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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ४३८ ) बीजक कबीरदास ।
होइ तो याअर्थ है। “ला इन्द्रको औ छेदनको कहै हैं। सो हें जीव! जो यज्ञादि-
ककारि इन्द्रादिक देवतनके संतुष्टिके वास्ते पशुछेदन करौहौ सो वेद या तुतरे-
बात जनाई है । जैसे लरिका रोटीको टोटींकहैहै परन्तु माता तात्पर्य जानै
है कि रोटीही मांगै है । ऐसेवेद जो यज्ञादिक कहै हैं सो दुष्कर्म छुड़ाइकें
यज्ञादिक में लगायो । फेरिज्ञानदै कै येउकर्म छुड़ाइक तात्पर्यते साहबको
बतावै हैं । सो तुतर जो है वेद तौनेको अर्थ तब पावै जब वाके
तात्पर्य को पावै सो आपतो तुतरह्रै वेदं परदा कैके बात कहै है सब जीवनको
ए कहै हैं कि, जीव औरको औरई कहै है मेरो तात्पर्य नहीं समझैहै सो एकै
खेत जो संसार है तामें दूनों निबहै हैं” । अथवा साहबके इहां वेदनहीं पहुंचि
सकैहै न प्रकट वर्णन करि सकैहै तात्पर्यही करिकै कहै है जगत औ कर्म याही-
को प्रकट बर्णन करैहै । औजीवजेहैं ते जगतही में परे रहै हैं जे तात्पर्य जानै-
हैं तेई साहबके समीप पहुंचे हैं ताते वेदौ जीवौ एक खेत जो जगत है ताही-
मों निबहै हैं जो जगत न रहै तो बद्ध विषयी मुमुक्षुई न रहिजायँ मुक्तभारि
रहिजायँ औ चारिउ वेद रकारमकार में रहिजायँ । ल इन्द्र को लक्ष्मी को छेदन
को कहैहैं तामें प्रमाण ॥ 'ले इंद्रो लवनो लश्च ला च लक्ष्मीः प्रकीर्त्तिताः'॥२९॥
ववा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
ववा कहै सुनौ रे भाई। स्वर्ग पताल किं खबरि न पाई ३०
वकहिये भक्तको वा कहिये वायुको सो हेजीव! तैं तो साहबको भक्तहै वायु
की नाईं जगत्में बहतफिरौहौ ! वहहै ईश्वर, वहहै ईश्वर या कहा सब कोई
कहौहौ । सो वे नाना ईश्वरनके कहे काज कहे मुक्ति न होइहै । सोहे ववा
कहनेवारें भाई ! सुनते जाउ तुम स्वर्ग पातालकी खबरि नहीं पाई अर्थात् सबके
रखवार साहबको नहीं जानौ हौ तामें प्रमाण ॥ “ स्वर्गपतालभूमिलौंबारी ।
एकै रामसकल रखवारी ” ॥ वा सात्वतको औवायुको कहै हैं तामें प्रमाण ॥
“ सात्वतेवरुणे वातेवैकारःसमुदाहृतः ” ॥ ३० ॥
शशा सरदेखै नहिं कोई । सरशीतलता एकै होई ॥
शशा कहै सुनौ रे भाई । शून्यसमान चला जगजाई ॥३१॥
१-'ल' इन्द्र और काटनेवाले को, 'ला' लक्ष्मीको कहते हैं ।
२-'व' सत्वगुणी, वरुण और वायुको कहतेहैं ।

शकहिये सुखको शाकहिये शेषको सो हे जीव! तैंतो सुखसागरजे साहबहैं तिनकों
शेषहै अर्थात् अंशहै सो सुखसर जे साहब हैं तिनको तुमकोई नहीं देखौहै
कैसो है वा सर कि जाकी शीतलता एकई है वा शीतलता पाये फिरि जनन
मरणनहीं होइहै सो शशा जे साहबके शेषसाधुहैं तेकहैं हैं कि जिनको अंशजीव
तिनको नहींजानै है शून्यजो धोखाब्रह्म ताहीमें जगत समानजाइहै। श शेषको औ
सुखको कहै हैं ॥ “वदन्ति शं बुधाः शेषे शः शांतश्च निगद्यते॥ शश्च शयन-
मित्याहुः हिंसा शः समुदाहृतः ॥ ३१ ॥
षषा षरषर कहै सब कोई । षर षर कहे काज नहिं होई ॥
षषा कहै सुनौरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥ ३२ ॥
ष कहिये श्रेष्ठको । सो ष दूसरी है सो हे जीव ! श्रेष्ठौते श्रेष्ठजे साहबहैं
तिनको षरषर सांचसांच सबै कहै हैं औरेको खोटामानै हैं परंतु षर षर कहेतें
काज जो है मुक्ति सो न होगी बिना रामनामके साधनकीन्हे । औ विना
नीकी प्रकार साहबके जाने। काहेते षषा कहे श्रेष्ठौते श्रेष्ठ जे साहब हैं ते कहैं हैं
कि, हे भाई ! सुनौ ! तुम राम नामको लैकै मायाब्रह्म ते पराइ जाउ अर्थात्
सब को छोड़िकै रामनाम जपौ । ष श्रेष्ठको कहै हैं॥ “षकारःकीर्तितः श्रेष्ठेष्व्-
इच्छगर्भविमोचने” ॥ ३२ ॥
ससा सरा रचो बरिआई । सर वेधे सब लोग तवाई ॥
ससाके घर सुन गुन होई। यतनी बात न जानै कोई ३३॥
स कहिये लक्ष्मी को सा कहिये परोक्षको । सो हे जीव ! तेरो ऐश्वर्य्य
परोक्षमें है अर्थात् साहबके यहां है या देखबेकी लक्ष्मी तेरी नहीं है सो तैं सरा-
जोकर्म है ताको बरिआई रचिलियो सो वाही सरारूपीशरहै कहे कर्मरूपीशरमें
लोग बेधे हैं ते सब तवाईमें परे हैं नरक स्वर्गमें जाय आवै हैं। सो ससा जो जीव
ताके घर कहे हृदयमें काहूको शून्यकहे धोखा ब्रह्म समान है, काहूके गुण जो
१-'श' शं- सुख, मङ्गल, श- शेषनाग, शान्त प्रकृति, सोना और हिंसाकरने
को कहतेहैं ।
२-'ष' श्रेष्ठको और 'षृ' गर्भसे प्राणीकी उत्पत्ति होनेको कहतेहैं ।

