कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । ( ४७ )
बिन नहिं पावै १६४रंती ॥ अक्षर भए अनेक उपाय ॥ अक्षर
सुनि २ शून्य समाय ॥ अक्षर से भव आवै जाय ॥ अक्षर
काल सबनको खाय ॥ अक्षर सबका भाषे लेखा ॥ अक्षर
उत्पति प्रलय विशेखा ॥ अक्षरकी पावै सहिं१६५दानी ॥ कहैं क-
बीर तब उतरे प्रानी ॥ साक्षी ॥ परखावे गुरुकृपा
करि, अक्षर की सहिदानि ॥ निज बल उदथ विचारते,
तब होवे भ्रम हानि ॥ २८ ॥ रमैनी ॥ बावन के बहु बने
तरंग ॥ ताते भासत नाना रंग ॥ उपजे औ पालै अनुसरै ॥
बावन अक्षर आखिर करै ॥ राम कृष्ण दोउ लहर अपार ॥
जेहिपद गहि नर उतरै पार ॥ महादेव लोमश नहिं बांचे ॥
अक्षर त्रास सबै मुनि नाचे ॥ ब्रह्मा विष्णु नाचै
अधिकाई ॥ जाको धर्म जगत सब गाई ॥ नाँचै गण गंधर्व
मुनि देवा ॥ नाचै सनकादिक बहु भेवा ॥ अक्षर १६६त्रास सबन
को होई ॥ साधक सिद्ध बचे नहिं कोई ॥ अक्षर त्रास लखे
नहिं कोई ॥ आदि भूल बंधे सब लोई ॥ अक्षर सागर अक्षर
नाव ॥ करणधार अक्षर समुदाय ॥ अक्षर सबका भेद
बखान ॥ बिन अक्षर नहिं अक्षर जान ॥ अक्षर आसते फंदा
परे॥ अक्षर लखे ते फंदा टरे॥ गुरु शिष अक्षर लखलखावे ॥
चौराशी फंदा मुक्तावै ॥ बिनु गुरु अक्षर कौन छोडावे ॥
अक्षर जाल ते कौन बचावै ॥ संचितँ १६७ क्रिया उदय जब होय ॥
मानुष जन्म पावै तब सोय ॥ गुरुपारख बल उदय विचार ॥
परख लेहु जगत गुरुमुख सार ॥ अस्ति हंसप्रकाश अपार॥
१६४ प्रवृत्ति ॥ १६५ चिह्न, पारख, पहिचान, ॥ १६६ भय ॥
१६७ जन्मांतरोंमें संचित किया हुआ कर्म ॥
( ४८ ) रमैनी ।
गुरुमुख सुख निज अति दातार २७ ॥ साक्षी ॥ अक्षर है
तिहु भर्मका, बिनु अक्षर नहिं जान॥ गुरु कृपानिज बुद्धिबल,
तब होवे पहिचान २९ ॥ साक्षी ॥ १६८जँहवां से सब प्रगटे, सो
हम समझत नाहि ॥ यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म
कहि ताहि ॥ ३० ॥ साक्षी ॥ ब्रह्म विचारे ब्रह्मको, पारख
गुरु १६९प्रसाद ॥ १७०रहित रहे पद परखिके, जिव से होय
१७१अंवाद ॥ ३१ ॥ मूल रमैनी सम्पूर्णा ॥ कठिन शब्द जेते रहे,
टिप्पणी करि बनाय ॥ बाकी अब कछु होय जो दीजो संत
जनाय ॥ १ ॥ गुरुथल १७२हौता जानिये, १७३शिवहर जन्म स्थान॥
युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ २ ॥
१६८ जहांसे ॥ १६९ दया, कृपा ॥ १७० अलग ॥ १७१ वाद
रहित ॥ . १७२ जिला सारन डा० घ० कुवाहकोटकें इलाकेमें और
हथुआसें पांच कोस उत्तर पर है ॥ १७४ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें
राजस्थान हैं ।
इति श्रीमूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधिता समाप्ता ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाणा—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेंकटेश्वर ” ( स्टीम् ) यन्त्रालय-बम्बई.
सत्यनाम
बीजक कबीरदास ।
अथ आदिमंगल ।
दोहा—प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि बिधि उपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
तवसतगुरु मुखबोलिया, सुकृतसुनोसुजान ॥
आदि अन्त की पारचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
प्रथमसुरति समरथ कियो, घटमें सहजउचार ॥
ताते जामन दीनिया , सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चितमनसातो कीन्ह ॥
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तवसमरथ के श्रवणते, मूलसुरति भै सार ॥
शब्द कला तातेभई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचै अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइ इच्छा तहँ गुप्तहैं, सो सुकृत चितचीन्ह ॥ ६ ॥
(२) बीजक कबीरदास ।
योगमया यकु कारणे, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
याअविगतिसमरथकरी, ताहिगुतकरिदीन्ह ॥ ७ ॥
श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड आंचित्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अंड शिखा पर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
ते अचिन्त के प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगै, देवी सुरति निरबान ॥
श्यामवरण यकअंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दशद्वारे कढ़ि वाप ॥ १४ ॥
