कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४० ) बीजक कबीरदास ।
माया सो समानेहै सो यतनी बात कोई नहीं जानैहै कि, येई जाहब के
चीन्हन न देइहैं । स लक्ष्मीको औ परोक्षको कहैहैं ॥ “सःपरोक्षे समाख्यातः-
साच लक्ष्मीःप्रकीर्त्तिता” ॥ ३३ ॥
हहा होइ होत नहिं जाने । जबहीं होइ तबै मन माने ॥
है तो सही लहै सब कोई।जब वा हो तब या नहिं होई॥३४॥
ह कहिये विष्कम्भको हा कहिये त्यागको । सो हे जीव या विष्कम्भ शरी-
रको त्यागहोत कोई नहीं जानैहै । जब शरीरत्याग द्वैजाइ है तबहीं जानैह कि,
शरीरत्याग द्वैगयो । जामें जीव थँभारहैहै सो शरीरमें हंसरूप सही है। ता जीवको।
परंतु सबकोई नहीं लहैहै कहै नहीं पावैहै। जब वा हंसशरीरहोइ जब या शरीर-
नहीं होइहै वाही हंसशरीरमें थँभारहै है । ह विष्कम्भको औ त्यागको कहै हैं तामें
प्रमाण ॥ “हःकोप