( ४४० ) बीजक कबीरदास ।
माया सो समानेहै सो यतनी बात कोई नहीं जानैहै कि, येई जाहब के
चीन्हन न देइहैं । स लक्ष्मीको औ परोक्षको कहैहैं ॥ “सःपरोक्षे समाख्यातः-
साच लक्ष्मीःप्रकीर्त्तिता” ॥ ३३ ॥
हहा होइ होत नहिं जाने । जबहीं होइ तबै मन माने ॥
है तो सही लहै सब कोई।जब वा हो तब या नहिं होई॥३४॥
ह कहिये विष्कम्भको हा कहिये त्यागको । सो हे जीव या विष्कम्भ शरी-
रको त्यागहोत कोई नहीं जानैहै । जब शरीरत्याग द्वैजाइ है तबहीं जानैह कि,
शरीरत्याग द्वैगयो । जामें जीव थँभारहैहै सो शरीरमें हंसरूप सही है। ता जीवको।
परंतु सबकोई नहीं लहैहै कहै नहीं पावैहै। जब वा हंसशरीरहोइ जब या शरीर-
नहीं होइहै वाही हंसशरीरमें थँभारहै है । ह विष्कम्भको औ त्यागको कहै हैं तामें
प्रमाण ॥ “हःकोप

॥ सत्पुरुषाय नमः ॥
अथ विप्रमतीसी।
सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी।हरि बिनु बूड़ीनाव भरीसी १
ब्राह्मण ह्वेकै ब्रह्म न जानैं। घरमें यज्ञ प्रतिग्रह आनैं ॥२॥
जे सिरजा तेहि नहिं पहिचानैं।कर्म भर्म लै बैठि बखानैं ३॥
ग्रहण अमावस सायर पूजा।स्वातीके पात परहु जनिदूजा ४
प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहितहोमकीआसा ५
कुल उत्तम कुल माँहकहावैं।फिरिफिरि मध्यमकर्मकरावैं ६
कर्म अशुचि उच्छिष्टै खाहीं।मति भारिष्टयमलोकहिजाहीं ७
सुतदारा मिलि जूठो खाहीं । हरिभगतनकी छूतिकराहीं ८
न्हायखोरि उत्तम ह्वै आवैं।विष्णुभक्त देखे दुख पावैं॥९॥
स्वारथलागिरहे वे आढ़ा । नामलेत जस पावक दाढ़ा १०
रामकृष्णकीछोड़िनिआसा।पढ़िगुणिभयेकृत्तिमकेदासा ११
कर्मकराहिं कर्महिंको धावैं।जो पूछै तेहि कर्मदृढ़ावैं ॥१२॥
निष्कर्मीकै निन्दा कीजै । करैकर्मताही चितदीजै ॥१३॥
असभगती भगवतकी लावैं।हरिणाकुशको पन्थचलावैं १४
देखहुकुमतिनरकपरगासा।बिनुलखिअंतरकिरतिमदासा १५
जाके पूजे पाप न ऊड़ै । नाम सुमिरितेभवमेंबूड़ै ॥१६॥

( ४४२ ) बीजक कबीरदास ।
पापपुण्यकै हाथेहिपासा । मारि जगतको कीन्हबिनासा १७
येवहनी दोऊ वहनि न छाड़ै। यहगृहजारैं वहगृह माड़ै ॥१८॥
बैठेते घर शाहु कहावै । भितरभेदमैनमुसाहि लगावै ॥१९॥
ऐसीविधि सुरविप्र भनीजै।नामलेत पंचासन दीजै ॥२०॥
ऊंचनीचकहुकाहिजोहारा।बूड़िगयेनहिंआपुसँभारा॥२१॥
ऊंचनीचहै मध्यमबानी । एकैपवन एकहै पानी ॥ २२ ॥
एकैमटियाएककुम्हारा । एकसवनकासिरजनहारा ॥२३॥
एकचाक बहुचित्र बनाया।नादविंदुके बीच समाया ॥२४॥
ब्यापीएकसकलकी ज्योती ।नामधरे क्याकहिये मोती२५
राक्षसकरणी देवकहावै । वादकरै भवपार न पावै ॥ २६ ॥
हंस देह तजि न्यारा होई ॥ ताकी जाति कहै धौं कोई॥२७॥
श्यामसुपेतकि, राता पियरा।अवरणवरणकितातासियरा२८
हिंदू तुरुक कि बूढ़ा बारा।नारि पुरुष मिलि करौ विचारा२९
कहिये काहि कहा नहिं माना।दास कबीर सोई पहिचाना ३०
साखी—वहा अहै बहिजातुहै, करगहि ऐंचहु ठौर ।
समुझाये समुझै नहीं, दे धक्कादुइ और ॥ ३१ ॥
सुनहु सबनमिलिबिप्र मतीसी।हरि बिन वूड़ी नाव भरीसी १
ब्राह्मण हैकै ब्रह्म न जानैं । घरमें यज्ञ प्रतिग्रह आनैं॥ २ ॥
जे सिरजातेहि नहिंपहिचानैं।करमभरम लैबैठि बखानैं॥३॥
ग्रहण अमावस सायर पूजा।स्वातीके पात परहु जनि दूजा ४
विप्रके वर्णनमें हम तीस चौपाई कहै हैं सो सबन मिलि सुनते जाउ कैसे
ब्राह्मण हीतभये कि, जिनको जन्म हरिबिना भरी नाव ऐसी बूड़िगई ॥ १ ॥