तेहिते ज्योति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीनों देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारिखानितिनसिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशादै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
आदिमंगल। ( ३ )
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥१८॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ॥
उत्पतिपरलयदुःखसुख, फिरिआवहिंफिरिजाहिं १९
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उतपती, सो तुमसों कहिदेत ॥२०॥
सात सुरति सवमूलहै, प्रलयहु इन्हीं माहिं ॥
इन्हीं मासे ऊपजे, इन्हीं माँह समाहिं ॥२१॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाइ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ॥२२॥
सात सुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥२३॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥२४॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥२५॥
वस्तुनिर्देशात्मक मंगल ।
दोहा-प्रथमै समरथ आपरहे, दूजा रहा न कोय ॥
दूजा केहिविधि उपजा, पूंछतहौं गुरुसोय ॥१॥
कबीरजीकी वाणीके अर्थ करिवेकों मोमें सामर्थ्य नहींरही परंतु साहब यह
विचारिकै कि कबीरजीके बीजकको पाखण्ड अर्थलगाइकै जीवबिगरे जाँयहैं सो
साहब तो परमदयालु हैं उन कों करुणाभई तब कबीरजीको भेज्यो याकहि कै
कि आगे हम तुमको भेज्यो हतो सो तुम ग्रन्थबनाइकै बहुत जीवनको उप-
देशकरिकै उद्धार कियो सो अब तिहारे ग्रन्थको पाखंड अर्थकरिकै पाखंडी हैं
कै जीव बिगरे जायँ हैं औ बहुत बिगरिगये सो तुमनाइकै जौन अर्थ तुम बीज-
कमें राख्योहै सो अर्थ विश्वनाथ सों बनवावो जाते सो अर्थ समुझिकै जीव
हमारे पास आवैं सो कबीरजी आयकै मोसों कह्यो कि तुम बीजकको अर्थ
बनावो हम तुमको बतावेंगे सो उनके हुकुमते मैं बीजकको अर्थ बनाउं हौं
बतावने वाले श्रीकबीरहीजी हैं मोमें ताक़त नहीं है जो मैं बनायसकौं और ना-
भाजी भक्तमालमें लिख्योहै कि “कबीर कानि राखी नहीं बरणाश्रम षटदरशनी”
सो इहां कबीरजी को सिद्दात मत मैं कहौंगो औ सर्वसिद्धांतग्रंथ जो मैं बनायोहै
तामें सबको सिद्धांत यथार्थ राख्योहै सो यहां बीजकके तिलक में साहबको औ
कबीरजीको हुकुम यहीहै कि एक सिद्धांत रहै जो सबतेपरैहै और सिद्धांत सबखंडन
हैजायँ सो सबके सिद्धांतनको खण्डन करिकै एक सिद्दात मैं वर्णन करौंहौं सों
सुनिकै साहब के हुकुमी जानिकै साधुलोग पंडितलोग और और मत वाले जेहैं
ते मेरे ऊपर खफा न होयँ प्रसन्न रहैं ना समुझिपरै तौ प्रसन्नहोइकै गुरुसों पूँछि-
लेइँ अब अर्थ लिखैहैं ।
अर्थ-प्रथम समरथ जे श्रीरामचन्द्रहैं ते आपही हैं दूसरा कोई नहीं
रह्यो जो कहौ उनके लोक में तौ हंस हंसिनी सब वर्णन करैहैं उनके
पार्षद सबहैं ताको वर्णन निर्भय ज्ञानमें विस्तारते हैं सो इहां संक्षेप तें
सूचित किये देई हैं ॥ “सत्य पुरुष निर्भय निरबानां । निर्भय हंस तहँ
निर्भयज्ञाना ॥ ” इत्यादिक बहुत वर्णन निर्भयज्ञानमें कबीरजी कियोहै तुम
एकही कैसे कहौ है सो सत्यहै उहांके जीवसनातन पार्षद बने रहैहैं औ साहब
औ साहबको लोक सनातन बनो रहैहैं परंतु उहांके पार्षदजीव और उहांकी
सब बस्तु साहबहीके रूपहै औ सब चिन्मयहै सो वेद कहैहैं ॥ श्लोक॥ “सच्चि-
दानन्दो भगवान् सच्चिदानन्दात्मिकास्यव्यक्तिः॥”औ वह अयोध्या नगरी ब्रह्मके
परैहै ब्रह्म वाको प्रकाशहै औ रघुनाथजी के समीप के जे पार्षद हैं ते साहबकें
स्वरूपहैं तामें प्रमाण ॥ “ अयोध्यापरंब्रह्म सरयू सगुणःपुमान् ॥ तन्निवासी-
जगन्नाथः सत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ १॥ अयोध्यानगरीनित्यासच्चिदानन्दरूपिणी ॥
आदिमंगल । ( ५ )
यदंशांशेनगोलोकः वैकुण्ठस्थःप्रतिष्ठितः ॥ २ ॥” इति वसिष्ठसंहितायाम् ॥
‘‘ देवानांपूरयोध्या तस्यांहिरण्मयः कोशः स्वर्गेलोकोज्योतिषावृतः ’’ इतिश्रुतेः॥
सो इहां कहैंहैं कि प्रथमतौ समर्थ साहब वह लोक में आपही आपहै दूजा कोई
नहीं रह्यो दूजा जो रह्यो सो तौ साहबके लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें रह्योहै
सो कबीरजीते धर्मदास कहे हैं कि हे गुरुजी मैं तुमसे पूछौंहौं कि साहबकें
लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें जो समष्टि जीव वह दूजारह्यो सो केहिविधितें
उपज्यो संसारी भयो काहेतें कि साहबतो दयालुहैं जीवों को संसारते छुड़ाइदे-
