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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

आदिमंगल । ( ५ )
यदंशांशेनगोलोकः वैकुण्ठस्थःप्रतिष्ठितः ॥ २ ॥” इति वसिष्ठसंहितायाम् ॥
‘‘ देवानांपूरयोध्या तस्यांहिरण्मयः कोशः स्वर्गेलोकोज्योतिषावृतः ’’ इतिश्रुतेः॥
सो इहां कहैंहैं कि प्रथमतौ समर्थ साहब वह लोक में आपही आपहै दूजा कोई
नहीं रह्यो दूजा जो रह्यो सो तौ साहबके लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें रह्योहै
सो कबीरजीते धर्मदास कहे हैं कि हे गुरुजी मैं तुमसे पूछौंहौं कि साहबकें
लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें जो समष्टि जीव वह दूजारह्यो सो केहिविधितें
उपज्यो संसारी भयो काहेतें कि साहबतो दयालुहैं जीवों को संसारते छुड़ाइदे-
इहैं जीवोंको संसारी नहीं करिदेइहैं औ वह समष्टि जीवके तब मनादिक नहीं
रहे शुद्धरह्योहै उपजिबे की सामर्थ्य नहीं रहीहै औ साहब सामर्थ्य दैके जीवोंकों
संसारी करबही नकरेंगे सो दूसरा जो है समष्टिजीव सो उपजिकै व्यष्टिरूप
संसारी केहि बिधित भयो औ जीवके अपने ते उपजिबे की सामर्थ्य नहींरही
तामेंप्रमाण ॥ ‘‘ कर्तृत्वंकरणत्वंचसुभावश्चेतनाधृतिः ॥ तत्मसादादिमे