कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविप्रमतीसी । (४४५)
बैठेते घर शाहु कहावैं । भितर भेद मन मुसहि लगावैं॥ १९॥
ऐसीविधि सुर विप्र भनीजै। नामलेत पंचासन दीजै॥२०॥
बूड़िगयेनहिंआपसँभारा।ऊंचनीचकहुकाहिजोहारा॥२१॥
ऊंचनीच है मध्यमवानी । एकै पवन एकहै पानी ॥ २२ ॥
एकै मटिया एक कुम्हारा।एक सबनको सिरजनहारा॥२३॥
एकै चाक बहुचित्र बनाया।नादबिन्दुके बीच समाया॥२४॥
सो ऊपरते ऐसो ध्यान लगायकै घरमें बैठे बड़े साधुकहावैं औ अन्तःकरण
में मनते पराई द्रव्य मूसैको भेद लगाये हैं ॥ १९ ॥ सोयहि रीति विप्रनकें
सुरनकी विधिकहैं नामको लेइहैं कहे मन्त्रजपैं हैं औ पंचासनकहे पंच आसन
देइहैं अर्थात् पंचांगोपासना करैं हैं ॥ २० ॥ सो आपै मायाकी धारमें बूड़िगये
न सँभारत भये तो ऊंचनीच कहे पांच देवतनमें काको जोहार्यो कहे काके भये
अर्थात् काहूके न भये ॥ २१ ॥ सो विप्रनको उत्तम मध्यम नीच बाणी कारिकै
होइहैं बास्तव तो सबके शरीरनमें एकै पानी है एकै पवनहै ॥ २२ ॥ औ एकै
सबकी माटीहै कहे सब पांचभौतिक हैं औ सबके सिरजनहार कुम्हार मन एकैहैं
॥ २३ ॥ एकचाक जो जगत्है तामें बहुत विधिके चित्र बनावत भयो मन औ
नाद बिन्दुके बीचमें आपै समातभयो ॥ २४ ॥
व्यापी एक सकलमें ज्योती।नामधेरेकाकहियेमोती॥२५॥
राक्षसकरणी देवकहावै । दाद करै भवपार न पावै ॥ २६ ॥
हंस देह तजि न्यारा होई।ताकी जाति कहै धौं कोई ॥ २७॥
इयामसुपेदकि, रातापियरा।अवरणवरणकितातासियरा२८
सो एक ज्योति जो आत्मा सो सबमें व्यापि रही है ब्राह्मण नामधरचो सो
ताहीते मोतीकही अर्थात् न कही बिना ब्रह्म जाने ब्राह्मण नहीं कहावै है ॥ २५ ॥
औ करणी तौ राक्षसकी नाईं करे हैं औ जगतमें ब्राह्मण देवता भूसुर कहावैं हैं