कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदिमंगल । (७)
इच्छा कियो एकते अनेकहोऊं सो वा अनुमान ब्रह्मसमष्टिजीवकोहै यहिहेतु तें
वहसमष्टिजीव एकतेअनेकहैगयो । औ फिरि वहसमष्टिरूपजीवको जो अनुमान
ब्रह्मसो बिचार्यो कि ई जे अशुद्धरूपजीवात्मा तिनमें प्रवेश कैकै नामरूपकरों
याही अर्थमें प्रमाणश्लोक ॥ “सदैवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं तदैक्षतबहुस्यां
अनेनजीवेनात्मनानुप्रविश्यनामरूपेव्याकरवाणित्यादिश्रुतयः॥” जो कहो वा सत्
ब्रह्मजीवको अनुमानकैसेकहौहौं ब्रह्महीसभयो ऐसोकाहेनहींकहौतौ ॥ “यतो
वाचोनिवर्त्तन्तेअप्राप्यमनसासहं ॥” इत्यादिक श्रुतिनकरिकैमनबचनकेपरेहैं सत्-
नाम कहनोवामें नहीं संभवितहै काहेते वो निर्विकारहै सविकार हैकै एकतें
अनेक हैजैबो नहीं सम्भवै या हेतुते यह समष्टि जीवही अपनो अनुमान रूप
धोखा ब्रह्मठाटकैकै माया सबलित हैकै तद् द्वारा जगत् उत्पन्नकैकै तद्द्वारा
आपों उत्पन्नहैके समष्टिते व्यष्टिहैगये । अविगति समर्थ जे साहब हैं
तिनको ना चीन्हत भये । यह संक्षेप सूक्ष्मरीतिते जो उत्पत्ति भई सो कहिदियो।
औ जब जीव साहब के जानिबे को समर्थ भयो तब जैसी उत्पत्ति भई है सो
कहैंहैं साहब जो सुरति दियो सोतौ अपने में लगायबेको दियो यह संसार में
लगायो परंतु जो संसारते खैंचिकै अजहूं सुरति सम्हारै साहब मेलगावै तो साहब
के हजूर आठौपहर बनोरहै अर्थात् साहबै सर्वत्र देखैपरै संसारदेखिही ना परै
तामें प्रमाण कबीर जी को साखी ॥ सुरति फँसी संसार में, तेहिसे परिगा-
दूर सुरति बांधि स्थिर करै, आठौपहर हजूर ॥ १ ॥ आगे जौनीतरह ते उत्प-
त्ति भई साहबको त्यागि संसारीभयो सुरति पाय काजकरिबेको समर्थभयो
तबहूं साहब सारशब्दको उपदेश दियोहै ताको साहबमुख अर्थ ना समुझिकै
संसारमुख अर्थ समुझिकै ब्रह्मकी कल्पना कैकै संसार को उत्पन्न कैकै संसारी
भयो है यह जीव सो आगे कहैंहैं ॥ ४ ॥
दोहा—तब समरथके श्रवणते, मूल सुरति भइसार ॥
शब्द कला ताते भई, पांच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
साहब को दियो सुरति पाइकै समरथ भयो जो समष्टि जीव ताके श्रवण
में मूलसुरति जो साहब अपने जानिबे को दियो है सो सार भई कहे रामनाम