इहैं जीवोंको संसारी नहीं करिदेइहैं औ वह समष्टि जीवके तब मनादिक नहीं
रहे शुद्धरह्योहै उपजिबे की सामर्थ्य नहीं रहीहै औ साहब सामर्थ्य दैके जीवोंकों
संसारी करबही नकरेंगे सो दूसरा जो है समष्टिजीव सो उपजिकै व्यष्टिरूप
संसारी केहि बिधित भयो औ जीवके अपने ते उपजिबे की सामर्थ्य नहींरही
तामेंप्रमाण ॥ ‘‘ कर्तृत्वंकरणत्वंचसुभावश्चेतनाधृतिः ॥ तत्मसादादिमे
( ६ ) बीजक कबीरदास ।
प्रथम समर्थजे साहब श्रीरामचन्द्रहैं साकेत निवासी दयालु जिनके लोकके
प्रकाशमें समष्टिरूपते यह जीव है ते श्रीरामचन्द्र परमदयालु यह जीवको देखि-
कै कि कछू बस्तुकों याकों ज्ञान नहीं है जब यह जीवपर साहबकी दयाभई तब
सुरतिमात्र दैकै अपने जानिबेकों वाको समर्थ करतभये कि जब याकें सुरति-
हौयगी तब मोकोजानैगो मैं हंसस्वरूप दैकै अपनेलोक लैआउंगो । जहां मन-
मायां कालकीगतिनहींहै तहां सुखपावैगो अबैतो याको सुखको ज्ञानही नहीं है ।
यह करुणा करिकै वह समष्टिरूप जीवके घटमें सहजही सुरति को उच्चारकरत
भये कहे अंकुर करतभयें । सो साहबतो अपने जानिबेको सुरतिदियो कि मों-
कोजानै औ यह जीव वही सुरति कों पाइकै औ मनादिकन को कारण इनकें
रहंबई करै औ शुद्ध रहै दूधरहै जीव अपनी शुद्धता रूप दूधमें जगत्को कारण
बनोई रहै तामें वही सुरति को जामन दैदियो सो बिनशिगयो सो वह सुरति
पाइकै साहबकेपास तो न गयो जीव बिनशिकै इच्छादिक जे सात तिनको
बिस्तार करत भयो । औ यह चैतन्य जीवको सुरति दैकै साहब चैतन्य करैहै ।
साहब चैतन्यो को चैतन्यहै तामें प्रमाण श्लोक॥ “नित्योनित्यञ्चेतनश्चेतनानां।
द्रव्यंकर्मचकालश्चस्वभावोजीव एवच।यदनुग्रहतःसंतिनसंति यदुपेक्षया इति भाग-
वते॥”औ इच्छादिकन को कौन सात.बिस्तार करतभयो सो आगेकहैहैं ॥३॥
दोहा- दूजेघटइच्छाभई, चितमन सातौकीन्ह ॥
सातरूपनि रमाइया, अबिगतकाहुनचीन्ह ॥ ४ ॥
जब याकों साहब सुरति दीन तब जीवके जगत को कारणमें रामाज्ञान
बनोईरहै तेहिते सुरति साहबमें न लगायो जगत् मुख लगायो । जब सुरति
जगत् मुखलाग्यो तबप्रथम जगत्को कारण पुष्टभयो विनशिगयो तेहिते दूसर
इच्छा रूप अंकुरभयो तीसर चित्तभयो चौथमनभयो पांचौंबुद्धिभई छठौं अहंकार
भयो सातौं अहंब्रह्म कहेअनुभवते भयोजो ब्रह्म ताकोमान्यो कि मैंहींब्रह्महौं सों
शुद्धते अशुद्ध ह्वैकै सातबिस्तार करिकै समष्टिरूपजो जीव सो अहंब्रह्मास्मिमान्ये
तब याको अनुभव ब्रह्ममाया सबलित भयो, ताहीद्वारा जगत् उत्पन्न भयों,
ताहीद्वारा यहंजीवौ उत्पन्नभयो अर्थात् समष्टिरूप जीवको अनुमान जो ब्रह्म सों
आदिमंगल । (७)
इच्छा कियो एकते अनेकहोऊं सो वा अनुमान ब्रह्मसमष्टिजीवकोहै यहिहेतु तें
वहसमष्टिजीव एकतेअनेकहैगयो । औ फिरि वहसमष्टिरूपजीवको जो अनुमान
ब्रह्मसो बिचार्यो कि ई जे अशुद्धरूपजीवात्मा तिनमें प्रवेश कैकै नामरूपकरों
याही अर्थमें प्रमाणश्लोक ॥ “सदैवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं तदैक्षतबहुस्यां
अनेनजीवेनात्मनानुप्रविश्यनामरूपेव्याकरवाणित्यादिश्रुतयः॥” जो कहो वा सत्
ब्रह्मजीवको अनुमानकैसेकहौहौं ब्रह्महीसभयो ऐसोकाहेनहींकहौतौ ॥ “यतो
वाचोनिवर्त्तन्तेअप्राप्यमनसासहं ॥” इत्यादिक श्रुतिनकरिकैमनबचनकेपरेहैं सत्-
नाम कहनोवामें नहीं संभवितहै काहेते वो निर्विकारहै सविकार हैकै एकतें
अनेक हैजैबो नहीं सम्भवै या हेतुते यह समष्टि जीवही अपनो अनुमान रूप
धोखा ब्रह्मठाटकैकै माया सबलित हैकै तद् द्वारा जगत् उत्पन्नकैकै तद्द्वारा
आपों उत्पन्नहैके समष्टिते व्यष्टिहैगये । अविगति समर्थ जे साहब हैं
तिनको ना चीन्हत भये । यह संक्षेप सूक्ष्मरीतिते जो उत्पत्ति भई सो कहिदियो।
औ जब जीव साहब के जानिबे को समर्थ भयो तब जैसी उत्पत्ति भई है सो
कहैंहैं साहब जो सुरति दियो सोतौ अपने में लगायबेको दियो यह संसार में
लगायो परंतु जो संसारते खैंचिकै अजहूं सुरति सम्हारै साहब मेलगावै तो साहब
के हजूर आठौपहर बनोरहै अर्थात् साहबै सर्वत्र देखैपरै संसारदेखिही ना परै
तामें प्रमाण कबीर जी को साखी ॥ सुरति फँसी संसार में, तेहिसे परिगा-
दूर सुरति बांधि स्थिर करै, आठौपहर हजूर ॥ १ ॥ आगे जौनीतरह ते उत्प-
त्ति भई साहबको त्यागि संसारीभयो सुरति पाय काजकरिबेको समर्थभयो
तबहूं साहब सारशब्दको उपदेश दियोहै ताको साहबमुख अर्थ ना समुझिकै
