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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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विप्रमतीसी । ( ४५३ )
ब्रह्मईके जानेतें ब्राह्मणकहावै है सो ब्रह्म को तो न जान्यों यज्ञादिकनके प्रति-
ग्रह घरमें लैआवै हैं आदिते दानौ आयो ॥ २ ॥ जौन उत्पत्ति कियो है ताकों
तो जानतई नहीं हैं कर्मकाण्डको भरम नाना प्रकारके बैठिकै बखानै हैं ॥ ३ ॥
सों हे दूना कहैं दुःखग्रहणमें अमावस में सायर कहै समुद्रादिक तीर्थन में जैसे
स्वाती के जलको पपीहा दौरै है ऐसे तुम्हीं ग्रहण अमावसमें समुद्रादिक तीर्थन
में दान लेन को ताके रहौ हौ परन्तु आशा नहीं पूनै है ॥ ४ ॥
प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होम की आसा ५
कुल उत्तम कुल माहँ कहावैं।फिरि फिरि मध्यम कर्म करावैं
मुखते प्रेत कर्म करावै हैं कि, ऐसो पिंडदान करो तौ प्रेतत्व छूटिजाइ ।
औ अंतःकरणमें या आशा बसै है कि, जो या होमकरै तौ हम दक्षिणा पावैं
॥ ५ ॥ औ ब्राह्मण तो बड़े उत्तमकुलके कहावै हैं कि, हम बड़े कुलके हैं परंतु
फिरिफिरि कहै बारबार मध्यम कहै नरक जायवाके कर्मकरावै हैं ॥ ६ ॥
कर्म अशुचि उच्छिष्टै खाहीं।मति भरिष्ट यमलोकहि जाहीं ७
सुत दारा मिलि जूठो खाहीं।हरिभगतनकी छूति कराहीं ८
न्हाय खोरि उत्तम है आवैं । विष्णु भक्त देखे दुख पावैं ॥९॥
नाना प्रकारके अपावनकर्म्म कैकै भैरव दुलहा देवादिकनको उच्छिष्टखाय हैं
सो मतिभ्रष्टह्वैकै यमलोकहि जाइहैं ॥ ७॥ तौने प्रेतनको जूठसुत दाराकहे पुत्र स्त्री
त्यहि समेत सब मिलि खाइहैं औ हरिभक्तन की छूति मानै हैं ॥ ८ ॥ औ नहा
य खोरि कै आपने जान पवित्रहै आवैं औ जिनके दर्शनते पवित्र होयहैं ऐसे
बिष्णुभक्त तिनको देखिकै दुःखपावै हैं। ई बड़े तिलक दिये शङ्ख चक्र दीन्हे कहां रहे
उनको मुख देखेंगे तो पापलगै है या कहै हैं ॥ ९ ॥
स्वारथ लागि रहे वे आढ़ा । नाम लेत जस पावक दाढ़ा १०
राम कृष्णकी छोड़िनि आसा।पढ़ि गुणि भे किरतिम के दासा
अपने स्त्री पुत्र यहीकें स्वारथ में वे अर्थ आढ़ाति लगायरहे हैं जिनके अंश हैं
ऐसे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके नामलेतमें मानों जीभ पावकमें जरी जाइहै ॥१०॥