जे जीव ते उनके दासद्वै तहां सुखसों सो वै हैं
वहां और देवके उपासना वारे अहं ब्रह्मास्मिवारे जेहैं ते नहीं जाइ सकैहैं वे
मायाहीमें रहे आवै हैं ॥ ४ ॥
इति सातवां कहरा समाप्त ।

कहरा । ( ४७३ )
अथ आठवां कहरा ॥ ८ ॥
क्षेम कुशल औ सही सलामत कहहु कौनको दीन्हा हो ।
आवत जात दुनौ विधि लूटे सरब संग हरि लीन्हा हो॥१॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया मीरा पैदा कीन्हाहो ।
कहँलौं गिनैं अनंत कोटिलै सकल पयाना दीन्हाहो ॥२॥
पानी पवन अकाश जाहिगो चन्द्र जाहिगो सूराहो ।
वहभी जाहिगो यहभी जाहिगो परत काहुको न पूराहो॥३॥
कुशलै कहत कहत जग विनशै कुशल कालकी फांसीहो ।
कह कबीर सब दुनियांविनशल रहलरामअविनाशीहो॥४॥
क्षेम कुशल औ सही सलामत कहहु कौन को दीन्हा हो ।
आवत जात दुनौ बिधि लूटे सरब संग हरि लीन्हा हो॥१॥
श्री कबीरजी कहै हैं क्षेम कहे कल्याण स्वरूप सदा रहै औ कुशल कहे
सब बातमें कुशल होय अर्थात् सर्वज्ञ होय औ सही सलामत कहे जेहिके सहीतें
जीव सलामत ह्वै जाय अर्थात् जेहिके अपनाय लीन्हेते जीवको जनन मरण
छूटि जाय ऐसे जे अपने गुणहैं ते साहब कौने जीवको अपने बिना जाने दीन्ह
है अर्थात् काहूको नहीं दीन ऐसे जे साहब हैं सरब संग कहे सब के अंत-
र्यामी तिनको या काल जीवको आवत कहे जनन औ जात कहे मरन दूनौ
बिधिमें लूट्यो अर्थात् जब आयो तब गर्भको ज्ञान नाशकै दियो औ जब
जाइगो तब वही को नाश ह्वैगयो साहबते चिन्हारी ना करनदियो ॥ १ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया मीरा पैदा कीन्हाहो ।
कहँलौं गिनैं अनंत कोटिलै सकल पयाना दीन्हाहो॥२॥

( ४७४ ) बीजक कबीरदास ।
औ सुर नर मुनि जे हैं औ पीर जे हैं औ औलिया जे हैं औ मीर जे पादशा-
हहैं तिनको पैदा करत भयो और कहांलौं गिनैं अनंत कोटि जीवनको पैदा
करि पायना कराइ देतभयो ॥ २ ॥
पानी पवन अकास जाहिगो चन्द्र जाहिगो सूराहो ।
वह भी जाहिगोयहभीजाहिगो परतकाहुको न पूराहो॥३॥
कुशलै कहत कहत जग बिनशै कुशल कालकी फांसीहो ।
कहकबीरसबदुनियाबिनशलरहलरामअविनाशीहो ॥४॥
पानी औ पवन औ आकाश औ चन्द्रमा औ सूरा कहे सूर्य औ यहभी
कहे यह जगत् औ वहभी कहे ब्रह्म सो ये सब चले जायेंगे सबको काल खाय
लियो है काहूकी पूर नहीं परी है ॥ ३ ॥ सो कुशलै कहत कहत कहे कुशलै
मानेमाने जग सब मरिगयो कुशल कोई न रहे कुशल कालकी फांसी है जाकी
फांसीमें सब परे हैं सो कबीरजी कहैं हैं कि सब दुनियां बिनशि जाय है जो
राम करिकै जन्म बिनाशी है सोई रहिगे अर्थात् रामके दासई अविनाशी हैं
इनका नाश नहीं होयहै सो या बाल्मीक रामायणमें प्रसिद्ध है अङ्गद हनुमान्
आदिकनको नाश नहीं भयो है ॥ ४ ॥
इति आठवां कहरा समाप्त ।
अथ नवां कहरा ॥ ९ ॥
ऐसन देह निरापन बौरे मुये छुवै नहिं कोईहो ।
डंडक डोरवा तोरि लै आइनि जो कोटिकध नहोईहो॥१॥
उरध इवासा उपंजग तरासा हंकराइनि परि वाराहो ।
जो कोई आवै वेगि चलावै पल यक रहन न हाराहो॥२॥
चंदन चूर चतुर सब लेपैं गल गजमुक्ता हाराहो ।
