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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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रमैनी । ( ४७ )

बिन नहिं पावै १६४रंती ॥ अक्षर भए अनेक उपाय ॥ अक्षर
सुनि २ शून्य समाय ॥ अक्षर से भव आवै जाय ॥ अक्षर
काल सबनको खाय ॥ अक्षर सबका भाषे लेखा ॥ अक्षर
उत्पति प्रलय विशेखा ॥ अक्षरकी पावै सहिं१६५दानी ॥ कहैं क-
बीर तब उतरे प्रानी ॥ साक्षी ॥ परखावे गुरुकृपा
करि, अक्षर की सहिदानि ॥ निज बल उदथ विचारते,
तब होवे भ्रम हानि ॥ २८ ॥ रमैनी ॥ बावन के बहु बने
तरंग ॥ ताते भासत नाना रंग ॥ उपजे औ पालै अनुसरै ॥
बावन अक्षर आखिर करै ॥ राम कृष्ण दोउ लहर अपार ॥
जेहिपद गहि नर उतरै पार ॥ महादेव लोमश नहिं बांचे ॥
अक्षर त्रास सबै मुनि नाचे ॥ ब्रह्मा विष्णु नाचै
अधिकाई ॥ जाको धर्म जगत सब गाई ॥ नाँचै गण गंधर्व
मुनि देवा ॥ नाचै सनकादिक बहु भेवा ॥ अक्षर १६६त्रास सबन
को होई ॥ साधक सिद्ध बचे नहिं कोई ॥ अक्षर त्रास लखे
नहिं कोई ॥ आदि भूल बंधे सब लोई ॥ अक्षर सागर अक्षर
नाव ॥ करणधार अक्षर समुदाय ॥ अक्षर सबका भेद
बखान ॥ बिन अक्षर नहिं अक्षर जान ॥ अक्षर आसते फंदा
परे॥ अक्षर लखे ते फंदा टरे॥ गुरु शिष अक्षर लखलखावे ॥
चौराशी फंदा मुक्तावै ॥ बिनु गुरु अक्षर कौन छोडावे ॥
अक्षर जाल ते कौन बचावै ॥ संचितँ १६७ क्रिया उदय जब होय ॥
मानुष जन्म पावै तब सोय ॥ गुरुपारख बल उदय विचार ॥
परख लेहु जगत गुरुमुख सार ॥ अस्ति हंसप्रकाश अपार॥


१६४ प्रवृत्ति ॥ १६५ चिह्न, पारख, पहिचान, ॥ १६६ भय ॥
१६७ जन्मांतरोंमें संचित किया हुआ कर्म ॥