संसारमुख अर्थ समुझिकै ब्रह्मकी कल्पना कैकै संसार को उत्पन्न कैकै संसारी
भयो है यह जीव सो आगे कहैंहैं ॥ ४ ॥
दोहा—तब समरथके श्रवणते, मूल सुरति भइसार ॥
शब्द कला ताते भई, पांच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
साहब को दियो सुरति पाइकै समरथ भयो जो समष्टि जीव ताके श्रवण
में मूलसुरति जो साहब अपने जानिबे को दियो है सो सार भई कहे रामनाम
( ८ ) बीजक कबीरदास ।
रूपते प्रकटभई साररामनामको कहैहैं तामेंप्रमाणसाखी कबीरजीकी ॥ रामैना-
मअहैनिजसारू । औसबझूठसकलसंसारू ॥ १ ॥ साहब जो सुरति दियोहै सो वह
सुरतिके चैतन्यताते नामसुन्यो अर्थात् साहबजो याको गोहरायो कि रामनाम-
को जपिकै विचारिकै मोकोजानो तो मैं हंसस्वरूप दैके अपने पास बुलाइलेउँ
सो सुनिकै रामनाममें जगत् मुख अर्थ है ताको ग्रहण कियो औ शब्दमें लगाइ
दियो । वही राम नाम लैके शब्दरुप बाणी उचरीहै सो कबीर जीकी रमैनी
में आगे लिख्योहै ॥ “ रामनामलै उचरी बाणी ” ॥ औ वही रामनाम
ते शब्द कलाबाणी होतभई सो पांच ब्रह्म के अनुहार हैं । पांच ब्रह्म कौनहैं ते
कहै हैं सोहं, ररंकार, ओंकार, अकार, पराशक्तिरूप र परम श्री कबीर
जी के भेदसारग्रन्थ को प्रमाण ॥ “ प्रथम शब्द सोहं जो कीन्हा । सबघट
माहीं ताकर चीन्हा ॥ ररंकार यक शब्द उचारी । ब्रह्मा विष्णु जपैं त्रिपुरा-
री ॥ ओंकार शब्द जो भयऊ । तिनसबही रचना करिलयऊ ॥ शब्दस्वरूप
निरंजन जाना । जिनयह कियो सकलबंधाना ॥ शब्दस्वरूपी शक्ति सो बोले ।
पुरुष अडोल न कबहुं बोले ॥ ५ ॥
दोहा-पांचौ पांचै अंडधरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइइच्छा तहँगुप्तहैं, सो सुकृतचितचीन्ह ॥ ६ ॥
ते पचहुंनको पांचअंडकहे पांचस्वरूप बनाइकै एकएकस्वरूपमें एक एक
अक्षर राखत भये औ दुइ इच्छाजे प्रथमकहिआयेहैं एक वह इच्छा कारणरूपा
जब साहब सुरति दियो है तब जो रहीहै साहब मुख- नहीं होनदिया याको
बिनशिकै जगत् मुख कियो औ दूसरी वह सुरति पाइकै जगत्मुख होइकै
अपने अनुभव ब्रह्मको खड़ाकियो वह ब्रह्म मायासबलित हैगई तौन माया
आदिशक्ति गायत्रीरूपा इच्छा । सो ये दोनों इच्छा पचहुंनमें गुप्तहै सो कबीर-
जी कहैहैं कि हे सुकृतचित्तमें चीन्हों मैं वर्णन करौहा बिचारिकै देखो ये पच-
हुंनमेंदोनों इच्छाहैं कि नहीं ? ये सिगरेब्रह्म जे सारशब्द के जगतमुख अर्थ
ते भये हैं ते माया सबलित हैं कि नहीं ? तुम चीन्हों सो आगे कहै हैं ॥ ६ ॥
आदिमंगल। (९)
दोहा-योग मया यकु कारनो, ऊजो अक्षर कीन्ह ॥
या अविगति समरथकरी, ताहि गुप्त करि दीन्ह॥७॥
कारण रूप सुरति औ योगमाया गायत्री ये जे दुइइच्छा हैं ते वे पांचों ब्र-
ह्माको करती भई सो सर्वत्र तो यह सुनै हैं कि ब्रह्मते सब होइ है औ यहांइन-
ते ब्रह्म होईहै पांचौ, यह बड़ो आश्चर्य है। यह अबिगति समर्थ जे परमपुरुष
श्री रामचन्द्र हैं ते जब सुरति दियो है तब ये सब भये हैं । तिनको गुप्त करि
दियो अर्थात् इन्हीं पांचौ ब्रह्ममें औ जीवमें नामको अर्थ लगाय दियो है तें
पचहुनको बतावैहै ॥ ७ ॥
दोहा-श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हों संत सुजान ॥ ८ ॥
यह सोहंशब्द वह परम पुरुष जो है समष्टिजीव ताके श्वासाते उपज्यो
सोई बतावैहै कि, "सोहं कहे सः अहं सो जौह अनुभवगम्यब्रह्मसो मैंहौं" औ
वही आदिपुरुष समष्टि जीव श्वासा ते अमीबंधन करतभयो कि इनकी मिठाई
पाइकै लोग लोभायजायँ कौन अमी बंधान करत भयो वही श्वासाते आठअंश बना-
वतभये, कहेआठौ सिद्धि निकासतभये आठौ सिद्धिकेनाम ॥ "अणिमामहिमा
चैव गरिमालघिमातथा । प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वंवशित्वंचाष्टसिद्धयः ॥"
अथवाआठअंश निरमाइया कहे आठ प्रधान ईश्वर प्रकटकियो तेई परम पुरुष
समष्टि जीवके मंत्रीभये। तामेंप्रमाण महातंत्रमें महादेवको बाक्य ॥ "काली-
च्चकौशिकीविष्णुः सूर्योहेंगणनायकः" ॥ "ब्रह्माचभैरक्योबई छबराइति कीर्ति-
ताः १ यह प्रमाण शतानन्दभाष्य में विस्तार कैकैहै सो हेसंतसुजानौ तुम
चीन्हत जाउ वह जोसार शब्द रामनामहै सो साहब समष्टि जीव पुरुषको
बतायो सो सुंन्यो औ साहबको न जान्यो धोखाब्रह्मरूप आपहैकै वाको औरई
जगद्रूप अर्थ निकालिलियो । औ वह जो सोहं शब्द प्रकटभयो सो संकर्षणहै
काहेते कि, सोहंशब्द जीवमें घटित होईहै कि, वह जीव जौहै सोई बिचारकरै