चोंचन गीध मुये तन लूटैं जंबुक वोदर फाराहो ॥ ३ ॥

कहै कबीर सुनोहो सन्तो ज्ञानहीन मति हीनाहो ।
यक यक दिन यह गति सबही की कहा रावकादीनाहो ॥४॥
ऐसी देह निरानप है कहै अपनी नहीं है और सब अर्थ प्रगटई है श्री कबीरजी
कहैहैं कि जे मतिते हीन मूर्ख परम पुरुष श्री रामचन्द्रके ज्ञानते हीन रहैं तिनके
शरीरकी दशा ऐसे एक दिन सबकी है चाहै रंक होइ चाहै राउ होइहै ॥ ४ ॥
इति नवां कहरा समाप्त ।
अथ दशवां कहरा ॥ १० ॥
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग विलगाई हो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झाईहो ।
यक समान कोई समुझत नाहीं जरा मरण श्रम जाईहो॥२॥
रैनि दिवस मैं तहँवो नाहीं नारि पुरुष समताई हो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो नामोरे चेलिकाई हो ॥ ३ ॥
तिरविधि रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रम राईहो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊँ सहज रहौं दुनियाई हो ।
जोलहा तान बान नहिं जानै फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरुप्रताब जिन जैसो भाष्यो जिन विरले सुधिपाईहो॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परे हैं किछु किछु कबिर न पाईहो ६
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग बिलगाईहो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥

( ४७६ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुमुख ।
मैं सबमें हौं औ सब न होउँ ऐसे मोको बिलग बिलग कहे जुदा जुदा
बिलगाइकै बेद कह्यो । इहां दुइबार बिलग बिलग कह्यो सो एकतो चित् कहै
जीव ब्रह्म ईश्वर अचित् कहै माया काल कर्म सुभाव पृथ्वी आदिक मायाके
कार्य सब सो ये दोहुनमे अंतर्यामी रूपते व्यापक है। सो जीव ब्रह्म ईश्वर चित्
तत्त्व में व्यापक हौं तामेंप्रमाण ॥ “विष्णुवायुत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवताभवत् ।
मर्त्याद्यधर्मदेहेषु स्थितो भजति देवताः”॥इति श्रुतिः।“एको देवः सर्वभूतेषुगूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतांतरात्मा इति श्रुतिः” ॥ “ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमिति गीता-
याम्॥” अचितौमें व्यापक है तामेंप्रमाण॥ “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थि-
तो जगत् इति गीतायाम्”॥सो चित्अचित्दोऊ व्याप्यपदार्थ हैं व्यापक मैं हौं
सो चित् अचित्‌रूप पिछौरा दुइ छोरिया मेरो ओढ़नहै सर्वत्र महींहौं सो वेद
को तात्पर्य न जानिकै लोग यकताई बोले हैं कि एकई ब्रह्म है पिछौरा ओटै
याको एकही कहै हैं दूसरा नहीं कहै हैं लोगजो यकताई कहैहैं सो कौनी तरह
ते कहै है सो कहै हैं ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झांईहो ।
यक समान कोइ समुझत नाहीं जरा मरण भ्रम जाईहो॥२॥
वहीं ब्रह्म निरंतर एक सर्वत्र है या लोग बोलै हैं सो कहा अन्तर नहीं है अर्थात्
