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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

(२) बीजक कबीरदास ।
योगमया यकु कारणे, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
याअविगतिसमरथकरी, ताहिगुतकरिदीन्ह ॥ ७ ॥
श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड आंचित्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अंड शिखा पर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
ते अचिन्त के प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगै, देवी सुरति निरबान ॥
श्यामवरण यकअंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दशद्वारे कढ़ि वाप ॥ १४ ॥
तेहिते ज्योति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीनों देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारिखानितिनसिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशादै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