विप्रमतीसी । ( ४५३ )
ब्रह्मईके जानेतें ब्राह्मणकहावै है सो ब्रह्म को तो न जान्यों यज्ञादिकनके प्रति-
ग्रह घरमें लैआवै हैं आदिते दानौ आयो ॥ २ ॥ जौन उत्पत्ति कियो है ताकों
तो जानतई नहीं हैं कर्मकाण्डको भरम नाना प्रकारके बैठिकै बखानै हैं ॥ ३ ॥
सों हे दूना कहैं दुःखग्रहणमें अमावस में सायर कहै समुद्रादिक तीर्थन में जैसे
स्वाती के जलको पपीहा दौरै है ऐसे तुम्हीं ग्रहण अमावसमें समुद्रादिक तीर्थन
में दान लेन को ताके रहौ हौ परन्तु आशा नहीं पूनै है ॥ ४ ॥
प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होम की आसा ५
कुल उत्तम कुल माहँ कहावैं।फिरि फिरि मध्यम कर्म करावैं
मुखते प्रेत कर्म करावै हैं कि, ऐसो पिंडदान करो तौ प्रेतत्व छूटिजाइ ।
औ अंतःकरणमें या आशा बसै है कि, जो या होमकरै तौ हम दक्षिणा पावैं
॥ ५ ॥ औ ब्राह्मण तो बड़े उत्तमकुलके कहावै हैं कि, हम बड़े कुलके हैं परंतु
फिरिफिरि कहै बारबार मध्यम कहै नरक जायवाके कर्मकरावै हैं ॥ ६ ॥
कर्म अशुचि उच्छिष्टै खाहीं।मति भरिष्ट यमलोकहि जाहीं ७
सुत दारा मिलि जूठो खाहीं।हरिभगतनकी छूति कराहीं ८
न्हाय खोरि उत्तम है आवैं । विष्णु भक्त देखे दुख पावैं ॥९॥
नाना प्रकारके अपावनकर्म्म कैकै भैरव दुलहा देवादिकनको उच्छिष्टखाय हैं
सो मतिभ्रष्टह्वैकै यमलोकहि जाइहैं ॥ ७॥ तौने प्रेतनको जूठसुत दाराकहे पुत्र स्त्री
त्यहि समेत सब मिलि खाइहैं औ हरिभक्तन की छूति मानै हैं ॥ ८ ॥ औ नहा
य खोरि कै आपने जान पवित्रहै आवैं औ जिनके दर्शनते पवित्र होयहैं ऐसे
बिष्णुभक्त तिनको देखिकै दुःखपावै हैं। ई बड़े तिलक दिये शङ्ख चक्र दीन्हे कहां रहे
उनको मुख देखेंगे तो पापलगै है या कहै हैं ॥ ९ ॥
स्वारथ लागि रहे वे आढ़ा । नाम लेत जस पावक दाढ़ा १०
राम कृष्णकी छोड़िनि आसा।पढ़ि गुणि भे किरतिम के दासा
अपने स्त्री पुत्र यहीकें स्वारथ में वे अर्थ आढ़ाति लगायरहे हैं जिनके अंश हैं
ऐसे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके नामलेतमें मानों जीभ पावकमें जरी जाइहै ॥१०॥

( ४४४ ) बीजक कबीरदास ।
रामकृष्ण जे हैं तिनकी आशा छोड़िकै पढ़ि गुणिकै किरतिमकहे अपनी बनाई
मूर्त्ति अथवा किरतम माया तिनको दास कहावै हैं ॥ ११ ॥
कर्म करहिं कर्महिको धावैं । जो पूछैत्याहि कर्म हढ़ावैं ॥१२॥
निःकर्मीकै निंदा करहीं । कर्म करै ताही चित धरहीं ॥१३॥
अस भक्ती भगवतकी लावैं।हिरणाकुशको पंथ चलावैं ॥१४॥
कर्म नाना प्रकारके करै हैं औ कर्मफल जो स्वर्गादिकनको भोग ताहीको
धावैं हैं औ जो कोई मुक्तिहूकी बात पूछै है ताको कर्मही हढ़ावै हैं ॥ १२ ॥
निःकर्मी जे साधु हैं तिनकी तौ निन्दा करै हैं औ कोई कर्मकरै है ताको सत्कार
करै हैं ॥ १३ ॥ सो या रीतिते भगवत्की भक्ति करै हैं या कहै हैं
कि ईश्वर तो अजा गल थनकी नाईं है वाते कौन कामहोय है । औ कोई
हिरणाकुशको पंथ तामसी मत चलावै हैं कहै हैं कि हमहीब्रह्महैं ऐसो दैत्यनको
ज्ञानहै तामें प्रमाण ॥ “ईश्वरोऽहमहंभोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी आढ्यो-
भिजनवानस्मि कोन्योऽस्ति सदृशो मया ॥ १४ ॥
देखहुकुमतिनरकपरगासा।बिनुलखि अंतरकिरतिमदासा १५
सो या कुमतिनको प्रकाशतो देखौ बिनु अन्तरके लखे कि हम कौनके हैं या
बिनाजाने किरतिम जो माया ताके दास है रहे हैं रक्षक को न माने रक्षा कौनकरै १५
जाके पूजै पाप न ऊड़ै । नाम सुमिरितैं भवमें बूड़ै ॥ १६ ॥
पापपुण्यकेहाथहिपासा । मारिजक्तसबकीनविनासा॥१७॥
ये बहनी दोउ बहिनिनछाड़ै।यहगृह जारै वहगृहमाड़ै॥१८॥
औ जैने देवताके पूजै न पापछूटै ना मुक्तिहोइ तेई देवतन को पूजैहैं उन-
हींको नाम सुमिरि सुमिरि संसारमें बूड़े हैं ॥ १६ ॥ औ नाना प्रकारके कर्म
बताइकै पाप पुण्य रूप फांसी डारिकै जगत्को विनाश करिदेत भये ॥ १७ ॥
औ कोई बिप्र जे हैं ते बहनी कहे संसारमें बहनवारी जो विद्या अविद्या माया
पाप पुण्य रूप ताको बहिनिन कहे ढोवनवारो जो बिप्र सो ऊपरते छांड़िकै यह
गृह जारिकै कहे छांड़िकै वहगृह कहे वहांके महन्त भये ध्यान लगायकै बैठे ॥ १८॥

