कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) रमैनी ।
गुरुमुख सुख निज अति दातार २७ ॥ साक्षी ॥ अक्षर है
तिहु भर्मका, बिनु अक्षर नहिं जान॥ गुरु कृपानिज बुद्धिबल,
तब होवे पहिचान २९ ॥ साक्षी ॥ १६८जँहवां से सब प्रगटे, सो
हम समझत नाहि ॥ यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म
कहि ताहि ॥ ३० ॥ साक्षी ॥ ब्रह्म विचारे ब्रह्मको, पारख
गुरु १६९प्रसाद ॥ १७०रहित रहे पद परखिके, जिव से होय
१७१अंवाद ॥ ३१ ॥ मूल रमैनी सम्पूर्णा ॥ कठिन शब्द जेते रहे,
टिप्पणी करि बनाय ॥ बाकी अब कछु होय जो दीजो संत
जनाय ॥ १ ॥ गुरुथल १७२हौता जानिये, १७३शिवहर जन्म स्थान॥
युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ २ ॥
१६८ जहांसे ॥ १६९ दया, कृपा ॥ १७० अलग ॥ १७१ वाद
रहित ॥ . १७२ जिला सारन डा० घ० कुवाहकोटकें इलाकेमें और
हथुआसें पांच कोस उत्तर पर है ॥ १७४ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें
राजस्थान हैं ।
इति श्रीमूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधिता समाप्ता ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाणा—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेंकटेश्वर ” ( स्टीम् ) यन्त्रालय-बम्बई.