सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

साहब तो परमदयालु हैं उन कों करुणाभई तब कबीरजीको भेज्यो याकहि कै
कि आगे हम तुमको भेज्यो हतो सो तुम ग्रन्थबनाइकै बहुत जीवनको उप-
देशकरिकै उद्धार कियो सो अब तिहारे ग्रन्थको पाखंड अर्थकरिकै पाखंडी हैं
कै जीव बिगरे जायँ हैं औ बहुत बिगरिगये सो तुमनाइकै जौन अर्थ तुम बीज-
कमें राख्योहै सो अर्थ विश्वनाथ सों बनवावो जाते सो अर्थ समुझिकै जीव
हमारे पास आवैं सो कबीरजी आयकै मोसों कह्यो कि तुम बीजकको अर्थ
बनावो हम तुमको बतावेंगे सो उनके हुकुमते मैं बीजकको अर्थ बनाउं हौं
बतावने वाले श्रीकबीरहीजी हैं मोमें ताक़त नहीं है जो मैं बनायसकौं और ना-
भाजी भक्तमालमें लिख्योहै कि “कबीर कानि राखी नहीं बरणाश्रम षटदरशनी”
सो इहां कबीरजी को सिद्दात मत मैं कहौंगो औ सर्वसिद्धांतग्रंथ जो मैं बनायोहै
तामें सबको सिद्धांत यथार्थ राख्योहै सो यहां बीजकके तिलक में साहबको औ
कबीरजीको हुकुम यहीहै कि एक सिद्धांत रहै जो सबतेपरैहै और सिद्धांत सबखंडन
हैजायँ सो सबके सिद्धांतनको खण्डन करिकै एक सिद्दात मैं वर्णन करौंहौं सों
सुनिकै साहब के हुकुमी जानिकै साधुलोग पंडितलोग और और मत वाले जेहैं
ते मेरे ऊपर खफा न होयँ प्रसन्न रहैं ना समुझिपरै तौ प्रसन्नहोइकै गुरुसों पूँछि-
लेइँ अब अर्थ लिखैहैं ।
अर्थ-प्रथम समरथ जे श्रीरामचन्द्रहैं ते आपही हैं दूसरा कोई नहीं
रह्यो जो कहौ उनके लोक में तौ हंस हंसिनी सब वर्णन करैहैं उनके
पार्षद सबहैं ताको वर्णन निर्भय ज्ञानमें विस्तारते हैं सो इहां संक्षेप तें
सूचित किये देई हैं ॥ “सत्य पुरुष निर्भय निरबानां । निर्भय हंस तहँ
निर्भयज्ञाना ॥ ” इत्यादिक बहुत वर्णन निर्भयज्ञानमें कबीरजी कियोहै तुम
एकही कैसे कहौ है सो सत्यहै उहांके जीवसनातन पार्षद बने रहैहैं औ साहब
औ साहबको लोक सनातन बनो रहैहैं परंतु उहांके पार्षदजीव और उहांकी
सब बस्तु साहबहीके रूपहै औ सब चिन्मयहै सो वेद कहैहैं ॥ श्लोक॥ “सच्चि-
दानन्दो भगवान् सच्चिदानन्दात्मिकास्यव्यक्तिः॥”औ वह अयोध्या नगरी ब्रह्मके
परैहै ब्रह्म वाको प्रकाशहै औ रघुनाथजी के समीप के जे पार्षद हैं ते साहबकें
स्वरूपहैं तामें प्रमाण ॥ “ अयोध्यापरंब्रह्म सरयू सगुणःपुमान् ॥ तन्निवासी-
जगन्नाथः सत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ १॥ अयोध्यानगरीनित्यासच्चिदानन्दरूपिणी ॥