विप्रमतीसी । (४४५)
बैठेते घर शाहु कहावैं । भितर भेद मन मुसहि लगावैं॥ १९॥
ऐसीविधि सुर विप्र भनीजै। नामलेत पंचासन दीजै॥२०॥
बूड़िगयेनहिंआपसँभारा।ऊंचनीचकहुकाहिजोहारा॥२१॥
ऊंचनीच है मध्यमवानी । एकै पवन एकहै पानी ॥ २२ ॥
एकै मटिया एक कुम्हारा।एक सबनको सिरजनहारा॥२३॥
एकै चाक बहुचित्र बनाया।नादबिन्दुके बीच समाया॥२४॥
सो ऊपरते ऐसो ध्यान लगायकै घरमें बैठे बड़े साधुकहावैं औ अन्तःकरण
में मनते पराई द्रव्य मूसैको भेद लगाये हैं ॥ १९ ॥ सोयहि रीति विप्रनकें
सुरनकी विधिकहैं नामको लेइहैं कहे मन्त्रजपैं हैं औ पंचासनकहे पंच आसन
देइहैं अर्थात् पंचांगोपासना करैं हैं ॥ २० ॥ सो आपै मायाकी धारमें बूड़िगये
न सँभारत भये तो ऊंचनीच कहे पांच देवतनमें काको जोहार्यो कहे काके भये
अर्थात् काहूके न भये ॥ २१ ॥ सो विप्रनको उत्तम मध्यम नीच बाणी कारिकै
होइहैं बास्तव तो सबके शरीरनमें एकै पानी है एकै पवनहै ॥ २२ ॥ औ एकै
सबकी माटीहै कहे सब पांचभौतिक हैं औ सबके सिरजनहार कुम्हार मन एकैहैं
॥ २३ ॥ एकचाक जो जगत्है तामें बहुत विधिके चित्र बनावत भयो मन औ
नाद बिन्दुके बीचमें आपै समातभयो ॥ २४ ॥
व्यापी एक सकलमें ज्योती।नामधेरेकाकहियेमोती॥२५॥
राक्षसकरणी देवकहावै । दाद करै भवपार न पावै ॥ २६ ॥
हंस देह तजि न्यारा होई।ताकी जाति कहै धौं कोई ॥ २७॥
इयामसुपेदकि, रातापियरा।अवरणवरणकितातासियरा२८
सो एक ज्योति जो आत्मा सो सबमें व्यापि रही है ब्राह्मण नामधरचो सो
ताहीते मोतीकही अर्थात् न कही बिना ब्रह्म जाने ब्राह्मण नहीं कहावै है ॥ २५ ॥
औ करणी तौ राक्षसकी नाईं करे हैं औ जगतमें ब्राह्मण देवता भूसुर कहावैं हैं

(४४६) बीजक कबीरदास ।
औ वादविवाद नानाप्रकारके करैहैं परंतु संसार समुद्रको पारनहीं पावैहैं ॥२६॥
सो हंसजो जीव है सो देहको त्यागिकै न्यारो हैजाइ है ताकी जाति कोई कहै
तो वह कौन बर्णहै ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ॥ २७ ॥ औ वह आत्मा कि,
श्याम है कि सुपेत है कि लालहै किपियरहै कि अवर्ण है कि वर्ण में है कि गर्म है
कि शीतल है ॥ २८ ॥
हिन्दू तुरुक कि बूढ़ाबारा। नारिपुरुष मिलिकरहु विचारा २९
कहिये काहि कहा नहिं माना। दासकबीर सोई पहिचाना ३०
साखी । वहिआ है वहि जातुहै, करगहि ऐंचहु ठौर ।
समुझाये समुझै नहीं, दे धक्का दुइ और ॥ ३१ ॥
पुनि हिन्दू है कि, तुरुकहै कि बूढ़ा है कि लडिकाहै या नारि पुरुष मि-
लिकै सबजने बिचारकरो ॥ २९ ॥ सो या बात कासों कहौं कोई नहीं मानैहै
सबके रक्षक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको दासकबीर कहै हैं कि, मैं
सोई पहिचान्यों है कि उनको अंशजीव है वे स्वामी हैं ॥ ३० ॥ या जीव
औरे २ में लगिकै बहत आयो है औ बहा जाइ है सो करगहि कहे एकबे-
उपदेशकरिके और ऐंचौ हौं कि साहब में लागु समुझावत आयो हैं औ समु-
झावतहौं जो समुझाये न समुझै तो लाचार हैकै दुइ धक्का और महूं दैदेउँ कि
बहा जाय ॥ ३१ ॥
इति विप्रमतीसी सम्पूर्णा ।

ॐ
अथ कहरा प्रारभ्यते ।
कहरा पहिला ॥ १ ॥
सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु गुरुके वचन समाई हो ।
मेली सिष्ट चराचित राखो रहो दृष्टि लोलाई हो ॥ १ ॥
जो खुटकार वेगि नहिं लागो हृदय निवारहु कोहू हो ।
मुक्तिकी डोरि गांठि जनि खैंचो तब वाझी बड़ रोहू हो॥२॥
मनुवो कहौ रहै मन मारे खीझवो खीझि न बोलै हो ।
मनुवो मीत मिताइ न छोड़ै कवहूं गांठि न खोलै हो ॥३॥
भूलौ भोग मुक्ति जनि भूलौ योगयुक्ति तन साधो हो ।
जो यहि भांति करहु मतवारी ता मतके चित बांधो हो॥४॥
नहिं तौ ठाकुर है अति दारुण करिहै चालु कुचाली हो ।
बांधि मारि डारि सब लैहै छूटी सब मतवाली हो ॥ ५ ॥
जबहीं सामत आइ पहुंचे पीठि सांट भल टूटैहो ।
ठाढ़े लोग कुटुम्ब सब देखै कहै काहु किन छूटैहो ॥ ६ ॥
एक तो अनिष्ट पाउं परि बिनवै बिनती किये न मानै हो ।
अन चिन्ह रहे कियो न चिन्हारी सो कैसे पहिचानै हो॥७॥
लेइ बोलाय बात नहिं पूछै केवट गर्भ तन बोलै हो ।
जेकरि गांठि सबल कछु नाहीं निराधार है डोलै हो॥८॥

