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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 766 में से

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पृष्ठ 486

( ४३८ ) बीजक कबीरदास ।
होइ तो याअर्थ है। “ला इन्द्रको औ छेदनको कहै हैं। सो हें जीव! जो यज्ञादि-
ककारि इन्द्रादिक देवतनके संतुष्टिके वास्ते पशुछेदन करौहौ सो वेद या तुतरे-
बात जनाई है । जैसे लरिका रोटीको टोटींकहैहै परन्तु माता तात्पर्य जानै
है कि रोटीही मांगै है । ऐसेवेद जो यज्ञादिक कहै हैं सो दुष्कर्म छुड़ाइकें
यज्ञादिक में लगायो । फेरिज्ञानदै कै येउकर्म छुड़ाइक तात्पर्यते साहबको
बतावै हैं । सो तुतर जो है वेद तौनेको अर्थ तब पावै जब वाके
तात्पर्य को पावै सो आपतो तुतरह्रै वेदं परदा कैके बात कहै है सब जीवनको
ए कहै हैं कि, जीव औरको औरई कहै है मेरो तात्पर्य नहीं समझैहै सो एकै
खेत जो संसार है तामें दूनों निबहै हैं” । अथवा साहबके इहां वेदनहीं पहुंचि
सकैहै न प्रकट वर्णन करि सकैहै तात्पर्यही करिकै कहै है जगत औ कर्म याही-
को प्रकट बर्णन करैहै । औजीवजेहैं ते जगतही में परे रहै हैं जे तात्पर्य जानै-
हैं तेई साहबके समीप पहुंचे हैं ताते वेदौ जीवौ एक खेत जो जगत है ताही-
मों निबहै हैं जो जगत न रहै तो बद्ध विषयी मुमुक्षुई न रहिजायँ मुक्तभारि
रहिजायँ औ चारिउ वेद रकारमकार में रहिजायँ । ल इन्द्र को लक्ष्मी को छेदन
को कहैहैं तामें प्रमाण ॥ 'ले इंद्रो लवनो लश्च ला च लक्ष्मीः प्रकीर्त्तिताः'॥२९॥
ववा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
ववा कहै सुनौ रे भाई। स्वर्ग पताल किं खबरि न पाई ३०
वकहिये भक्तको वा कहिये वायुको सो हेजीव! तैं तो साहबको भक्तहै वायु
की नाईं जगत्में बहतफिरौहौ ! वहहै ईश्वर, वहहै ईश्वर या कहा सब कोई
कहौहौ । सो वे नाना ईश्वरनके कहे काज कहे मुक्ति न होइहै । सोहे ववा
कहनेवारें भाई ! सुनते जाउ तुम स्वर्ग पातालकी खबरि नहीं पाई अर्थात् सबके
रखवार साहबको नहीं जानौ हौ तामें प्रमाण ॥ “ स्वर्गपतालभूमिलौंबारी ।
एकै रामसकल रखवारी ” ॥ वा सात्वतको औवायुको कहै हैं तामें प्रमाण ॥
“ सात्वतेवरुणे वातेवैकारःसमुदाहृतः ” ॥ ३० ॥
शशा सरदेखै नहिं कोई । सरशीतलता एकै होई ॥
शशा कहै सुनौ रे भाई । शून्यसमान चला जगजाई ॥३१॥
१-'ल' इन्द्र और काटनेवाले को, 'ला' लक्ष्मीको कहते हैं ।
२-'व' सत्वगुणी, वरुण और वायुको कहतेहैं ।