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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

आदिमंगल। ( ३ )
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥१८॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ॥
उत्पतिपरलयदुःखसुख, फिरिआवहिंफिरिजाहिं १९
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उतपती, सो तुमसों कहिदेत ॥२०॥
सात सुरति सवमूलहै, प्रलयहु इन्हीं माहिं ॥
इन्हीं मासे ऊपजे, इन्हीं माँह समाहिं ॥२१॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाइ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ॥२२॥
सात सुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥२३॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥२४॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥२५॥
वस्तुनिर्देशात्मक मंगल ।
दोहा-प्रथमै समरथ आपरहे, दूजा रहा न कोय ॥
दूजा केहिविधि उपजा, पूंछतहौं गुरुसोय ॥१॥
कबीरजीकी वाणीके अर्थ करिवेकों मोमें सामर्थ्य नहींरही परंतु साहब यह
विचारिकै कि कबीरजीके बीजकको पाखण्ड अर्थलगाइकै जीवबिगरे जाँयहैं सो