( ४४८ ) बीजक कबीरदास ।
जिन्ह सम युक्ति अगमनकै राखिन धरणिमांझघरडेहरिहो ।
जेकरे हाथ पाउं कछु नाहीं धरणि लाग तनसे हरि हो॥९॥
पेलना अक्षत पेलि चलु बौरे तीर तीर कह टोवहु हो ।
उथले रहौ परो जानि गहिरे मति हाथै कै खोवहु हो ॥१०॥
तर कै घाम उपरकै भूभुरि छांह कतहुं नहि पावहु हो ।
ऐसो जानि पसीजहु सीजहु कस न छतरिया छावहु हो ११
जो कछु खेल कियो सो कीयो बहुरि खेल कस होई हो ।
सासु ननँद दोउ देत उलाटन रहहु लाज मुख गोई हो १२॥
गुरु भो ढील गोन भो लचपच कहा न मानेहु मोरा हो ।
ताजी तुरकी कबहुं न साजेहु चढ़यो काठके बोराहो॥१३॥
ताल झांझ भल वाजत आवै कहरा सब कोइ नाचै हो ।
जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये तेहि रंग दुलहिन राचै हो १४
नौका अछत खेवै नहिं जान्यो कैसे लागहु तीरा हो
कहै कबीर राम रस माते जोलहा दास कबीरा हो ॥१५॥


सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु गुरुके बचन समाई हो ।
मेली सृष्ट चराचित राखौ रहौ दृष्टि लौ लाई हो ॥ १ ॥
.. श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीव ! तैं गुरुके बचनमें समाइकै सहज ध्यान
तैं करुगुरुके बचन जो आगे लिखि आये हैं कि, सुरति कमलमें गुरु बैठे रकार
मकार जपै हैं तामें समाइ जाइ । अर्थात् दलदलमें बाढ़िकै इक्कीस हज़ार छासै
श्वास जे चलै हैं तिनमें तेतने राम नाम जपै । कौनी रीतिते जपै तामें प्रमाण॥
श्री कबीरजी को पद ।

कहरा । ( ४४१ )
षट् चक्र निरूपण ।
संतौ योग अध्यातम सोई ।
एकै ब्रह्म सकल घट ब्यापै द्वितीया और न कोई ॥
प्रथम कमल जहँ ज्ञान चारि दल देव गणेशको वासा ।
रिधि सिधि जाकी शक्ति उपासी जपते होत प्रकासा ॥
षट दल कमल ब्रह्मको बासा सावित्री सँग सेवा ।
षट सहस्त्र जहँ जाप जपतहैं इंद्र सहित सब देवा ॥
अष्ट कमल जहँ हरि सँग लक्ष्मी तीजो सेवक पवना ।
षट् सहस्त्र जहँ जाप जपतहैं मिटिगो आवा गवना ॥
द्वादश कमलमें शिवको बासा गिरिजा शक्ती सारँग ।
षट सहस जहँ जाप जपत हैं ज्ञान सुरति लै पारँग ॥
षोडश कमल में जीवको बासा शक्ति अविद्या जानै ।
एक सहस जहँ जाप जपतहैं ऐसा भेद बखानै ॥
भवँर गुफा जहँ दुइ दल कमला परमहंस कर वासा ।
एक सहस जाके जाप जपतहैं करम भरमको नासा ॥
सहस कमलमें झिल मिल दर्शो आपुइ बसत अपारा ।
ज्योति स्वरूप सकल जग व्यापी अक्षय पुरुष है प्यारा ॥
सुरति कमल परसत गुरु बोलै सहज जाप जप सोई ।
छौसै इक्कीस सहसहि जपिले बूझै अजपा कोई ॥
यही ज्ञानको कोई बूझै भेद अगोचर भाई ।
जो बूझै सो मनका पेखै कह कबीर समुझाई ॥ १ ॥
औ यही रामनाम मन बचनके परे है सो आगे कहि आये हैं और सब मनकें
भितरै है यही रामनाम सबके ऊपरहै ताहीमें मतौ तबही पारै जाउगे । औ
मेली सृष्ट कहे सृष्टजो संसार ताको मेलि देउ कहे छोड़ि देउ । औ चरचित
राखौ कहे सहज समाधि आगे कहि आये हैं ताको चरचित राखौ कहे वही
जानतरहु । अथवा वाहीमें जो आपने चितको चरा कहे चलत राखौ दृढ़-
२९

( ४५२ ) बीजक कबीरदास ।
यकतो अनिष्ट पांय परि विनवै विनती किये न मानै हो ।
अनचिन्ह रहे कियो न चिन्हारी सो कैसे पहिचानै हो ७
एक जे साहब हैं सबके रक्षक तिनते ये अनिष्ट रहे कहे उनको इष्ट न
मानत रहे । औ वहां यमदूतनसों पांय परि परि विनवै है, सब देवननते विनवै
हैं, वे बिनतीहू किये नहीं मानैहैं । काहेते कि, दयाहीन हैं । औ साहब जें
दयालु छुड़ावनवारे तिनसों अन चिन्हार रहे चिन्हारी न कियो सो कैसे अब
पहिचानै । भाव यह है कि जो, अजहूं स्मरणकरो तौ साहब छुड़ाइही
लेइगो ॥ ७ ॥
लेइ बुलाय बात नहिं पूछै केवट गर्भ तन बोलै हो ।
जेकरी गांठि सबल कछु नाहीं निराधार है डोलै हो८
औ केवट जे गुरुवा लोगहैं ते तब तो गर्भ कहे अहंकार तनमें कैकै तुमको
बोलाय अपने मतमें मिलाय लीन्हेनि । अब जब यमदूत मारन लगे तब
तुमको बात नहीं पूछै हैं । गुरुवा लोग सो जाके सबल कहे खर्च राम नाम
रह्यो सो पार भयो औ जाके राम नाम सबल कछु नहीं रह्यो सो निराधार
कहे रक्षक रहित यमपुरमें डोलैहै अथवा निराधार जो ब्रह्म ताहीम डोलैहै॥८॥
जिन सम युक्ति अगमनकै राखिन घरणि मांझ घर डेहरिहो।
जेकरे हाथ पाउँ कछु नाहीं धरन लागु तन सेहरि हो ॥ ९ ॥
जौने स्त्री पुत्रादिकन को नाना युक्तिकैकै पालन कियोहै तौन घरणि कहे स्त्री
शरीर छूटे डेहरी भरि जायहै आगे नहीं जायहै । सम जो पाठहोय तौ जिनका
अपने सम बनाय राखिन तौन स्त्री डेहरीलौं पहुंचाई है । धुनिते या आयो कि
पुत्र चिता लौं जायहै सो जेकरे हाथ पाउँ कछु नाहीं कहे जेकरे हाथपाउँ नहीं
है ऐसो जो जीवात्मा ताको जब यमदूत धरनलागु तब तनमें सेहरि है आवै है
तन विकल है जाइहै, वे कोऊ नहीं सहाय करैं हैं । ताते साहबको जानौ जो
कहो यमदूतै कैसे धरेंगे ? तौ लिंग शरीरते धरेंगे अर्थात् जाको जैसो कर्म है
बाके संस्कारते वा लोकमें कर्म शरीर बनैहै ॥ ९ ॥

