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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 62

आदिमंगल । ( ११ )
वेदभये सो चारि वेदहोत भये औ सबते परे जे श्रीरामचन्द्रहैं रकारार्थ तिनको
न समुझतभये सो याहीमें एकाक्षरौ ब्रह्मकी औ शब्दहू ब्रह्मकी प्राकट्यभई सो
इहां तीसरे ब्रह्मकी प्राकट्यभई १ वहांरकारके अकार को अर्थकरिआयो यहांर-
कारार्थ श्रीरामचन्द्रको कहौहै यहकैसे सोरेफवाच्यते जानकी सो श्रीरामचंद्रते
बिलग नहीं होयहै याही अभिप्रायते लघुरकारकी जो अकार तौनेके रेफतेसहितैं
कह्यौहै रकारवाच्य श्रीरामचन्द्र को लिख्यो याही प्रमाणके अनुरोधतें वोहू
रकारवाच्य श्रीरामचंद्रको लिखिदियो सीताराम बिलग नहींहोयहैं तामें प्रमाण॥
“ अनन्याराघवेणाहं भास्करेण प्रभायथा” वा जानकीको बचनहै ॥ “अनन्याहिं
मयासीताभास्करस्यप्रभायथा॥” ये श्रीराम के बचन हैं याही अभिप्राय ते कबीरजी
जानकी को बर्णन नहींकियो श्रीरामहीके बणन ते जानकी आईगई काहेतें
सीताराम में अभेद है तामें प्रमाण ॥ “रामःसीताजानकीरामचंद्रो नित्याखंडो-
येचपश्यंतिधीराः इतिश्रुतिः” ॥ १० ॥
दोहा-तव अक्षरका दीनिया, नींद मोहअलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
तब योगमाया, अक्षर कहे जो एकाक्षर ब्रह्म प्रणव तत्प्रतिपाद्य जो ईश्वर
प्रकट भयो जो जीव, ताको नींद मोह आलस्य देंत भई । औ प्रणव औ वेदनतें
पृथिवी अप तेज वायु आकाशादिक सब जगत् प्रकट भयो । औ ताही प्रणव वेद
नते सब जीवनके नामरूप शुभाशुभ कर्मादिक सब बस्तु प्रकट भई अर्थात् वेदही
में सब वर्णित है औ सब के नाम रूप वेदही ते निकसे हैं सो प्रणव रकारही
ते प्रकट भयोहै औ सब अक्षर प्रकट भयेंहैं ताही ते सब वेद भये हैं याहीं
हेतु ते प्रणव औ वेदहू अविगति समर्थ जे श्री रामचन्द्रहैं तिनकी महिमा
करीकहे कही । जो वेद तात्पर्य करि कै बतौवैंहैं तौनेको मर्म कोई न जानत
भयो औ प्रणव तात्पर्य करिकै श्रीरामचन्द्रही को कहैं हैं सो अर्थ तापिनिका
प्रमाण दै कै लिख्यो है सो मेरे रहस्यत्रय ग्रन्थ में है सो प्रणवअक्षर वेद सब
रामनामही ते निकसे हैं सो मेरे मन्त्रार्थमें प्रकटहै ॥ ११ ॥