है कि, सो जौहै ब्रह्म सो अहंकहे महीं हैं एक और दूसरो कोई नहीं है।
( १० ) बीजक कबीरदास ।
सो उन्हीं को आदिपुरुष औ बिराट् औ हिरण्यगर्भ कहैहैं औ सहस्रशीर्षापुरुष
कहैहैं । औ ई समष्टिरूपजीव पुरुषहै सोवही समष्टिरूपते संकर्षण स्थूलरूप
धारणकारिकै प्रकट भयो । “सबको आकर्षण करिकै एकह्वैरहै ताकोसंकर्षण-
कही समष्टि जीव” काहेते महाप्रलयमें जबजीव समष्टिजीवमें रहे हैं औव्यंजन
मकार पचीसौंबर्णहैं सोजीव बाचकहै ताको अर्थ समष्टिजीवरूप संकर्षण समुझ्यो
औ रामनामकी जो मकार है सोतौ बर्णातीतहै पचीसौ वर्ण नहीं है । रामनामके
व्यंजन मकार में संकर्षणके अंशी जे हैं लक्ष्मण तिनको अर्थ न समुझ्यो
वहांपांच ब्रह्म कहि आयें हैं सो इहां एकब्रह्मकी औ रामनामके एकमात्रराकी
प्राकट्य भई ॥ ८ ॥
दोहा-तेजअण्ड आचिन्त्यका, दीन्होसकलपसार ॥
अण्डशिखापर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
अचिन्त्यजो है रामनाम ताकोतेज अंडजोहै रामनामको रेफ तौने रेफकों
अर्थलैकै सर्वत्र पसराइ दियो अर्थात् रेफ अर्धमात्रा को अर्थ पराआद्याशक्ति
ब्रह्मस्वरूपासमुझ्यो सोसब जगत्मेंपसराइदियो वहीमाया ते संपूर्ण जगत् होतं
भयो सो वह पराआद्या शक्ति अंडजोहै ब्रह्मांड ताकी शिखापर बैठिकै अधरदीप
कहे नीचे के ब्रह्मांडनको निरधारकहे प्रकाशकारिकै निर्माण करत भई सो
वहीको योगीलोग ब्रह्मांडमें प्राण चढाइकै वही ब्रह्म ज्योति को ध्यानकरैं हैं
औ वही ज्योति में जीवको मिलावैहैं । औ रेफ पद वाच्य ते श्री जानकी जी हैं
सो अर्थ न समुझ्यो इहां दूसरे ब्रह्मकी प्राकट्य भई ॥ ६ ॥
दोहा-ते अचिन्त्यके प्रेमते, उपज्यो अक्षर सार ॥
चारिअंशनिरमाइया, चारिवेदविस्तार ॥ १० ॥
तौन जो अचिन्त्यरामनाम ताकेप्रेमते कहे जब वामें प्रेमकियो कि याको समुझै कहा
है तब रामनाममें जो है रकार तेहिमें जोहै लघुअकार तौनेके शक्तिहू अक्षर सार जो है,
रामनामसो प्रणवरूपते प्रकटहोतभयो ताहीको शब्दब्रह्मरूप करिकै समुझतभयें
तौनेप्रणवकीचारि मात्राहै आकार उकार मकार बिंदुते एकएक मात्रा ते एकएक
आदिमंगल । ( ११ )
वेदभये सो चारि वेदहोत भये औ सबते परे जे श्रीरामचन्द्रहैं रकारार्थ तिनको
न समुझतभये सो याहीमें एकाक्षरौ ब्रह्मकी औ शब्दहू ब्रह्मकी प्राकट्यभई सो
इहां तीसरे ब्रह्मकी प्राकट्यभई १ वहांरकारके अकार को अर्थकरिआयो यहांर-
कारार्थ श्रीरामचन्द्रको कहौहै यहकैसे सोरेफवाच्यते जानकी सो श्रीरामचंद्रते
बिलग नहीं होयहै याही अभिप्रायते लघुरकारकी जो अकार तौनेके रेफतेसहितैं
कह्यौहै रकारवाच्य श्रीरामचन्द्र को लिख्यो याही प्रमाणके अनुरोधतें वोहू
रकारवाच्य श्रीरामचंद्रको लिखिदियो सीताराम बिलग नहींहोयहैं तामें प्रमाण॥
“ अनन्याराघवेणाहं भास्करेण प्रभायथा” वा जानकीको बचनहै ॥ “अनन्याहिं
मयासीताभास्करस्यप्रभायथा॥” ये श्रीराम के बचन हैं याही अभिप्राय ते कबीरजी
जानकी को बर्णन नहींकियो श्रीरामहीके बणन ते जानकी आईगई काहेतें
सीताराम में अभेद है तामें प्रमाण ॥ “रामःसीताजानकीरामचंद्रो नित्याखंडो-
येचपश्यंतिधीराः इतिश्रुतिः” ॥ १० ॥
दोहा-तव अक्षरका दीनिया, नींद मोहअलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
तब योगमाया, अक्षर कहे जो एकाक्षर ब्रह्म प्रणव तत्प्रतिपाद्य जो ईश्वर
प्रकट भयो जो जीव, ताको नींद मोह आलस्य देंत भई । औ प्रणव औ वेदनतें
पृथिवी अप तेज वायु आकाशादिक सब जगत् प्रकट भयो । औ ताही प्रणव वेद
नते सब जीवनके नामरूप शुभाशुभ कर्मादिक सब बस्तु प्रकट भई अर्थात् वेदही
में सब वर्णित है औ सब के नाम रूप वेदही ते निकसे हैं सो प्रणव रकारही
ते प्रकट भयोहै औ सब अक्षर प्रकट भयेंहैं ताही ते सब वेद भये हैं याहीं
हेतु ते प्रणव औ वेदहू अविगति समर्थ जे श्री रामचन्द्रहैं तिनकी महिमा
करीकहे कही । जो वेद तात्पर्य करि कै बतौवैंहैं तौनेको मर्म कोई न जानत
भयो औ प्रणव तात्पर्य करिकै श्रीरामचन्द्रही को कहैं हैं सो अर्थ तापिनिका
प्रमाण दै कै लिख्यो है सो मेरे रहस्यत्रय ग्रन्थ में है सो प्रणवअक्षर वेद सब
रामनामही ते निकसे हैं सो मेरे मन्त्रार्थमें प्रकटहै ॥ ११ ॥
( १२ ) बीजक कबीरदास ।
दोहा-जबअक्षरकेंनींदगई, दबीसुरतिनिर्वान ॥
श्यामवरणयकअण्डहै, सोजलमेंउतरान ॥ १२ ॥
योगमाया में सोय रहे अक्षर कहे नाशरहित जे नारायण तिनकों जब