कहरा । ( ४५३ )
पेलना अक्षत पेलि चलु बौरे तीर तीर कहँ तोवहु हो ।
उथले रहौ परौ जनि गहिरै मति हाथै कै खोवहु हो १०
: सो कबीरजी कहैहैं कि, पेलना जो राम नाम सो अक्षत बनै है ताकों संसार
समुद्रमें पेलिकै हे जीव ! संसारसमुद्र उतरिजा । तीर तीर कहे नाना मतनको
का टोवत फिरै है उथले में रहौ अर्थात् साहब को ज्ञान कीन्हे रहौ । गहिर
जो धोखा ब्रह्म कठिन तामें न जाउ । वहां गये तुम्हार हाथहुको जीवत्त्व सों
जातरहैगो ताते तुम न खोवौ उथले कहे साहबको ज्ञान जानौ ॥ १० ॥
तरकै घाम ऊपरकै भूभुरि छांह कतहूं नहिं पावहु हो ।
ऐसो जानि पसीजहु सीजहु कस न छतरियाछावहुहो ११
तरके घाम कहे नाना कर्म जे नीकौ नागा कियो ताकी जो ताप संसारमें
ऊपरकी भूभुरि कहे नरक में गये तौ वहौं तपै है, स्वर्ग में गये तौ गिरनकी
भय बनी है, काहू को अधिक ऐश्वर्य देख्यो तो ईर्षा बनी रहैहै कि, ऐसो
कर्म हम न किये । ये दोऊ तापमें साहबको ज्ञान रूप छांह कतहूं नहीं पावैहै
ऐसो तुम जानतौहौ पै वही में पसीजौ हौ कहे श्रम करौ हौ पसीना चलैहै औ
छीजौहौ साहबकी ज्ञान रूप छतरिया काहे नहीं छावहुहौ ॥ ११ ॥
जो कछु खेल कियो सो कीयो बहुरि खेल कस होई हो ।
सासु ननँद दोउ देत उलाटन रहहु लाज मुख गोई हो १२
जो कछु खेल कियो कहे जो कछु कर्म कियो सोई भोग कियो । अथवा
जौन खेल माया ब्रह्मको साथ करिकै कियो सोई फल भोग कियो । सो बिना
राम नाम लीन्हे इनको छोड़िकै फेर खेल कियो चाहौ मुक्तिवाला सो कैसे
होइगो । सासु जो है मूल प्रकृति औ ननँदि जो है विद्या माया सो ये दोनों
तुमको उलाटन कहे उलटिकै जवाब देइहै कि, बिद्या माया करिकै मुमुक्षुहै
मुक्तिकी इच्छा करत रह्यो । सो अब हम तुमहींको लपेटि लियो तुम हमकों
त्यागत रह्यो है अब नहीं छूटि सकौहौ । या जवाब सुनि तुम लाजिकै मुखगोइ
रहौहौ लाचार ह्वै छूटि नहीं सकौहौ ॥ १२ ॥

( ४५४ ) बीजक कबीरदास ।
गुरु भो ढील गोन भो लचपच कहा न मानहु मोरा हो ।
ताजी तुरकी कबहूं न साजेहु चढ़े न काठके घोरा हो ॥१३॥
जो गुरुवा लोग तुमको उपदेश कियो ते गुरु ढील है गये काहेते कि, जौन
जौन उपासना की गोन तुम्हारे ऊपर लादि दियो तेते देवता लचपच हैगयें
कहे उनके छुड़ायेते ना छूटे संसारमें परे जाय । देवता के फुरते न उत फुर होइहै
नइत; जब देवतै न फुरे तब गुरुवा ढील परिगयो । सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो मैं कहत रह्यो सो तुम ना मान्यो कि, रकार मकार जपौ याहीते छूटौगे
ताजी तुरकी जो रकार मकार ताको कबहूं न साज्यो कहे कबहूं राम नाम
ना लियो जो साहबके पास लैजाय । काठको घोरा जो है मन जड़ तामें चढ़यो
सो कूदिकै संसार गाड़में डारि दियो जो ताजी तुरकी रामनाम तामें चढ़त्यो
तौ तुमको कूदिकै साहब के पास पहुंचावतो ॥ १३ ॥
ताल झांझ भल बाजत आवै कहरा सब कोइ नाचै हो ।
जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये तेहि रंग दुलहिनि राचै हो १४
गुरुवा लोगनकी ओठ झांझ है औ जीभ ताल देइहै वही ब्रह्मही में ताल
देइहै कहे नाना बाणी करिकै नाना मतन करिकै वही ब्रह्ममें चुवावै है ।
अथवा जाको जौन उपासना बतावै है ताको तौन इष्ट देवता है ताहीको ब्रह्म
कहैं हैं ताहीको सब कुछ कहैं हैं, उहै तालको मान देइहैं अर्थात् सब शास्त्रको
अर्थ वाहीमें पर्यावसानकरै हैं । और गुरुवनमें लगिकै सुखबाचक जौ कतौ न
हरा गये कहे परम पुरुष श्रीरामचंद्र को भूलि गये । संसार में सब जीव दुखि-
या है नाचन लगे । कोई रजोगुणी उपासनामें रचत भये, कोई तमोगुणी उपा-
सनामें रचत भये, कोई सतोगुणी उपासना में रचत भये । जेहि रंग दुलहा
जे उपासना वारे जीव ब्याहन आये कहे गुरुवा लोग जौन रंगमें लगायो तेहि
रंगमें दुलहिनि बुद्धि रचत भई ॥ १४ ॥
नौका अक्षत खेवै नहिं जान्यो कैसेहु लागहु तीरा हो ।
कहै कबीर राम रस माते जोलहा दास कबीरा हो ॥ १५ ॥