अन्तरहै कैसे जैसे जलभरे घटनमें शशिकी छाया वामें व्याप्य व्यापक बनो है सो एक
जो मैं सो समान कहे सबमें समव्यापकहौं ताको कोई व्याप्य व्यापक कोई नहीं
समुझै है तौ कहा उनको जरा मरण भ्रम जाइहै अर्थात् नहीं जाइहै सो अंतर्यामी
रूपते व्यापक साहब कहि चुके अब निज रूपते जहाँ रहै हैं तहांकी बात कहै हैं॥२॥
रैनि दिवस में तहँवों नाहीं नारि पुरुष समताईहो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो ना मोरे चेलिकाईहो ॥ ३ ॥
जहांमैं रहौ हौं तहां न रातिहै न दिनहै औ सब नारी रूपहैं जो पुरुषहू जाईहै
सो नारिन रूपते रासमें प्राप्त होइहै पुरुष महींहौं औ समताई है जैसे सच्चिदानन्दरूप

कहरा । ( ४७७ )
ऐसे ओऊ सच्चिदानंद रूपहैं मैं न बालकहौं न वृद्धहौं सदा किशोररूप बन्यों
रहौहौं औ न मोरे चेलिकाई कहे कोऊ वह उपदेश्य नहीं है अर्थात् अज्ञानी
कोऊ नहीं हैं सब मेरे रूपको जानैं हैं वहां राति दिन नहीं है तामें प्रमाण ॥
“न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम
परमं मम ” ॥ ३ ॥
तिरबिध रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रमराई हो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊं सहज रहौं दुनियाई हो॥४॥
तिरबिध रहौं कहे जीव ब्रह्म ईश्वरनमें जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं औ
सबनमें बरतौं कहे माया काल कर्म सुभाव इन में जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं
सो इनमें जो रमनवारो अंतर्यामी मेरो रूप ब्रह्म ताहूको मैं राईहौं सो पठयें
नहीं जाउहौं न आनेते आऊंहौं अर्थात् जो कहूं नहोउं तौ ना आनै आऊँ
न पठये जाउँ सर्वत्रै तो हौं सो यही रीतिते सहजही या दुनियामें अंतर्यामीके
अंतर्यामी रूपते पूर्णहौं ॥ ४ ॥
जोलहा तान बान नहिं जानैं फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरु प्रताप जिन जैसो भाष्यो जन विरले सुधि पाई हो॥५॥
जोलहा जे हैं जीव ते तान बान नहीं जानैं अर्थात् वा हंसस्वरूप पोसाक
बनै नहीं जानैं जो पहिरिके मेरे समीप आवै फाटबिनै दश ठाई कहे दशहैं
छिद्र जिनमें ऐसो जो शरीर ताहीको बिनै है कहे नाना मतनमें परिकै वही
कर्म करैहै जामें अनेक जन्म शरीर धारण करत जायहै जो कहो कोऊ जान-
तही नहीं है तौ गुरुके प्रतापते जो कोऊ मेरो रूप भाष्यो है जैसो सो तौ कोई
बिरला जन सुधि पायो है अर्थात् जाको सत्गुरु मिल्यो है सोई पायों है ॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परैहैं किछु किछु कबीरन पाईहो ६
अनंत कोटि जे जीव हीराहैं तिनमें मन बेध्यो है सो या हीरारूप
जीवको फिटिकिरिउ को मोल न रहिगयो सो सुर जे हैं मुनि जे हैं नर जेहैं

ते वही अपने स्वरूपको खोजैहैं सो किछु किछु कहे थोरहूते थोर जीव
पाइनहै और कोई नहीं पायो जे आपनो रूप मेरो रूप गुरुप्रताप जानि
शरीरको बिनैया मनको त्याग्यो है तेई पायो है अथवा किछु किछु कबिरन पाई
