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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

( ६ ) बीजक कबीरदास ।
प्रथम समर्थजे साहब श्रीरामचन्द्रहैं साकेत निवासी दयालु जिनके लोकके
प्रकाशमें समष्टिरूपते यह जीव है ते श्रीरामचन्द्र परमदयालु यह जीवको देखि-
कै कि कछू बस्तुकों याकों ज्ञान नहीं है जब यह जीवपर साहबकी दयाभई तब
सुरतिमात्र दैकै अपने जानिबेकों वाको समर्थ करतभये कि जब याकें सुरति-
हौयगी तब मोकोजानैगो मैं हंसस्वरूप दैकै अपनेलोक लैआउंगो । जहां मन-
मायां कालकीगतिनहींहै तहां सुखपावैगो अबैतो याको सुखको ज्ञानही नहीं है ।
यह करुणा करिकै वह समष्टिरूप जीवके घटमें सहजही सुरति को उच्चारकरत
भये कहे अंकुर करतभयें । सो साहबतो अपने जानिबेको सुरतिदियो कि मों-
कोजानै औ यह जीव वही सुरति कों पाइकै औ मनादिकन को कारण इनकें
रहंबई करै औ शुद्ध रहै दूधरहै जीव अपनी शुद्धता रूप दूधमें जगत्को कारण
बनोई रहै तामें वही सुरति को जामन दैदियो सो बिनशिगयो सो वह सुरति
पाइकै साहबकेपास तो न गयो जीव बिनशिकै इच्छादिक जे सात तिनको
बिस्तार करत भयो । औ यह चैतन्य जीवको सुरति दैकै साहब चैतन्य करैहै ।
साहब चैतन्यो को चैतन्यहै तामें प्रमाण श्लोक॥ “नित्योनित्यञ्चेतनश्चेतनानां।
द्रव्यंकर्मचकालश्चस्वभावोजीव एवच।यदनुग्रहतःसंतिनसंति यदुपेक्षया इति भाग-
वते॥”औ इच्छादिकन को कौन सात.बिस्तार करतभयो सो आगेकहैहैं ॥३॥
दोहा- दूजेघटइच्छाभई, चितमन सातौकीन्ह ॥
सातरूपनि रमाइया, अबिगतकाहुनचीन्ह ॥ ४ ॥
जब याकों साहब सुरति दीन तब जीवके जगत को कारणमें रामाज्ञान
बनोईरहै तेहिते सुरति साहबमें न लगायो जगत् मुख लगायो । जब सुरति
जगत् मुखलाग्यो तबप्रथम जगत्को कारण पुष्टभयो विनशिगयो तेहिते दूसर
इच्छा रूप अंकुरभयो तीसर चित्तभयो चौथमनभयो पांचौंबुद्धिभई छठौं अहंकार
भयो सातौं अहंब्रह्म कहेअनुभवते भयोजो ब्रह्म ताकोमान्यो कि मैंहींब्रह्महौं सों
शुद्धते अशुद्ध ह्वैकै सातबिस्तार करिकै समष्टिरूपजो जीव सो अहंब्रह्मास्मिमान्ये
तब याको अनुभव ब्रह्ममाया सबलित भयो, ताहीद्वारा जगत् उत्पन्न भयों,
ताहीद्वारा यहंजीवौ उत्पन्नभयो अर्थात् समष्टिरूप जीवको अनुमान जो ब्रह्म सों