कहरा । ( ४५५ )
अक्षत नौका जो राम नाम है ताको खेवै न जान्यो कहे जौनै बिधिते संसार
सागरते पार कै देइ है सो विधि राम नाम जपिबेकी न जान्यो । सो कैसे
संसार सागरते पार ह्वैकै तीर लागौगे ? सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जोलहा
कहे जो कोई राम रस लहाहै अर्थात् राम रस पाय मातो है सोई संसार साग-
रको पार पायो है, सोई कायाको बीर जीव परम पुरुष श्रीरामचन्द्रको दास
भयो है । १ जो “ माते ” पाठ होय तो या अर्थ है कि, कबीरजी कहै हैं कि,
जातिको मैं जोलहा सो राम के रसमें मातेते मैं दास कबीर कहवावन लग्यो ।
पार्षदस्वरूप जो हंस स्वरूप याही शरीरमें पाय गयो, संसारको पार ह्वैगयो ।
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको दास ह्वै गयो । तुम ब्राह्मणादिक जो रामरस में मतौगे
तौकैसे संसारसागरते ना पार होउगे, पारही ह्वै जाउगे । कबीरजी रामरसमें
मतिकै बचिगये तामें प्रमाण ॥ सायरबीजकको ॥ “हम न मरैं मरिहै संसारा ।
हमको मिला जियावन हारा ॥ अब ना मरौ मोर मन माना । तेई मुवा जिन
राम न जाना ॥ साक्त मरै संत जन जीवै । भरि भरि राम रसायन पीवै” ॥ १५॥
इति पहिलाकहरा समाप्त ।
अथ दूसरा कहरा ॥ २ ॥
मति सुनु माणिक मति सुनुमाणिक हृदया वंदि निवारौहो १
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न बांचैहो ।
नित उठि कोरिया वेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो॥२॥
नित उठि नौवा नाव चढ़त है बरही वेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसे झगर निवारिउहो॥३॥
१ याग्रन्थमें भी और और ग्रन्थनमें भी टीकाकार वारवार कबीरजीको अजन्मा कह
गये हैं संसारमें केवल साहबकी आज्ञाते आवै हैं ते कोई गर्भ ते उनको आवनो होय नही
है याते ऊपर को अर्थ ही ठीक है नीचे को अर्थ क्षेपक जानपरत है पीछे से कोई लिखि
दियो है ।

( ४५६ ) बीजक कबीरदास ।
एक गांवमें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो।
गाइन माहँ बसेउं नहिं कवहूं कैसेकै पद चीन्हा हो ॥५॥
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवाराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसे लगबेहु पाराहो ॥ ६ ॥
जत इतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दोराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारिहु तब पैहौ ठिक ठोराहो॥७॥
प्रेम बान एक सतगुरु दीन्ह्यो गाढो तीर कमानाहो ।
दासकबीर कियो यह कहरा महरा माहि समानाहो ॥८॥
मति सुनु माणिक मति सुनु माणिक हृदया बंदिनिवारोहो १
श्री कबीरजी कहैहैं कि हेजीव ! तैंतो माणिक है माणिक लाल होयहैं सोतैं
कहां संसारमें अनुराग करिकै लाल हैरहे साहब में अनुराग करि लाल होइ
गुरुवा लोगनकी वाणी तैं मति सुनु मतिसुनु आपने हृदयकी जो संसाररूपी
बंदि ताको निवारु ॥ १ ॥
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न वाचैहो ।
नित उठिकोरिया बेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो २॥
काहेते कि अटपट कुम्हरा जो या मन है सो कुम्हरिया करै है कहे नाना
शरीर रचैहै जैसे कुम्हार नाना बासन बनावै है ऐसे या मन नाना शरीर रचैहै
सो शरीर जो गाउं है तौन चमरा कालके मारे नहीं बचैहै मन रचत जाइहै
शरीर काल खात जाइ औ कोरिया जे मुनि लोग हैं सत रज तम ग्रन्थ प्रवर्त्त-
नवारे ते बेट भरतं हैं कहे बनावत जाइहैं तेई ग्रन्थनको लैके छिपिया जे
गुरुवा लोगहैं ते आंगन आंगन नाचै हैं अर्थात् चेला हेरत फिरै हैं नाना मतमें
होकै औरनको नाना मतमें लगावत फिरै हैं ॥ २ ॥