योगमाया जगायो नींद गई तब उनको निर्वाण सुरति देत भई । काहेते
ई जे हैं नारायण तिनको निर्वाण रूप कहे निराकार रूप कैकै अंतर्यामी
रूपते सबके भीतरदबाइ देत भई अर्थात् चेष्टारहित दिव्यगुणविशिष्ट सर्व्वत्र-
व्यापक अंतर्यामी तत्त्वरूप जे निर्वाण नारायण तिनको सबके अन्तर दबाइ
देत भई कहे सबके अन्तर्यामी करि देत भई तेई प्रकट होतभये । श्यामवर्ण
अण्ड कहे चतुर्भुज रूप धारण करिकै जल में उतरान कहे जल में रहतभये । सो
इनके शरीरमें शरीर जे हैं निराकार नारायण तिनको नित्य सम्बन्ध होतभयो ।
सो रकारमें जोहै अकार ताको नारायण अर्थ करत भये औ भरतबाची जो
है अकार सो अर्थ न समुझत भयें यहां चौथे ब्रह्म की प्राकथ्य भई ॥ १२ ॥
दोहा-अक्षरघटमेंऊपजै, व्याकुलसंशयशूल ॥
किनअण्डानिरमाइया, कहाअण्डकामूल ॥१३॥
अक्षर जे नारायण हैं तिनके घटते ऊपजे अर्थात् तिनकी नाभि में कमल
होइ है तेहिते ब्रह्मा होइहै ते ब्रह्मा सब जगत् करै हैं तब समष्टि जीव शुद्ध तें
अशुद्ध है कै ब्रह्मा ते उत्पन्न हैकै बहुत शरीरधारण करैहैं ते ब्रह्म जब उत्प-
न्नभये तब ब्याकुलभये औ संशय करतभये कि कहां अण्डका मूलहै औ को
अंडाको बनायो है औ हम कहांते उत्पन्नभये हैं सो खोज्यो खोजे ना पायो
तब तपस्या करत भयो तब नारायण प्रकटभये ते ब्रह्मा ते कह्यो कि तुम
जगत् की उत्पत्ति करौ यहकथा पुराण में प्रसिद्धहै ॥ १३ ॥
दोहा-तेही अण्डके मुख पर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षरदृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़िबाप ॥ १४ ॥
तैने ब्रह्मरूपी अण्डके मुखपर शब्दकी छाप लगी अर्थात् शब्द ब्रह्म जो
वेदसार ताको नारायण बताय दियो । तौने को ब्रह्म जपत भये तब वाहीतें
आदिमंगल। ( १३ )
प्रकटे जे चारोंवेद ते ब्रह्मा के चारिउ मुखतें निकसतभये। तौने वेदनकों अक्षर
जो समष्टि जीव है सो जगतमुख दृष्टि कियो अर्थात् जगत्मुख अर्थ देख्यो
तब द्वारे ह्वैकै “ वह मायाते सबलित जो है ब्रह्म जाको आगे बाप कहि आये
हैं जों शुद्धतें अशुद्ध जीवन को कैकै उत्पन्न करै है ” सो दश द्वारेते कहे
दशौ इन्द्रिनतें कढ़त भये। तब इन्द्रिन के विषय ह्वैकै इन्द्री ह्वैकै चिदंश ह्वैकै
चिदचिदात्मक जगत् होत भयो अर्थात् वेदन को अर्थ जब जगतमुख देख्यो तब
वह जीव चिदचिदात्मक जगत्को धोखा ब्रह्मही देखत भयो । सो जगत् तौ
साहब के लोक प्रकाश को शरीरहै, तौने को वेदार्थ करिकै धोखा ब्रह्मही
देखत भयो यही धोखा है तात्पर्य कैकै वेद जो साहब को कहै है ताको न जानत
भये। लघु रकार की अकार ते नारायण भये तिनते ब्रह्मा की उत्पत्ति भई
सो कहि आये। अरु बहि ते जेतो जगत् के उत्पन्न को प्रयोजन रह्यो सो
कहि गये । अब फेरि सिंहावलोकन करिकै पंचम ब्रह्म की प्राकट्य कहैहैं ॥ १४॥
दोहा—तेहिते ज्योति निरंजन, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरबल बीरभा, तीन लोक परधान॥१५॥
तेहिते कहे वही रामनामतें व्यञ्जन मकारको जो अर्थकरि आये हैं तामें
जो अकार रही है ताको महाविष्णु अर्थ करतभये। जे विरजा के पार पर
बैकुण्ठ में रहे हैं। जिनके अंशते रमा बैकुण्ठवासी भगवान् भये हैं । सो
अंजन जो अविद्या माया ताते वे रहित हैं काहेते कि, अविद्या माया विरजा-
के यही पार भर बनतहै। पै पुराणादिक में सो व्यञ्जन मकार की अकार-
को महाविष्णु अर्थ करत भये, औ वह अकार शत्रुघ्नबाचक है सो अर्थ न स-
मुझत भये। ते अकाररूप महाविष्णु ते महाकाल अपरबल बीरभा कहे जे-
हिते प्रबल बीर कोई नहीं है अथवा अकार जे विष्णुहैं तेई हैं परमबल जि-
नके सो तीनलोक में प्रधान होत भयो । इहाँपाँचों ब्रह्मकी प्राकट्य
ह्वैगई ॥ १५ ॥
दोहा—ताते तीनों देवभे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया,मायाके उपदेश॥१६॥
( १४ ) बीजक कबीरदास ।
तौने कालते कहे वही कालमें काल पाइकै एकएक ब्रह्माण्डमें तीनतीन
देवता ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्नहोतभये सो कोटिन ब्रह्माण्डनमें कोटिन ब्रह्मा-
दिक भये तैं माया के उपदेश ते कहे मायाको ग्रहणकरिकै संसारमें चारि-
खानि जे जीव हैं तिन को सिरजिया कहे उत्पत्ति करतभये सो उत्पत्तिको
क्रम ब्रह्मोते पहिले कहिआये हैं ॥ १६ ॥
