कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ सत्पुरुषाय नमः ॥
अथ विप्रमतीसी।
सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी।हरि बिनु बूड़ीनाव भरीसी १
ब्राह्मण ह्वेकै ब्रह्म न जानैं। घरमें यज्ञ प्रतिग्रह आनैं ॥२॥
जे सिरजा तेहि नहिं पहिचानैं।कर्म भर्म लै बैठि बखानैं ३॥
ग्रहण अमावस सायर पूजा।स्वातीके पात परहु जनिदूजा ४
प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहितहोमकीआसा ५
कुल उत्तम कुल माँहकहावैं।फिरिफिरि मध्यमकर्मकरावैं ६
कर्म अशुचि उच्छिष्टै खाहीं।मति भारिष्टयमलोकहिजाहीं ७
सुतदारा मिलि जूठो खाहीं । हरिभगतनकी छूतिकराहीं ८
न्हायखोरि उत्तम ह्वै आवैं।विष्णुभक्त देखे दुख पावैं॥९॥
स्वारथलागिरहे वे आढ़ा । नामलेत जस पावक दाढ़ा १०
रामकृष्णकीछोड़िनिआसा।पढ़िगुणिभयेकृत्तिमकेदासा ११
कर्मकराहिं कर्महिंको धावैं।जो पूछै तेहि कर्मदृढ़ावैं ॥१२॥
निष्कर्मीकै निन्दा कीजै । करैकर्मताही चितदीजै ॥१३॥
असभगती भगवतकी लावैं।हरिणाकुशको पन्थचलावैं १४
देखहुकुमतिनरकपरगासा।बिनुलखिअंतरकिरतिमदासा १५
जाके पूजे पाप न ऊड़ै । नाम सुमिरितेभवमेंबूड़ै ॥१६॥