कहरा । ( ४५७ )
नित उठि नौवा नाव चढ़तहै वरही बेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसेकै झगर निवारिउहो ३
नौवा जो संन्यासी जौन आपनो मूड मुड़ावैहै आनौ को मूड़ि कै चेला
बनाइ लेइहै सो वेषमात्र जो नाव तामें चढ़िकै संसार समुद्र पार होवा चाहै है
औ नाना देवतन प्रतिपाद्य जे ग्रन्थ तेई हैं बरही कहे बोझा ताहीको बेरा
रचि वारी जे नाना उपासना वारे हैं ते संसार समुद्रको पार होवा चाहै हैं । राउर
जो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्रको घर ताको जानतई नहीं या झगरा कैसेकै
निवारण होई । साहेबते तो चिन्हारिनि नहीं है कबहूं माया पकरि लेइहै कबहूं
ब्रह्म पकरि लेइहै कबहूं मन पकरिलेइ है इत्यादिक जेई पावैहैं तेई धरि
लेइ हैं सो कैसेकै झगड़ा निवारण होइ ॥ ३ ॥
एक ग्राममें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४॥
एकगांव जो या संसार तामें पांच तरुणि जे ज्ञानेंद्री ते बसै हैं ज्ञानेंद्री कहेते
कर्मेंन्द्रिउ आइ गईं, तिनमें जेठ मन जेठानी माया है सोई दशौ इंद्री आपन
आपन झगर कहे अपने अपने विषय ओर मनको खैंचत भई सो मनके अधीनहै
जीव सोऊ वही कत चलो गयो परम पुरुष पर जे श्री रामचंद्र प्रीतम हैं तिन
सों प्रीति नशाइ गई ॥ ४ ॥
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो ।
गाइन माहँ बसेहु नहिं कबहूं कैसेकै पद चीन्हाहो ॥ ५ ॥
सो भैंसीजे दशौ इंद्री हैं तिनमें बकुला जो मन सो रहैहै जैसे भैंसी जब
जलमें पैरहैं तब बकुला वाके ऊपर बैठ रहैहै जो मछरी भैंसिनके किलनी
खाबेको आई सो बकुला खाय लीनो ऐसी इन्द्री जब विषय ओर चली तब
मनहीं भोग करै है इंद्रीद्वारा ताते मनको बकुला कह्यो है सो हे जीव ! तैंतो
तकुलाहै कहे ताकनवारो है काहे न ताकि लीन्हा औ साहब के गावन वारे
जे संत तिन गाइन में कबहूं बसबै न कियो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र को
पद कैसेकै चीन्हो ॥ ५ ॥

( ४५८ ) बीजक कबीरदास ।
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवांराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसेकै लगिहौ पाराहो ॥ ६ ॥
साहब जे श्रीरामचन्द्र तिनके पंथके चलनवारे जे पंथी संतजन तिनसों तौ
पंथ बूझि न लीन्हेउ मूढ़ जे गुरुवा लोग तिनकी बाणीमें परिकै मूढ़ हैगयो
गवांर हैगयो सो साहबके पहुंचबे को जो घाट ताको छोड़ि औघट जो माया
ब्रह्म तामें चलौहौ सो कैसे कै पार लागौगे ॥ ६ ॥
जतइतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दौराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारेहु तहँ पैहहु ठिक ठोराहो ॥७॥
जत इतके कहे जिनके जतदा चलै है सो जतइत कहावै है सो धोखा ब्रह्म
है जो सबको दरि दारै है सबको मिथ्यै मानै है तहां ललइच जे लालची हैं
ते धन जो मुक्ति ताको हेरिनि सो उहाँ न पाइन तब कोदइत जे गुरुवालोग
जिनके नाना उपासनारूपको दौरा जाय है तिनके इहांगये कि यहां मुक्तिधन
मिलैगो सो कबीर जी कहैं हैं कि जतइत के तो धनको ठिकानै न लग्यो तौ कोद-
इत जे माटीके दुइ चकरी बनाइ दरना पसारै हैं तहां ठीकठौर पैहौ ? अर्थात् न
पैहौ साहब को जानोगे तबहीं ठिकान लागैगो ॥ ७ ॥
प्रेम बाण यक सतगुरु दीन्हो गाढ़ो खैंचि कमाना हो ।
दास कबीर कियो या कहरा पहरा माहिं समाना हो ॥८॥
श्री कबीरजी कहैहैं कि हे जीवौ ! तुम यामें पार न जाउगे जब ऐसो करौ
तब पारै जाउगे।प्रेमको तो बाण करु औ सतगुरु जो ज्ञान दीन्हो है ताको कमान
करि गाढ़ो खैंचि साहबरूप जो निशान है तामें प्रेमबाण मारु अर्थात् प्रेम
लगाउ । हे साहब को सदाको दास ! कायाकेबीर जीव या कहरा में संसार को
कहर है सो कहा कियो है, महरा माहिं समाना कहे जे साहब के महरमी हैं
तेहीमें समाय अर्थात् उन्हींको सत्संग करु । कहू गाढ़ो खैंचि कमाना यही पाठ
है।अथवा हे कबीर ! कायाके बीर जीव मन माया ब्रह्मके दास हैं यहि संसार तें

कहरा । ( ४५९ )
किये सो कहरा कहे कहर करनवारो है सो तैं आपनो रूपतौ विचारु कहाँ
माया दास ह्वैरहै है तैं महरा कहे मायाके हरनवारे जे हैं साधु तेही माहिं समाना
कहै तैं तिनके बरोबर है जो तैं आपने स्व स्वरूपको जानै है ॥ ८ ॥
इति दूसरा कहरा समाप्त ।
अथ तीसरा कहरा ॥ ३ ॥
रामनामको सेवहु वीरा दूरि नहीं दुरि आशाहो ।
और देव का पूजहु बौरे ई सब झूठी आशाहो ॥ १ ॥
उपरके उजरे कहभो बौरे भीतर अजहूं कारोहो ।
तनको बृद्ध कहा भो बौरे ई मन अजहूं बारोहो ॥ २ ॥
मुखके दांत गये का बौरे अंदर दांत लोहेके हो ।
फिरि फिरि चना चवाउ विषयके काम क्रोध मद लोभेहो ३
तनकी शक्ति सकल घटि गयऊ मनहिं दिलासा दूनीहो ।
कहै कबीर सुनो हो संतो सकल सयानप ऊनीहो ॥ ४ ॥
राम नामको सेवहु वीरा दूरि नहीं दुरि आशाहो ।
और देव का पूजहु बौरे ई सब झूठी आशाहो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हे कायाके वीरौ जीवो ! रामनाम को सेवन करो
राम नाम दूरि नहीं है तुम्हारी आशा दूरिहै और देवको हे बौरे का पूजहुहौ
इनकी आशा सब झूठी है ॥ १ ॥
ऊपरके उजरे कह भो बौरे भीतर अजहूं कारोहो ।
तनको वृद्ध कहाभो बौरे या मन अजहूं वारोहो ॥ २ ॥
मुखके दांत गयेका बौरे अंदर दांत लोहेके हो ।
फिरि फिरि चना चवाउ विपयके काम क्रोध मद लोभेहो ३