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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

( १० ) बीजक कबीरदास ।
सो उन्हीं को आदिपुरुष औ बिराट् औ हिरण्यगर्भ कहैहैं औ सहस्रशीर्षापुरुष
कहैहैं । औ ई समष्टिरूपजीव पुरुषहै सोवही समष्टिरूपते संकर्षण स्थूलरूप
धारणकारिकै प्रकट भयो । “सबको आकर्षण करिकै एकह्वैरहै ताकोसंकर्षण-
कही समष्टि जीव” काहेते महाप्रलयमें जबजीव समष्टिजीवमें रहे हैं औव्यंजन
मकार पचीसौंबर्णहैं सोजीव बाचकहै ताको अर्थ समष्टिजीवरूप संकर्षण समुझ्यो
औ रामनामकी जो मकार है सोतौ बर्णातीतहै पचीसौ वर्ण नहीं है । रामनामके
व्यंजन मकार में संकर्षणके अंशी जे हैं लक्ष्मण तिनको अर्थ न समुझ्यो
वहांपांच ब्रह्म कहि आयें हैं सो इहां एकब्रह्मकी औ रामनामके एकमात्रराकी
प्राकट्य भई ॥ ८ ॥
दोहा-तेजअण्ड आचिन्त्यका, दीन्होसकलपसार ॥
अण्डशिखापर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
अचिन्त्यजो है रामनाम ताकोतेज अंडजोहै रामनामको रेफ तौने रेफकों
अर्थलैकै सर्वत्र पसराइ दियो अर्थात् रेफ अर्धमात्रा को अर्थ पराआद्याशक्ति
ब्रह्मस्वरूपासमुझ्यो सोसब जगत्मेंपसराइदियो वहीमाया ते संपूर्ण जगत् होतं
भयो सो वह पराआद्या शक्ति अंडजोहै ब्रह्मांड ताकी शिखापर बैठिकै अधरदीप
कहे नीचे के ब्रह्मांडनको निरधारकहे प्रकाशकारिकै निर्माण करत भई सो
वहीको योगीलोग ब्रह्मांडमें प्राण चढाइकै वही ब्रह्म ज्योति को ध्यानकरैं हैं
औ वही ज्योति में जीवको मिलावैहैं । औ रेफ पद वाच्य ते श्री जानकी जी हैं
सो अर्थ न समुझ्यो इहां दूसरे ब्रह्मकी प्राकट्य भई ॥ ६ ॥
दोहा-ते अचिन्त्यके प्रेमते, उपज्यो अक्षर सार ॥
चारिअंशनिरमाइया, चारिवेदविस्तार ॥ १० ॥
तौन जो अचिन्त्यरामनाम ताकेप्रेमते कहे जब वामें प्रेमकियो कि याको समुझै कहा
है तब रामनाममें जो है रकार तेहिमें जोहै लघुअकार तौनेके शक्तिहू अक्षर सार जो है,
रामनामसो प्रणवरूपते प्रकटहोतभयो ताहीको शब्दब्रह्मरूप करिकै समुझतभयें
तौनेप्रणवकीचारि मात्राहै आकार उकार मकार बिंदुते एकएक मात्रा ते एकएक