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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 766 में से

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पृष्ठ 59

( ८ ) बीजक कबीरदास ।
रूपते प्रकटभई साररामनामको कहैहैं तामेंप्रमाणसाखी कबीरजीकी ॥ रामैना-
मअहैनिजसारू । औसबझूठसकलसंसारू ॥ १ ॥ साहब जो सुरति दियोहै सो वह
सुरतिके चैतन्यताते नामसुन्यो अर्थात् साहबजो याको गोहरायो कि रामनाम-
को जपिकै विचारिकै मोकोजानो तो मैं हंसस्वरूप दैके अपने पास बुलाइलेउँ
सो सुनिकै रामनाममें जगत् मुख अर्थ है ताको ग्रहण कियो औ शब्दमें लगाइ
दियो । वही राम नाम लैके शब्दरुप बाणी उचरीहै सो कबीर जीकी रमैनी
में आगे लिख्योहै ॥ “ रामनामलै उचरी बाणी ” ॥ औ वही रामनाम
ते शब्द कलाबाणी होतभई सो पांच ब्रह्म के अनुहार हैं । पांच ब्रह्म कौनहैं ते
कहै हैं सोहं, ररंकार, ओंकार, अकार, पराशक्तिरूप र परम श्री कबीर
जी के भेदसारग्रन्थ को प्रमाण ॥ “ प्रथम शब्द सोहं जो कीन्हा । सबघट
माहीं ताकर चीन्हा ॥ ररंकार यक शब्द उचारी । ब्रह्मा विष्णु जपैं त्रिपुरा-
री ॥ ओंकार शब्द जो भयऊ । तिनसबही रचना करिलयऊ ॥ शब्दस्वरूप
निरंजन जाना । जिनयह कियो सकलबंधाना ॥ शब्दस्वरूपी शक्ति सो बोले ।
पुरुष अडोल न कबहुं बोले ॥ ५ ॥
दोहा-पांचौ पांचै अंडधरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइइच्छा तहँगुप्तहैं, सो सुकृतचितचीन्ह ॥ ६ ॥
ते पचहुंनको पांचअंडकहे पांचस्वरूप बनाइकै एकएकस्वरूपमें एक एक
अक्षर राखत भये औ दुइ इच्छाजे प्रथमकहिआयेहैं एक वह इच्छा कारणरूपा
जब साहब सुरति दियो है तब जो रहीहै साहब मुख- नहीं होनदिया याको
बिनशिकै जगत् मुख कियो औ दूसरी वह सुरति पाइकै जगत्मुख होइकै
अपने अनुभव ब्रह्मको खड़ाकियो वह ब्रह्म मायासबलित हैगई तौन माया
आदिशक्ति गायत्रीरूपा इच्छा । सो ये दोनों इच्छा पचहुंनमें गुप्तहै सो कबीर-
जी कहैहैं कि हे सुकृतचित्तमें चीन्हों मैं वर्णन करौहा बिचारिकै देखो ये पच-
हुंनमेंदोनों इच्छाहैं कि नहीं ? ये सिगरेब्रह्म जे सारशब्द के जगतमुख अर्थ
ते भये हैं ते माया सबलित हैं कि नहीं ? तुम चीन्हों सो आगे कहै हैं ॥ ६ ॥