कहे साकल्य करिकै हमारो भेद तौ कोई जानतही नहीं है जे अपनो रूप मेरोरूप
जानत जे जीव ते किछु किछु भेद पायो है ॥ ६ ॥
इति दशवां कहरा समाप्त ।
अथ ग्यारहवां कहरा ॥११॥
ननँदी गे तैं विषम सोहागिनि तैं निदले संसारागे ।
आवत देखि एक सँग सूती तैं अरु खसम हमारागे ॥ १ ॥
मोरे बापकि दोय मेहरिया मैं अरु मोर जेठानीगे ।
जब हम ऐलि रसिकके जगमें तबहिं बात जग जानीगे २
माई मोर मुवल पिताके संगहि सर रचि मुवल संघातागे।
अपनो मुई और ले मुवली लोग कुटुम्ब सँग साथागे ॥३॥
जौ लौं सांस रहै घट भीतर तौ लग कुशल पर

कियो साहबको ज्ञान हमारे नहीं भयो सो साहब या लोकके
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  • "साहबको": साहबको
  • "ज्ञान": ज्ञान
  • "हमारे": हमारे
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  • "भयो": भयो
  • "सो": सो
  • "साहब": साहब
  • "या": या
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मालिक जेहैं तेईहैं जिनके जाने संसार छूटैहै ब्रह्मसाहब नहीं है ॥ २ ॥
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  • "जेहैं": जेहैं
  • "तेईहैं": त + े + ई + ह + ै + ं
  • "जिनके": जिनके
  • "जाने": जाने
  • "संसार": संसार
  • "छूटैहै": छ + ू + ट + ै + ह + ै
  • "ब्रह्मसाहब": ब्रह्मसाहब
  • "नहीं": नहीं
  • "है": है
  • "॥ २ ॥": ॥ २ ॥
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सो पिता जो हमारो धोखा ब्रह्म जौनेके द्वारा हम व्यष्टिभये सो जब
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( ४८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बारहवां कहरा ॥ १२ ॥
या माया रघुनाथ कि बौरी खेलन चली अहेरा हो ।
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारै काहु न राखै नेराहो॥१॥
मौनी वीर दिगम्वर मांरे ध्यान धरंते योगीहो ।
जंगल मेंके जंगम मारे माया किनहुं न भोगीहो ॥ २ ॥
वेद पढ़ंता पांडे मारे पूजा करते स्वामीहो ।
अर्थ विचारे पंडित मारे वांध्यो सकल लगामीहो ॥ ३ ॥
शृंगीऋषि बन भीतर मारे शिर ब्रह्माके फोरीहो ।
नाथमछंदर चले पीठदै सिंहलहूमें बौरीहो ॥ ४ ॥
साकतके घर कर्त्ता धर्त्ता हरि भक्तनकी चेरीहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो ज्यों आवै त्यों फेरी हो ॥ ५ ॥
ज्ञानशक्ति कबीर को जवाब दियो मैं कहा करौं मोको कोई जीवनके उदय
होन नहीं देइहै माया सबको बांधि लियो है सो कबीरजी जीवनसों कहै हैं
यह माया छुइ जान न पावै जबहीं आवै तबहीं यासों मुंह फेरिलेउ तबहीं बचौगे
या सबको बांधि लियो है तुम्हहूंको बांधि लेइगी औ इहां रघुनाथकी बौरी जो
माया कह्यो सो रघुहै जीव ताके नाथ जे श्री रामचन्द्र तिनकी या माया है सों
जीवनको धरि धरिकै शिकार खेलै है सो जब अपने नाथको या जीव जानै
जिनकी या मायाहै तब तब या मायाते छूटैगो अपने बल ते जीव न छूटि
