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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

कहरा । ( ४४१ )
षट् चक्र निरूपण ।
संतौ योग अध्यातम सोई ।
एकै ब्रह्म सकल घट ब्यापै द्वितीया और न कोई ॥
प्रथम कमल जहँ ज्ञान चारि दल देव गणेशको वासा ।
रिधि सिधि जाकी शक्ति उपासी जपते होत प्रकासा ॥
षट दल कमल ब्रह्मको बासा सावित्री सँग सेवा ।
षट सहस्त्र जहँ जाप जपतहैं इंद्र सहित सब देवा ॥
अष्ट कमल जहँ हरि सँग लक्ष्मी तीजो सेवक पवना ।
षट् सहस्त्र जहँ जाप जपतहैं मिटिगो आवा गवना ॥
द्वादश कमलमें शिवको बासा गिरिजा शक्ती सारँग ।
षट सहस जहँ जाप जपत हैं ज्ञान सुरति लै पारँग ॥
षोडश कमल में जीवको बासा शक्ति अविद्या जानै ।
एक सहस जहँ जाप जपतहैं ऐसा भेद बखानै ॥
भवँर गुफा जहँ दुइ दल कमला परमहंस कर वासा ।
एक सहस जाके जाप जपतहैं करम भरमको नासा ॥
सहस कमलमें झिल मिल दर्शो आपुइ बसत अपारा ।
ज्योति स्वरूप सकल जग व्यापी अक्षय पुरुष है प्यारा ॥
सुरति कमल परसत गुरु बोलै सहज जाप जप सोई ।
छौसै इक्कीस सहसहि जपिले बूझै अजपा कोई ॥
यही ज्ञानको कोई बूझै भेद अगोचर भाई ।
जो बूझै सो मनका पेखै कह कबीर समुझाई ॥ १ ॥
औ यही रामनाम मन बचनके परे है सो आगे कहि आये हैं और सब मनकें
भितरै है यही रामनाम सबके ऊपरहै ताहीमें मतौ तबही पारै जाउगे । औ
मेली सृष्ट कहे सृष्टजो संसार ताको मेलि देउ कहे छोड़ि देउ । औ चरचित
राखौ कहे सहज समाधि आगे कहि आये हैं ताको चरचित राखौ कहे वही
जानतरहु । अथवा वाहीमें जो आपने चितको चरा कहे चलत राखौ दृढ़-
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