कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४८ ) बीजक कबीरदास ।
जिन्ह सम युक्ति अगमनकै राखिन धरणिमांझघरडेहरिहो ।
जेकरे हाथ पाउं कछु नाहीं धरणि लाग तनसे हरि हो॥९॥
पेलना अक्षत पेलि चलु बौरे तीर तीर कह टोवहु हो ।
उथले रहौ परो जानि गहिरे मति हाथै कै खोवहु हो ॥१०॥
तर कै घाम उपरकै भूभुरि छांह कतहुं नहि पावहु हो ।
ऐसो जानि पसीजहु सीजहु कस न छतरिया छावहु हो ११
जो कछु खेल कियो सो कीयो बहुरि खेल कस होई हो ।
सासु ननँद दोउ देत उलाटन रहहु लाज मुख गोई हो १२॥
गुरु भो ढील गोन भो लचपच कहा न मानेहु मोरा हो ।
ताजी तुरकी कबहुं न साजेहु चढ़यो काठके बोराहो॥१३॥
ताल झांझ भल वाजत आवै कहरा सब कोइ नाचै हो ।
जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये तेहि रंग दुलहिन राचै हो १४
नौका अछत खेवै नहिं जान्यो कैसे लागहु तीरा हो
कहै कबीर राम रस माते जोलहा दास कबीरा हो ॥१५॥
सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु गुरुके बचन समाई हो ।
मेली सृष्ट चराचित राखौ रहौ दृष्टि लौ लाई हो ॥ १ ॥
.. श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीव ! तैं गुरुके बचनमें समाइकै सहज ध्यान
तैं करुगुरुके बचन जो आगे लिखि आये हैं कि, सुरति कमलमें गुरु बैठे रकार
मकार जपै हैं तामें समाइ जाइ । अर्थात् दलदलमें बाढ़िकै इक्कीस हज़ार छासै
श्वास जे चलै हैं तिनमें तेतने राम नाम जपै । कौनी रीतिते जपै तामें प्रमाण॥
श्री कबीरजी को पद ।