सकैगो अथवा या माया रघुनाथकी बौरी है रघुनाथकी बौरी कहै रघुनाथकों
न जानिबो यहै याको स्वरूप है १ ॥ ५ ॥
इति बारहवां कहरा समाप्त
इति कहरा सम्पूर्ण ।

अथ बसंत ।
पहिला बसंत ॥ १ ॥
जहँ वारहि मास बसंत होय।परमारथ बूझै विरल कोय॥१॥
जहँ वर्षै अग्नि अखंड धार।बन हरियर भो अट्ठार भार २॥
पनिया अन्दर तेहि घेरे न कोय।वह पवन गहे कश्मल न धोय३
बिनुतरुवरजहँ फूलो अकास।शिव औविरंचि तहँ लेहिंवास४
सनकादिक भूले भवँर भोय । तहँ लख चौरासी जीव जोय५
तोहिं जो सतगुरु सत सो लखाव।तुम तासु न छांड़हु चरणभाव
वहअमरलोकफललगे चाय।यह हक कबीर बूझै सो खाय७
जहँ बारहि मास बसंत होय। परमारथ बूझै विरल कोय॥ १॥
जहँ वर्ष अग्नि अखंड धार । वनहरियर भो अट्ठार भार २
जाके कहे जौने साहबके लोकमें बारहौ मास बसंत बनो रहै है सो या
परमार्थ कोई बिरला बूझै है। सो वा रूपकातिशयोक्ति अलंकार करिकहै हैं॥१॥
औ बसंत ऋतुमें सूर्यते अग्नि बर्षै है अखंडधार बन जो है अठारह भार बन-
स्पती सो हरियर होतजाइ हैं औ साहबके लोकमें कोटिन सूर्यको प्रकाशहै
परंतु सबको ताप हारि लेनवारो है बहांके सब बन संतानक आदिक हरियर
रहैं ॥ २ ॥
३१

( ४८२ ) बीजक कबीरदास ।
पनिया अंदर तेहि धरे न कोय।वह पवन गहेकश्मल न धोय
बिनु तरुवर जहँ फूलोअकासा।शिव औ विरंचितहँ लेहिंबास
औ बसंत ऋतुमें बृक्षनके अंदरनमें कोई पानी नहीं धरै है चन्द्र जो है सो
अमृतको श्रवै है ताहीको गहे पवन वृक्षनके कश्मलको धोयडारै है ।
औसाहबको लोक कैसो है कि, पनिया अंदर कहे वा रसरूपहै ताको कोई नहीं
जानैहै । वही रसरूप लोकको स्मरण पवनहै ताके गहे कहे कियेते कश्मल जे
पाप हैं ते धोय जात हैं । अथवा कामादि जे कश्मलहैं ते धोय जात हैं
॥ ३ ॥ औ बसंत ऋतुमें जहां तरुवर नहीं हैं ऐसो जो आकाश सोऊ पुहुपन
के परागन करिकै फूलो देखो परै है । कैसो है आकाश जहां शिव विरंचि
बास लेहि हैं अर्थात् वासकीन्हे हैं सुगंधित द्वैरह्यो है । औ साहबको लोककै-
साहै कि जेहिका प्रकाश चैतन्याकाश, बिना तरुवरै जगतरूप फूलफूलैहै शिव
विरंचिआदिक बास लेहिंहैं ॥ ४ ॥
सनकादिक भूले भवँर भोयातहँ लख चौरासी जीव जोय५॥
बसंत ऋतुमें चौरासी लाख योनि जीवनकी कौन गनती । सनकादिक जे
मुनि हैं तेऊ पुष्पमकरंद में भोयकै भवँरकी नाइ भूलि जाहिंहैं । औ साहबको
लोकमकाश ब्रह्म कैसाहै कि, सनक सनन्दन सनत्कुमार जाके भवँर में भोयकै
कहे परिकै भूलै हैं चौरासीलाख योनि जीवनकी कौनगिनती है ॥ ५ ॥
तोहिंजोसतगुरुसतकैलखाव।तुमतासुनछाड़हुचरणभाव६॥
वहअमरलोकफललगेचाय।यहकहकबीरबूझै सोखाय॥७॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसो जो साहब को लोक जहां बरहौ मास
बसंत बनो रहै है तौन जो सतगुरु कहे साहबके बतायदेनवारे तोको सत्यकै-
लखायो होय तो तुम ताके चरणको भाव न छांड़ौ । भाव यहहै कि, वा लोक
के मालिक जो साहब हैं तिनहूंको बताय देइँगे । वह अमरलोक कैसा है कि,
जहां चारिउ फल अर्थ धर्म काम मोक्ष आनंदैकै फल लगेहैं । सो हे जीवो !
