सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 495

ॐ
अथ कहरा प्रारभ्यते ।
कहरा पहिला ॥ १ ॥
सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु गुरुके वचन समाई हो ।
मेली सिष्ट चराचित राखो रहो दृष्टि लोलाई हो ॥ १ ॥
जो खुटकार वेगि नहिं लागो हृदय निवारहु कोहू हो ।
मुक्तिकी डोरि गांठि जनि खैंचो तब वाझी बड़ रोहू हो॥२॥
मनुवो कहौ रहै मन मारे खीझवो खीझि न बोलै हो ।
मनुवो मीत मिताइ न छोड़ै कवहूं गांठि न खोलै हो ॥३॥
भूलौ भोग मुक्ति जनि भूलौ योगयुक्ति तन साधो हो ।
जो यहि भांति करहु मतवारी ता मतके चित बांधो हो॥४॥
नहिं तौ ठाकुर है अति दारुण करिहै चालु कुचाली हो ।
बांधि मारि डारि सब लैहै छूटी सब मतवाली हो ॥ ५ ॥
जबहीं सामत आइ पहुंचे पीठि सांट भल टूटैहो ।
ठाढ़े लोग कुटुम्ब सब देखै कहै काहु किन छूटैहो ॥ ६ ॥
एक तो अनिष्ट पाउं परि बिनवै बिनती किये न मानै हो ।
अन चिन्ह रहे कियो न चिन्हारी सो कैसे पहिचानै हो॥७॥
लेइ बोलाय बात नहिं पूछै केवट गर्भ तन बोलै हो ।
जेकरि गांठि सबल कछु नाहीं निराधार है डोलै हो॥८॥