दोहा-चारिवेद षट्शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशा दै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान॥ १७॥
चारोंवेद, छवोंशास्त्र औ अठारहौ पुराणमें मायाजो है सो औरई और
फलकी आशा बताइकै औरई और नाना मतन में लगाइदियो और संपूर्ण
जगत् मुख अर्थकरिकै जगत्को बांधिलियों । साहबको भुलाय दियो ये सब
तात्पर्य कैकै साहबको कहैहैं सोसाहबकों न जानन पाये । ताते तीनों लोकके
जीव भुलायगये ॥ १७ ॥
दोहा-लखचौरासी धारमा, तहां जीव दियवास ॥
चौदह यम रखवारी, चारिवेद विश्वास ॥ १८ ॥
चौरासीलाख जो योनिहैं सोईहैं धारा ताहीमें जीवको बास देतभये
कहेवही चौरासीलाख योनिरूपी धारामें सबजीव बहे जाइहैं अर्थात्
नानारूप धारण करैहैं सो चारिवेदके विश्वासते कहे चारिवेदके मतते
नानामतहोतभये ॥ “ शतिलेत्वंजगन्माता शतिलेत्वंजगत्पिता ॥ ” इत्यादिक
नानादेवतनकी उपासनागुरुवालोग बतावत भये । वेद जो तात्पर्य्यकरिकै बतावै
है साहब को सो अर्थ न जानतभैये। औ चौदह यम जीवकी रखवारी करत भये
यहजीव निकसिकै साहबके पास न जानपाये। चौदह यमके नाममें प्रमाण ज्ञान-
सागरको॥ दुर्गदचित्रगुप्तबरियारा । ईतोयमके हैं सरदारा ॥ मनसा मल्लअपरबल
मोहा। कामसैनमकरन्दी सोहा॥चितचंचल औ अंधअचेता। मृतकअंधजोजीतेखेता ॥
सूर सिंह औरो क्रमरेखा । भावीतेजकालकापेखा ॥ अघनिद्रा औ क्रोधितअंधा ।
जेहिमाजीवजंतुसबबंधा ॥ परमेश्वर परबल धर्मराजा । पाप पुण्यसबते अळछा-
जा ॥ यह सब यमै निरंजनकीन्हा । लिखनीकागदरचिकै दीन्हा ॥ १ ॥ ”
आदिमंगल । ( १६ )
अर्थ-“प्रथम दुर्गंद कहैं हैं दुर्गकहावै कि जो कोई पुण्यकरैहै ताको स्वर्गदैके
पुण्यभोग करावैहै औ जो पापकरैहै तिनको नरकनमें पापको भुगताइकै किला-
रूपी जो है शरीर सो जीवकोदेयहै याते दुर्गद यम एक १ औ दूसर चित्रगुप्त
जे कर्मनके लेखाकरैहैं २ तीसर मलिनमन ३ औ चौथ मोह ४ औपांचौ काम काल-
की सेनाका मकरन्दीकहे बसंतते सहित ५ औछठौ अंधअचेत जोहै चित्त सो
६ औ सातौ मृत्यु भई जोखेतको जीतहै कहैसबको मारैहै ७ औ आठौंसूरकहे
अंधा अर्थात् अशुभकर्मकी रेखा ८ औ नवौ सिंहकहे समर्थ शुभकर्मकी रेखा ९
औ दशौ यमभावी जो कालको पेखाहै कहे जो कर्म होनहारहै सो काल करिकै
होइहै अर्थात् कालकी अपेक्षा राखैहै १० औ ग्यारहौ अघकहे पापरूपनिद्रा ११
औबारहौ अंधको देनवारो क्रोध जामें सबजीव जंतु बंधेहैं १२ तेरहौ प्रबल परमेश्वर
रमाबैकु
( १६ ) बीजक कबीरदास ।
रामनाममें छामात्रा है तामें प्रमाण ॥ रामनाममहाविन्ध्ये षड्भिर्वस्तुभिरावृत-
म् ॥ जीवब्रह्ममहानद्यैस्त्रिभिरन्यंवदामितं ॥ स्वरेणार्धमात्रेणदिव्ययामाययापिच
॥ इतिमहारामायणे ॥ और रामनामको जो अर्थ भूलिगये हैं तामें प्रमाण
सब मुनिन को भ्रमभयो श्रुतिनको प्रमाणदै कोई कहै हमारोमत ठीक है
कोई कहै हमारो मत ठीक है । तब सब मुनि वेदन ते पूछयो जाइ । वेदहू
विचारेउ कि सबमें तौ हमारही प्रमाण मिलैहै सोवेदहूको भ्रमभयो । तब
सबमुनि औ वेद ब्रह्माके पासगये । तबब्रह्मा ते पूंछयो तब ब्रह्मौके भ्रमभयों
कि, साँच मत साँच साहब कौन है । सो महादेवजी पार्वती जी ते कहै हैं
कि, तब सबकोई साहब श्रीरामचन्द्रको ध्यान कियो तब साहब कह्यो कि
यह बात सबके आचार्य जे संकर्षण है ते जानैहैं तिनके पास सबको पैठे
देहुवे समझाय देयँगे । तब ब्रह्मा की आज्ञाते सब संकर्षण रूप
शेषके इहांगये सो वेद उहां पूंछयो, संकर्षण ते, तब संकर्षण जी एक सि-
द्धांत जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनको बतायो है राम नाम को यथार्थ अर्थ
तौन सदाशिवसंहिता के ये श्लोक हैं ॥
“ रामनाम्नोऽथमुख्योऽथभगवत्स्वेतप्रतिष्ठितम् ॥ विस्मृतंकंठमणिवद्वेदाश्रृणुततत्त्व
तः १ तात्पर्य्यवृत्त्याविज्ञेय बोधयामिविभागः ॥ रामनाम्निशुचिर्ज्ञेयाः षण्मात्रांत
त्त्वबोधकाः २ रामनाम्निस्थितोरेफो जानकीतेनकथ्यते ॥ रकारेणतुविज्ञेयः श्रीरामः
पुरुषोत्तमः ३ आकारेणतथाज्ञेयोभरतोविश्वपालकः ॥ व्यंजनेनमकारेण लक्ष्मणो
ऽत्रनिगद्यते ४ ह्रस्वाकारेणनिगमाःशत्रुघ्नःसमुदाहृतः ॥ मकारार्थोद्विधाज्ञेयःसानु-
नासिकभेदतः ५ प्रोच्यतेतेनहंसौवैजीवाश्चैतन्यावग्रहाः ॥ संसारसागरोत्तीर्णापुनरावृ
त्तिवर्जिताः ६ दास्याधिकारिणःसर्वेश्रीरामस्यमहात्मनः ॥ एतत्तात्पर्यमुख्यार्थाद-
न्यार्थोयोनभूपते ७ सोऽनर्थइतिविज्ञेयःसंसारप्राप्तिहेतुकः ॥ इतिसदाशिवसंहितायां-