या बात जो कोई बूझैहै सोई खायहै । साहब के धाम में बारहा मास बसंत-
रहै है । तामें प्रमाण कबीरजीकी साखी ज्ञानसागरकी ॥ “सदा बसंत होत

बसंत । ( ४८३ )
तेहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ जहँवां रोग शोक नहिं होई ।
सदा आनन्द करै सब कोई ॥ चन्द्र सूर्य दिवस नहिं राती । बरण भेद नहिं
जाति अजाती ॥ तहँवां जरा मरण नहिं होई । क्रीड़ा बिनोद करै सब कोई ॥
पुहुप विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ काया सुन्दरको
परवाना । उदित भये जिमि षोड़श भाना ॥ येता एक हंस उजियारा ।
शोभित चिकुर उदय जनु तारा ॥ बिमल बास जहँवां पौढ़ाही । योजन चार
घ्रान जो जाही ॥ श्वेत मनोहर छत्र शिर छाजा । बूझि न परै रंक अरु
राजा ॥ नहिं तहँ नरक स्वर्गकी खानी । अमृत बचन बोलै भल बानी ॥
अस सुख हमरे घरन महँ, कहैं कबीर बुझाय । सत्य शब्दको जानै, सो
अस्थिर बैठै आय" ॥ ६ ॥ ७ ॥
इति पहिला बसन्त समाप्त ।
अथ दूसरा बसंत ॥ २ ॥
रसनापढ़िभूलेश्रीवसंत । पुनिजाइपरिहौतुमयमकेअंत॥१॥
जोमेरुदण्डपरडंकदीन्ह । सोअष्टकमलपरजारिलीन्ह॥२॥
तबब्रह्मअग्निकीन्होप्रकास । तहँअद्धऊर्ध्ववहतीबतास॥३॥
तहँनवनारीपरिमलसोगावँ।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावैँ४
जहँअनहदबाजारहलपूर। तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूर ॥५॥
तैंमायादेखिकसरहसिभूलि । जसबनस्पतीबनरहलफूलि६
यहकहकबीरयेहरिकेदास । फगुवामांगैबैकुंठवास ॥ ७ ॥
रसना पढ़ि भूल श्रीबंसत।पुनि जाइ परिहौ तुम यमके अंत १
श्रीबसंत कहे ऐश्वर्यरूप जो बसंत ताको रसना में पढ़िकै मन बचनके
परे जो साहबके लोकको बसंत ताको तुम भूलि गयो । रसनामें पढ़ि जो कह्यो

( ४८४ ) बीजक कबीरदास ।
तामें दुनियाहै कि, औरै देवतन की उपासनामें बड़ों ऐश्वर्य्य प्राप्तिहोइहै यह
पोथिनमें पढ़ि पढ़ि भुलाइगयो । वाहूको जीभैभरेते कह्यो कछु प्राप्ति नहीं भै
सो तुम फेरि यमके अंत कहे संसारमें परिहौ । औ जो लेहू पाठहोय तौ रस-
नामें श्रीबसंतको पढ़िलेहुनहीं तो पुनि यमके अंत कहे फंदमें परिहौ ॥ १ ॥
जो मेरु दंड पर डंक दीन्ह। सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह२
औ जो या गुमान करो कि हम योगबारे हैं हम यमके अंतमें न परैंगे ।
सो जो तुम मेरुदंडमें प्राणखैंचिकै मेरुदंडपर डंका दीन्ह्यो, औ अष्टजो हैं आठों
कमल मूलाधार, विशुद्ध, मणिपूरक, स्वाधिष्ठान, अनहद, आज्ञाचक्र, सहस्रा-
रचक्र, अठयें सुरतिकमल जहां परमपुरुषहै तामें पहुंचिकै जारि दीन्ह अर्थात्
योगौ की खबरि भूलिगई ॥ २ ॥
तहँ ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास।तहँ अद्धो ऊर्ध्व वहती बतास३
तहँनवनारीपरिमलसोगाँव।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावँ४
सो वा ज्योतिमें लीनभयो जीवतहँ ब्रह्मअग्नि प्रकाश करत भई औ बतास-
जो अधोऊर्ध्व श्वास सो वैह बहतभै अर्थात् बहिरे न आवत भै श्वास वहैं रहत
भै याभांति जीव तखतमें बैठि मालिक भयो गांवकारा बसंतदेखैहै ॥ ३ ॥ सो-
यहां परिमल कहे गंधका गांव है शरीरमें पृथ्वीतत्त्व अधिकहै सो गंधका गांव
शरीरहै तौने में नौ नारी हैं कहे नौ राहहैं तहां पांचो जे ज्ञानेन्द्री हैं तेई सखी
देखन जायहैं अर्थात् वहैं लीन ह्वै गई हैं ॥ ४ ॥
तहँ अनहद बाजा रहल पूरि।तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूरि॥५॥
तैं माया देखिकस रहसिभूलि।जसवनस्पतीवनरहलफूलि ६
बसंतमें बाजा बजै है सो अनहद बाजा जहां पूरि रह्यो है तहां बहत्तरि
पुरुष जे बहत्तरिकोठाहैं ते धूरि खेलैहैं अर्थात् चैतन्यता न रहिगै ॥ ५ ॥ सो
बसंतमें बनस्पती फूलै हैं ऐसे या माया फूलि रही है । तामें समाधि उतरे
फिरि काहे भूले । अथवा जैसे बनस्पतीफूलैहैं ऐसे गैवगुफामें सुधापीकै नागिनी
फूली है तामैंतैं काहे भूलिरहै है । कहा वा माया के बहिरे है समाधि नागिनि-
हीके आधार तो समाधिउहै ॥ ६ ॥

बसंत । ( ४८५ ) .
यह कह कबीर ये हरिके दास । फगुवा मागै वैकुण्ठ वास॥७॥
सो या हठयोग करिकै जानै कि मैं मुक्त होउँगो, तौ या समाधिमें मायाहीतें
नहीं छूट्यो मुक्त कहां होइगो । ताते श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवात्मा !
हरिके दास तैं बैकुंठबासको फगुवामागै अर्थात् फगुहार फगुवा खेलाइकै
फगुवामागैं हैं सोतैंहठयोगकियो ताको फल फगुवा राजयोग मांगु जाते बैकुंठ
बासहोई ॥ ७ ॥
इति दूसरा बसंत समाप्त ।
अथ तीसरा बसंत ॥ ३ ॥
मैं आयउँमेहतरमिलनतोहिं।अबऋतुवसन्तपहिराउ मोहिं १
है लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुरा ना खुंटा तीन ॥२॥
शर लागे सै तीनि साठि । तहँ कस न वहत्तरि लागगांठि॥३
खुर खुर खुर खुर चलै नारि।वहबैठिजोलाहिनिपलाथिमारि४
सो करिगहमें दुइ चलाहिं गोड़ा।ऊपर नचनी नचि करै कोड़५
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार । सखी पांच तहँ रचीधमार ॥६॥
वें रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर ॥७॥
मैं आयउं मेहतर मिलन तोहिं।अबऋतुवसंतपहिराउमोहिं १
हैं लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुराना खुंटा तीन ॥२॥
जीव कहैहैं मेह कही बड़ेको औ जो बड़ाते बड़ा होइ ताको मेहतर कहै हैं
फ़ारसीमें । सो ईश्वरनते ब्रह्मते जो बड़े श्रीरामचंद्रहैं तिनसों जीव कहै है कि,
मैं तुमको मिलन आयो हौं । सो जौने लोकमें सदा बसंत रहै है सो मोको
पहिराओ अर्थात् मेरो प्रवेश कराइ दीजे । ताना रूप जो मेरे शरीरकों बसंत
तातें छुड़ाइये ॥ १ ॥ सो लम्बी पुरिया कौन कहावै जो ताना तनै है पूरै है