विंशाध्यायेवेदान्प्रतिशेषवचनम् ॥ सो जौननाम साहब बतायो ताके औरई औ-
रअर्थकरिकै जीव संसारीहैगयेसाहबकोनजान्यो ॥ १९ ॥
दोहा—तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्द के हेत ॥
आदिअन्तकीउतपति, सोतुमसोंकहिदेत ॥ २० ॥
आदिमंगल ! ( १७ )
इहां कबीर जी, कहै हैं कि तेहिंपीछे कहे जब संसारकी उत्पत्ति हैगई औ
जीव नाना दुःख पावन लगे तब साहिब जे दयालुहैं तिनके दयाभई कि हमतें
अपने नामको उपदेशकियो कि हमारे रामनाम को जो यह अर्थ लक्षमण जान-
की हम भरत शत्रुघ्न हमारे हंसरूप पार्षद तिनको जानिकै हमारेपास आवै औयें
सबजीव संकर्षण आद्यापराशक्ति शब्दब्रह्म नारायण महाविष्णु जीव इनके पक्षमें
रामनामकी छवोमात्रा लगाइकै औरे औरे मतनमें लगिके संसारी है कै
नानादुःख पावन लगे । तब रामनाम को यथार्थ अर्थ बतावनको हमको भेज्यो
सो हम सारशब्द जो है रामनाम ताको सत्यकहे सांच जो अर्थहै ताके बताव-
नके हेतु आये सो आदि अंतकी उत्पत्ति हम तुमसे कहे देयहैं । आदिकौन
है जोयह उत्पत्ति है आई संसारभयो औअंतकौन है जो हम रामनामको सांच-
अर्थ बतायो सो अर्थ समुझिलेइ साहबके पासजाय वाको संसारको अंत हेजाइ
है । फिरि संसारमें नहीं आवैहै । सो यह आदिअंतकी उत्पत्ति हमतुम सों
कहिदियो किं यहिभांतिते जगत्की उत्पत्ति होयहै जीवसंसारी होइहैं औयहि
भांतिते जब रामनामको सांचअर्थ जानै है तब संसारको अंत है जाइहै ॥२०॥
दोहा-सात सुरति सब मूलहै, प्रलयहु इनहीं माहिं ॥
इनहीं मासे ऊपजै, इनहीं माहिं समाहिं ॥ २१ ॥
इहांमंगलको उपसंहारकरैहै सबकीमूल सातसुरतिजे प्रथम वर्णन करि आयेहैं
सो वेतो सोई सुरति स्थूलरूप सात रूपते प्रकटभईहै सातकौनहै; दुइच्छा एक-
योगमाया एकजगत्को अंकुरकारणरूपा औ पांचौंब्रह्मरूपा येई सातौसबकेमूलहैं
इनहीँते उपजैँहैं इनहीं ते प्रलय हैजायहै कहे नाशह्वैहै जायहै औ इनहींमें पुनि-
समाइहै सातो सूरतिमें प्रमाण साखी शंकरगुष्टकी ॥ “निरंजनअक्षर अचित
दोहंसोहंजान ॥ औपुनिमूलअँकूरकहि सात सूरति परमान” ॥ २१ ॥
दोहा-सोई ख्याल समरथ कर, रहेसो अछप छपाइ ॥
सोई संधिलै आयउ, सोवत जगहि जगाइ ॥ २२ ॥
सो समष्टिजीव अपनेको समर्थ मानिकै साहबको न जानि कै यह ख्याल
करतभयो अछपकहे रामनामके अर्थमें साहब न छपे रहे औ संर्वत्र पूर्णरहे सा-
( १८ ) बीजक कबीरदास ।
हबके सब सामग्री साहबको लोक साहिबैको रूपवर्णन करि आये हैं । जो साहब-
के लोकको प्रकाश सर्वत्र पूर्णरहा तैसाहब पूर्णईरहे सर्वत्र सो जीव
रामनाम को और और अर्थ करिकै और और मतनमें लग्यो तेहिते साहब
छपायगये साहबको जीव न जानतभये । सो तौनै संधिलेकै मैं आयों कि
जीवते "संधि कहे बीच" परिगयो है, रामनाम को सांच अर्थ भूलिगयो
सो जौने संसारमें यह सोवै है तौनी जगह में आयो कि मैं याको सोवत ते
जगाय देहुं कि, जौने २ मतनमें तुम लगेहौ सो रामनाम को अर्थ नहीं है,
ये संसारके देनवारे हैं, तुम संसारी ह्वैगये, सब स्वप्न देखौ हौ, वह अर्थ नाम
को मिथ्या है, तुम जागिकै रामनामार्थ जे साहब हैं तिनको जानौ ॥ २२ ॥
दोहा-सात मूरतिके बाहिरे, सोरह संख्यके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसनकेर अधार ॥ २३ ॥
साहब कैसेंहैं कि सात सूरति जे कहियाये तिनके बाहिरहैं औ षोड़शकला
जीवको छान्दोग्य उपनिषदमें तत्वमसिके पूर्व्वलिख्योहै सोइहां कहै हैं कि
सोरहसंख्यके कहे सोरहसंख्यक जे जीवहैं अर्थात् षोड़शकलात्मक जे समष्टि
जीव जे लोकके प्रकाशमें रहैं हैं शुद्धरूप तिन के साहब पार हैं सो जहां
सोरह संख्यकहे षोड़शकलात्मक जीवहै तिनके पार वह लोक साहब कौहै
तहां समर्थ जे साहबहैं तिनको बैठकाहै कहे वहीलोक में रहैहैं । समर्थ जो
कह्यो सो समर्थ साहिबही हैं जीव समर्थ नहीं है उन्हींके किये जीव समर्थ
होइहै यह आपको झूठही समर्थ मानिलियो है याही हेतुंते जीव संसारी भयो
है । सो हंसन के आधार तो परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीहैं तेहिते जब हंसरूप
पावै तब साहब के पास वह लोकमें बसै जाय ॥ २३ ॥
दो०-घरघर हमसबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासीधार ॥ २४ ॥
सोकबीरजी कहैहैं कि घर २ हम सब सों बातकही हमारो कह्यो सांच
शब्द को अर्थ कोई नहीं समुझैहै नासुनै है ते संसाररूपी सागरके चौरासी-
लाख योनि जो हैं धारा तामें डूबिजायहैं ॥ २४ ॥